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Court: बच्चों की सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित, जस्टिस सूर्यकांत बोले- अब बच्चों को गवाह नहीं, इंसान समझिए
Sat, 05 Jul 2025 03:02 PM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हैदराबाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हैदराबाद
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Sat, 05 Jul 2025 03:02 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि भारत में बच्चों की सुरक्षा की व्यवस्था बिखरी हुई और कमजोर है। बच्चों को सिर्फ केस का गवाह नहीं, बल्कि उनकी संपूर्ण देखभाल की जरूरत है। उन्होंने कानूनी प्रक्रिया को बच्चों के लिए आसान और संवेदनशील बनाने की मांग की। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवन्त रेड्डी ने भरोसा प्रोजेक्ट की जानकारी दी, लेकिन चुनौतियां अभी बाकी हैं।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : एएनआई
विस्तार
देश में बच्चों के खिलाफ अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि ऐसे मामलों में न्यायिक व्यवस्था और बच्चों की सुरक्षा का सिस्टम खुद बच्चों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सूर्यकांत ने इसी पर कड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि भारत का बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा ढांचा अभी भी बिखरा हुआ है और पूरी तरह सक्षम नहीं है। हमें बच्चों को सिर्फ गवाह नहीं, बल्कि पूरी देखभाल और सुरक्षा की जरूरत वाले इंसान की तरह देखने की सोच विकसित करनी होगी।
हैदराबाद में पॉक्सो कानून पर आयोजित स्टेट लेवल मीट 2025 के उद्घाटन सत्र में बोलते हुए सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में न्याय व्यवस्था को बच्चों के जख्मों को और न बढ़ाने वाला बनाना होगा। उन्होंने कहा कि जब तक बच्चे सही मायनों में न्याय महसूस नहीं करते, तब तक हमारा काम अधूरा है।
सिर्फ अदालत नहीं, बाहर भी चाहिए बच्चों की सुरक्षा
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सिर्फ अदालत के अंदर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें घर, स्कूल, मोहल्ले और समाज में हर जगह सुरक्षित महसूस कराना जरूरी है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब कोई बच्चा अपने साथ हुए अपराध की बार-बार पुलिस, शिक्षक, डॉक्टर, वकील और फिर जज के सामने कहानी सुनाता है, तो उसकी आवाज कमजोर पड़ जाती है। यही सिस्टम की असल खामी है।
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सिस्टम बच्चों की तकलीफ और बढ़ाता है
है कि बच्चे की तकलीफ नजरअंदाज कर देता है, तब असल में हम दोनों को ही नुकसान पहुंचाते हैं। यह समस्या सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि सिस्टम की मूलभूत कमजोरी है।
ये भी पढ़ें: कोरोनिल, शरबत जिहाद से लेकर च्यवनप्राश तक लगी फटकार, पढ़ें पतंजलि के विवादों की सूची
बच्चों की सुरक्षा सिर्फ कानून का नहीं, नैतिक दायित्व भी
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सिर्फ कानूनी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य भी है। भारत जैसे सामाजिक देश में यह संविधान का भी वादा है। उन्होंने कहा कि बच्चों के पुनर्वास को किसी फुटनोट की तरह नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की बुनियाद बनाना होगा।
ये भी पढ़ें: 'हिंदू विरोधी और जिहादी सोच से प्रेरित', ठाकरे बंधुओं की रैली पर नितेश राणे का तीखा हमला
तेलंगाना में ‘भरोसा प्रोजेक्ट’ बच्चों की मदद को आगे
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी कार्यक्रम में कहा कि बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा उनकी सरकार की पहली प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि तेलंगाना में ‘भरोसा प्रोजेक्ट’ के तहत 29 केंद्र चल रहे हैं, जहां बच्चों और महिलाओं को पुलिस, कानूनी मदद, डॉक्टर और काउंसलिंग की सुविधा मिलती है। उन्होंने कहा कि POCSO और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट बेहतरीन कानून हैं, लेकिन चुनौतियां अभी बाकी हैं।
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हैदराबाद में पॉक्सो कानून पर आयोजित स्टेट लेवल मीट 2025 के उद्घाटन सत्र में बोलते हुए सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में न्याय व्यवस्था को बच्चों के जख्मों को और न बढ़ाने वाला बनाना होगा। उन्होंने कहा कि जब तक बच्चे सही मायनों में न्याय महसूस नहीं करते, तब तक हमारा काम अधूरा है।
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सिर्फ अदालत नहीं, बाहर भी चाहिए बच्चों की सुरक्षा
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सिर्फ अदालत के अंदर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें घर, स्कूल, मोहल्ले और समाज में हर जगह सुरक्षित महसूस कराना जरूरी है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब कोई बच्चा अपने साथ हुए अपराध की बार-बार पुलिस, शिक्षक, डॉक्टर, वकील और फिर जज के सामने कहानी सुनाता है, तो उसकी आवाज कमजोर पड़ जाती है। यही सिस्टम की असल खामी है।
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सिस्टम बच्चों की तकलीफ और बढ़ाता है
है कि बच्चे की तकलीफ नजरअंदाज कर देता है, तब असल में हम दोनों को ही नुकसान पहुंचाते हैं। यह समस्या सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि सिस्टम की मूलभूत कमजोरी है।
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बच्चों की सुरक्षा सिर्फ कानून का नहीं, नैतिक दायित्व भी
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सिर्फ कानूनी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य भी है। भारत जैसे सामाजिक देश में यह संविधान का भी वादा है। उन्होंने कहा कि बच्चों के पुनर्वास को किसी फुटनोट की तरह नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की बुनियाद बनाना होगा।
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तेलंगाना में ‘भरोसा प्रोजेक्ट’ बच्चों की मदद को आगे
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी कार्यक्रम में कहा कि बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा उनकी सरकार की पहली प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि तेलंगाना में ‘भरोसा प्रोजेक्ट’ के तहत 29 केंद्र चल रहे हैं, जहां बच्चों और महिलाओं को पुलिस, कानूनी मदद, डॉक्टर और काउंसलिंग की सुविधा मिलती है। उन्होंने कहा कि POCSO और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट बेहतरीन कानून हैं, लेकिन चुनौतियां अभी बाकी हैं।
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