चीन की सेना पीछे हट रही है और भारत के अमेरिका से रिश्ते आगे बढ़ रहे हैंं
- विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने की अमेरिकी समकक्ष से बात
- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लिया सीमावर्ती क्षेत्र का जायजा
- लेकिन अभी भी पहेली बने हैं भारत और चीन के बीच रिश्ते
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भारत और चीन के बीच में लद्दाख क्षेत्र और एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) को लेकर बनी सहमति अभी भी सुरक्षा और सामरिक विशेषज्ञों के गले नहीं उतर पा रही है। ब्रह्मा चेलानी जैसे विशेषज्ञ भी इसके मायने कम समझ पा रहे हैं। विदेश मंत्रालय से मंगलवार को इसे लेकर सवालों का सिलसिला पूरे दिन जारी रहा। इस बीच भारत के विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट (राजनीतिक मामले) डेविड हेल से बात की। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों, सैन्य जनरलों से सीमा क्षेत्र के बारे में ताजा जानकारी ली। समझा जा रहा है कि रक्षा मंत्री ने चीन के सैनिकों के पीछे हटने की स्थिति के बारे में विशेष तौर से जानकारी ली है।
गोगरा पोस्ट, हॉट स्प्रिंग क्षेत्र से चीन की सेना ने उखाड़े तंबू
प्राप्त जानकारी के अनुसार गोगरा पोस्ट और हॉट स्प्रिंग एरिया से चीन की सेना ने तंबू उखाड़े हैं। चीन के सैनिक अपने साजो-सामान लेकर कोई 1.5 किमी पीछे हटे हैं। उनके साथ-साथ भारतीय सेना भी 30 जून को सैन्य कमांडरों के बीच में बनी सहमति के आधार पर पीछे हटी है। हालांकि भारत और चीन के बीच में लद्दाख क्षेत्र, एलएसी को लेकर बनी सहमति तमाम रक्षा, सामरिक और सुरक्षा विशेषज्ञों के अभी गले नहीं उतर रही है। सभी की मूल चिंता पैगांग त्सो झील क्षेत्र को लेकर है।
इसके समानांतर भारतीय विशेषज्ञ एक सवाल भी उठा रहे हैं। उनका कहना है कि पांच मई 2020 से भारत और चीन के सैनिकों के बीच में शुरू हुई झड़प और तनाव का कारण चीन के सैनिकों का भारतीय क्षेत्र में आना था। पैगांग त्सो क्षेत्र में आठ किमी लंबाई के इलाके में बंकर, सैन्य संरचना खड़ी करना सैन्य तैनाती बढ़ाना था। पैगांग से पीछे हटना ही सबसे बड़ी कामयाबी मानी जाएगी। यहां चीन की फौज जब फिंगर 8 तक लौट जाए तो ठीक है। इस बारे में अभी विस्तृत रिपोर्ट नहीं आ रही है। ऐसे में अग्रिम पोस्ट से भारतीय सेना के पीछे हटने का कारण लोगों की समझ में कम आ रहा है।
बड़ा सवाल एक और है। चीन के विदेश मंत्री के वक्तव्य में अंग्रिम पंक्ति (फ्रंट लाइन) की सेना को पीछे लाकर तनाव कम करना है। चीन के विदेश मंत्री ने इसके साथ यह भी कहा है कि चीन अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा लगातार करता रहेगा। जबकि भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान में तनाव कम करने, फ्रंट लाइन सैनिकों को पीछे लाने जैसा कोई वर्णन नहीं है। अभी विदेश मंत्रालय ने इस तरह के सवालों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। तस्वीर इसको लेकर भी साफ नहीं है कि दोनों देशों के बीच बनी सहमति का आधार, मूल शर्तें क्या हैं? किसने इसमें क्या खोया और क्या पाया?
भारत, अमेरिका बढ़ा रहे हैं सामरिक और सहयोगात्मक साझेदारी
भारत ने चीन के तनावपूर्ण रिश्तों के इस दौर में अमेरिका के साथ विश्वसनीय सामरिक और सहयोगात्मक साझेदारी को आगे बढ़ा रहे हैं। विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला के साथ समकक्ष अमेरिकी राजनयिक डेविड हेल की वार्ता इसी का संदेश दे रही है। दोनों देशों के राजनयिकों ने आर्थिक, वाणिज्यिक, सामरिक, व्यापारिक, राजनीतिक, क्षेत्रीय, द्विपक्षीय, अंतरराष्ट्रीय सभी मुद्दों पर चर्चा की। अंतराष्ट्रीय स्तर पर ग्लोबल स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप बढ़ाने के उपाय चर्चा के विषय रहे।
कोविड-19 जैसी महामारी के कारण पैदा हुई परिस्थिति, वैक्सीन का विकास, एक दूसरे के सहयोग पर चर्चा भी की। चर्चा में दक्षिण चीन सागर का मुद्दा भी रहा। भारत दक्षिण चीन सागर में भयरहित और स्वतंत्र नौवहन का पक्षधर है। संभव है कि भविष्य में भारत इस क्षेत्र में साझा सहयोग का कदम उठा सकता है। चर्चा में हिंद महासागरीय क्षेत्र और आपसी सहयोग को बढ़ावा देना भी रहा।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी ले रहे हैं हालात का जायजा
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मंगलवार को काफी सक्रिय रहे। समझा जा रहा है कि उन्होंने लद्दाख क्षेत्र में ताजा घटनाक्रम के बारे में भी जानकारी ली। सैन्य कमांडरों से रक्षा मंत्री लगातार अपडेट होते रहते हैं। मंगलवार को रक्षा मंत्री ने सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) से उसके सीमावर्ती क्षेत्र के कामकाज, परियोजना तथा डेवलपमेंट को लेकर जानकारी ली। गौरतलब है कि चीन के साथ लद्दाख में, नेपाल के साथ लिपुलेख के पास ताजा विवाद का कारण बीआरओ द्वारा सीमावर्ती क्षेत्र में सड़क, पुल तथा संसाधनों से परियोजना को पूरा करना है।
बीआरओ ने वित्त वर्ष 2019-20 में पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 30 फीसदी अधिक काम करके 60 साल के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। इस समय बीआरओ की टीम उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, लेह-लद्दाख, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश में बर्फ को हटाकर सैन्य बलों की आवाजाही सुगम बनाने में लगी है। इसके अलावा तमाम सामरिक महत्व की सड़क परियोजनाओं को पूरा करने का काम चल रहा है। रक्षा मंत्री की बैठक से साफ है कि भारत सीमावर्ती क्षेत्र में संसाधनों के विकास से फिलहाल कोई समझौता नहीं करने जा रहा है।