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'दक्खन में ही कब्र ढूंढ लें': कौन थे संभाजी महाराज, औरंगजेब के लिए सच हुई जिनकी चेतावनी? जानें छावा का इतिहास
Thu, 13 Feb 2025 04:30 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 13 Feb 2025 04:30 PM IST
सार
छत्रपति संभाजी महाराज कौन थे? छत्रपति शिवाजी महाराज के शासन के दौरान संभाजी महाराज की मराठा शासन में क्या भूमिका रही? इतिहास की किताबों में संभाजी के बारे में क्या वर्णन मिलता है? इसके अलावा छत्रपति शिवाजी के निधन के बाद संभाजी ने मुगलों के खिलाफ कैसे मोर्चा संभाला और उन्होंने मराठा साम्राज्य का कैसे नेतृत्व किया? आइये जानते हैं...
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छत्रपति संभाजी महाराज।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारत में शुक्रवार को बॉलीवुड फिल्म 'छावा' रिलीज हो रही है। इस फिल्म की कहानी जिस ऐतिहासिक शख्सियत पर आधारित है, उन्हें लेकर पूरे देश में चर्चा जारी है। छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद मराठा साम्राज्य का आठ वर्षों तक शासन संभालने वाले छत्रपति संभाजी महाराज से जुड़े कई किस्से भी सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे हैं। हालांकि, इतिहास की किताबों में जितना जिक्र मुगल शासन का मिलता है, छत्रपति संभाजी महाराज का जिक्र उसके मुकाबले काफी कम है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर छत्रपति संभाजी महाराज कौन थे? छत्रपति शिवाजी महाराज के शासन के दौरान संभाजी महाराज की मराठा शासन में क्या भूमिका रही? इतिहास की किताबों में संभाजी के बारे में क्या वर्णन मिलता है? इसके अलावा छत्रपति शिवाजी के निधन के बाद संभाजी ने मुगलों के खिलाफ कैसे मोर्चा संभाला और उन्होंने मराठा साम्राज्य का कैसे नेतृत्व किया? आइये जानते हैं...
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर छत्रपति संभाजी महाराज कौन थे? छत्रपति शिवाजी महाराज के शासन के दौरान संभाजी महाराज की मराठा शासन में क्या भूमिका रही? इतिहास की किताबों में संभाजी के बारे में क्या वर्णन मिलता है? इसके अलावा छत्रपति शिवाजी के निधन के बाद संभाजी ने मुगलों के खिलाफ कैसे मोर्चा संभाला और उन्होंने मराठा साम्राज्य का कैसे नेतृत्व किया? आइये जानते हैं...
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कौन थे छत्रपति संभाजी महाराज?
संभाजी राजे का जन्म 14 मई 1657 को महाराष्ट्र के पुणे से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पुरंदर के किले में हुआ था। वे छत्रपति शिवाजी महाराज के दो बेटों में से सबसे बड़े थे। यूं तो शिवाजी ने आठ शादियां की थीं और इनमें से अधिकतर विवाह राजनीतिक मकसदों से किए गए थे, लेकिन इन आठ शादियों से उनकी छह बेटियां और दो बेटे हुए। सबसे बड़े बेटे- संभाजी और उसके बाद छोटे बेटे राजाराम। संभाजी और राजाराम की उम्र में करीब 13 वर्षों का अंतर था।
संभाजी राजे छत्रपति शिवाजी महाराज और उनकी पहली पत्नी सईबाई के बेटे थे। संभाजी जब दो साल के थे, तभी उनकी मां का देहांत हो गया। इसके चलते संभाजी की परवरिश उनकी दादी यानी शिवाजी की मां जिजाबाई ने की। संभाजी की पढ़ाई के लिए शिवाजी महाराज ने कई विद्वानों को रखा था। संभाजी भी अपनी जबरदस्त प्रतिभा की वजह से संस्कृत पर जबरदस्त पकड़ रखते थे। नौ वर्ष की उम्र में संभाजी को राजनीतिक बंदी के तौर पर राजपूत राजा जय सिंह-I के यहां भेज दिया गया। इसी दौर का एक किस्सा लोकप्रिय है। बताया जाता है कि शिवाजी महाराज औरंगजेब की अदालत में आगरा पहुंचे थे। यहां मुगल शासक ने शिवाजी और संभाजी को नजरबंद करने का आदेश दे दिया।
