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China USA Tension: अब चीन का मुकाबला करने के लिए खुद मैदान में उतरेगा अमेरिका? जानें क्या कहते हैं विशेषज्ञ
Sat, 10 Dec 2022 05:40 PM IST
अभिषेक दीक्षित
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांगकांग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांगकांग
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Sat, 10 Dec 2022 05:40 PM IST
सार
टायफून लॉन्चर से एसएम-6 या तोमाहॉक मिसाइलों के जरिए 500 से 1800 किलोमीटर दूर तक मार की जा सकती है। इसके पहले अमेरिकी सेना के पास छोटी और लंबी दूरी तक यानी 482 किलोमीटर और 2,776 किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइलें थीं।
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USA vs China
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विस्तार
अमेरिका ने प्रशांत महासागर क्षेत्र में ‘मिसाइल दीवार’ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। इस उपाय के जरिए उसका मकसद चीन के किसी संभावित हमले को रोकना है।
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अमेरिकी सेना को भूमि आधारित मिसाइल लॉन्चर टायफून हासिल हो गया है। इसी हफ्ते ये खबर आई। कई मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि अमेरिकी सेना को चार प्रोटोटाइप टायफून लैंड बैस्ड मिसाइल लॉन्चर दिए गए हैं। ये सभी लॉन्चर मध्यम दूरी तक मार करने में सक्षम हैं। इसेस प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सेना के लिए सटीक निशाना साधना संभव हो जाएगा।
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टायफून लॉन्चर से एसएम-6 या तोमाहॉक मिसाइलों के जरिए 500 से 1800 किलोमीटर दूर तक मार की जा सकती है। इसके पहले अमेरिकी सेना के पास छोटी और लंबी दूरी तक यानी 482 किलोमीटर और 2,776 किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइलें थीं। लेकिन मध्यम दूरी वाली मिसाइलों की कमी उसे महसूस हो रही थी। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक अगर चीन से युद्ध हुआ, तो मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों की जरूरत अमेरिकी सेना को पड़ेगी।
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विशेषज्ञों के मुताबिक, समुद्री जहाजों पर से जिन मिसाइलों को दागा जाता है, उनकी तुलना में जमीन से दागी जाने वाली मिसाइलें किफायती और अधिक प्रभावी होती हैं। नौसेना और वायु सेना के अभियानों के दौरान इन मिसाइलों से अमेरिकी सेना अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा पाएगी। कुल मिला कर इनका अमेरिकी सैनिक अभियान को अधिक मारक बनाने में योगदान होगा।
वेबसाइट एशिया टाइम्स पर छपे एक विश्लेषण में कहा गया है कि टायफून और ऐसे दूसरे सिस्टम को हासिल करने की कोशिशों से लगता है कि अमेरिका ने प्रशांत क्षेत्र के लिए अपनी रणनीति में बदलाव किया है। पहले उसकी रणनीति अपने सहयोगी देशों की मदद करने की थी। अब चीन विरोधी कार्रवाइयों में वह खुद अग्रणी भूमिका लेने को तैयार होता दिख रहा है।
रक्षा क्षेत्र की अमेरिकी पत्रिका वॉर ऑन रॉक्स में उस रणनीति का जिक्र किया गया था जिसके तहत यह माना जाता था कि अमेरिका अपने सहयोगी देशों पर अपना प्रभाव बनाए रखेगा। विशेषज्ञ लुई साइमन ने उस लेख में कहा था कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश अपनी ऐसी तैयारियों से चीन को पराजित करने में सक्षम हो जाएंगे।
लेकिन थिंक टैंक रैंड कॉरपोरेशन की राय है कि ये रणनीति जोखिम भरी है। इसी वर्ष जारी एक अध्ययन में इस संस्थान ने ध्यान दिलाया था कि अमेरिका के सहयोगी देश अपनी जमीन पर टायफून जैसी मिसाइलों को तैनात करने को लेकर अनिच्छुक रहे हैँ। इस अध्ययन रिपोर्ट में इस संभावना पर संदेह जताया गया था कि फिलीपीन्स, थाईलैंड या दक्षिण कोरिया जमीन से मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों को अपनी जमीन पर लगाने देंगे। रैंड कॉरपोरेशन के विशेषज्ञों की राय है कि जापान और ऑस्ट्रेलिया इसके लिए राजी हो सकते हैं, लेकिन वे इसकी इजाजत कुछ सीमाओं के साथ ही देंगे।
विशेषज्ञों में आम राय है कि तमाम संभावित रुकावटों के बावजूद अब अमेरिका ने चीन का सीधा मुकाबला करने का मन बना लिया है। इस अभियान में अगर सहयोगी देश उत्साह नहीं दिखाएंगे, तो अमेरिका अब खुद अपने हाथ में कमान लेकर मैदान में उतरने को तैयार है।