संभाजी राजे का जन्म 14 मई 1657 को महाराष्ट्र के पुणे से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पुरंदर के किले में हुआ था। वे छत्रपति शिवाजी महाराज के दो बेटों में से सबसे बड़े थे। यूं तो शिवाजी ने आठ शादियां की थीं और इनमें से अधिकतर विवाह राजनीतिक मकसदों से किए गए थे, लेकिन इन आठ शादियों से उनकी छह बेटियां और दो बेटे हुए। सबसे बड़े बेटे- संभाजी और उसके बाद छोटे बेटे राजाराम। संभाजी और राजाराम की उम्र में करीब 13 वर्षों का अंतर था।
संभाजी राजे छत्रपति शिवाजी महाराज और उनकी पहली पत्नी सईबाई के बेटे थे। संभाजी जब दो साल के थे, तभी उनकी मां का देहांत हो गया। इसके चलते संभाजी की परवरिश उनकी दादी यानी शिवाजी की मां जिजाबाई ने की। संभाजी की पढ़ाई के लिए शिवाजी महाराज ने कई विद्वानों को रखा था। संभाजी भी अपनी जबरदस्त प्रतिभा की वजह से संस्कृत पर जबरदस्त पकड़ रखते थे। नौ वर्ष की उम्र में संभाजी को राजनीतिक बंदी के तौर पर राजपूत राजा जय सिंह-I के यहां भेज दिया गया। इसी दौर का एक किस्सा लोकप्रिय है। बताया जाता है कि शिवाजी महाराज औरंगजेब की अदालत में आगरा पहुंचे थे। यहां मुगल शासक ने शिवाजी और संभाजी को नजरबंद करने का आदेश दे दिया।
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हालांकि, शिवाजी मुगलों को चकमा देने में सफल हो गए। इस दौरान संभाजी भी उनके साथ थे। जब शिवाजी आगरा से महाराष्ट्र लौट रहे थे, तब उन्होंने संभाजी को मथुरा में एक रिश्तेदार के यहां छोड़ दिया और उनकी मृत्यु की अफवाह फैला दी। आखिरकार जब मुगलों को लगा कि शिवाजी उनकी पहुंच से बाहर हैं और संभाजी अब दुनिया में नहीं हैं तब उनकी खोज बंद कर दी गई। इसके बाद शिवाजी महाराज ने संभाजी को सही सलामत महाराष्ट्र पहुंचाने का इंतजाम किया।
महज 9 वर्ष की उम्र में हुई थी संभाजी की शादी
छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा शासन का दायरा बढ़ाने के लिए वैवाहिक गठबंधनों को अहम जरिया बनाया। 1664 के अंत में उन्होंने संभाजी का विवाह दक्षिण-पश्चिम महाराष्ट्र के तल-कोंकणी क्षेत्र में ताकतवर देशमुख परिवार में तय कर दिया। उनकी पत्नी जीवुबाई उर्फ येसुबाई पिलाजी राव शिर्के की बेटी थीं। इस विवाह के जरिए शिवाजी को मराठा साम्राज्य को कोंकण क्षेत्र तक बढ़ाने में मदद मिली।
बुरे रवैये को लेकर फैली अफवाहें, शिवाजी महाराज ने पन्हाला में कैद किया
विश्वास पाटिल की किताब महासम्राट और कमल गोखले की किताब शिवपुत्र संभाजी में संभाजी महाराज के आगे के जीवन का जिक्र मिलता है। बताया जाता है कि 1674 में जब शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ तब संभाजी का उनका उत्तराधिकारी बनना तय माना जा रहा था। हालांकि, इसी दौर में संभाजी को लेकर कई तरह की खबरें आने लगीं। इनमें कुछ खबरें उनके कथित खराब व्यवहार से जुड़ी थीं। इतना ही नहीं संभाजी की 'बगावत' वाली कथित छवि को भी बल मिलने लगा था।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा शासन का दायरा बढ़ाने के लिए वैवाहिक गठबंधनों को अहम जरिया बनाया। 1664 के अंत में उन्होंने संभाजी का विवाह दक्षिण-पश्चिम महाराष्ट्र के तल-कोंकणी क्षेत्र में ताकतवर देशमुख परिवार में तय कर दिया। उनकी पत्नी जीवुबाई उर्फ येसुबाई पिलाजी राव शिर्के की बेटी थीं। इस विवाह के जरिए शिवाजी को मराठा साम्राज्य को कोंकण क्षेत्र तक बढ़ाने में मदद मिली।
बुरे रवैये को लेकर फैली अफवाहें, शिवाजी महाराज ने पन्हाला में कैद किया
विश्वास पाटिल की किताब महासम्राट और कमल गोखले की किताब शिवपुत्र संभाजी में संभाजी महाराज के आगे के जीवन का जिक्र मिलता है। बताया जाता है कि 1674 में जब शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ तब संभाजी का उनका उत्तराधिकारी बनना तय माना जा रहा था। हालांकि, इसी दौर में संभाजी को लेकर कई तरह की खबरें आने लगीं। इनमें कुछ खबरें उनके कथित खराब व्यवहार से जुड़ी थीं। इतना ही नहीं संभाजी की 'बगावत' वाली कथित छवि को भी बल मिलने लगा था।
इन खबरों को फैलाने के पीछे तब संभाजी की सौतेली मां सोयराबाई का हाथ होने की बात कही जाती थी, जो कि अपने बेटे राजाराम को शिवाजी का उत्तराधिकारी घोषित करवाना चाहती थीं। कहा जाता है कि इसी एवज में सोयराबाई ने संभाजी की बदनामी वाली खबरों को बल दिया। 1674 में ही संभाजी की सबसे बड़ी समर्थकों में से एक जिजाबाई का निधन हो गया, जिससे संभाजी एक असहज स्थिति में पहुंच गए।
जेएल मेहता की किताब 'एडवांस्ड स्टडी इन द हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न इंडिया' के मुताबिक, शिवाजी महाराज ने संभाजी का बेहतरीन प्रशिक्षण कराया था। ऐसे में वह एक अच्छे सैनिक बने। लेकिन कुछ कारणों से उनके व्यवहार को लेकर नकारात्मक खबरें फैलने लगीं। आखिरकार इन खबरों को देखते हुए 1678 में छत्रपति शिवाजी महाराज ने संभाजी को पन्हाला के किले में निगरानी में रख दिया।
जेएल मेहता की किताब 'एडवांस्ड स्टडी इन द हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न इंडिया' के मुताबिक, शिवाजी महाराज ने संभाजी का बेहतरीन प्रशिक्षण कराया था। ऐसे में वह एक अच्छे सैनिक बने। लेकिन कुछ कारणों से उनके व्यवहार को लेकर नकारात्मक खबरें फैलने लगीं। आखिरकार इन खबरों को देखते हुए 1678 में छत्रपति शिवाजी महाराज ने संभाजी को पन्हाला के किले में निगरानी में रख दिया।
संभाजी कुछ महीने सतारा के पन्हाला किले में कैद रहने के बाद 1678 में ही अपनी पत्नी के साथ भाग निकले। 21 वर्ष की उम्र में उन्होंने औरंगाबाद में तैनात मुगल गवर्नर दिलेर खान का साथ लिया। संभाजी इससे पहले 11 साल उम्र में दिलेर खान से मिल चुके थे। ऐसे में दिलेर खान को मराठा साम्राज्य में संभाजी की स्थिति और कौशल के बारे में काफी अच्छे से पता था। बताया जाता है कि संभाजी ने तकरीबन एक साल तक मुगलों के साथ काम किया। हालांकि, इस दौरान एक मौका ऐसा आया, जब संभाजी को मुगलों का क्रूर रवैया पसंद नहीं आया और उन्होंने दिलेर खान का साथ छोड़ने का फैसला किया। यह समय था 1679 में भूपलगढ़ के किले पर हमले का, जहां दिलेर खान और उसकी सेना ने स्थानीय लोगों के साथ क्रूरता भरा व्यवहार किया और महाराष्ट्र के कई गांवों को अपना गुलाम बना लिया।
जिजाबाई और शिवाजी के साथ संवेदना भरे माहौल में पले-बढ़े संभाजी को यह रास नहीं आया। इतना ही नहीं, संभाजी को औरंगजेब के उस कथित आदेश की भी जानकारी मिली थी जिसके तहत उन्हें गिरफ्तार कर दिल्ली भेजा जाना था। आखिरकार नवंबर 1679 के करीब वे अपनी पत्नी यशुबाई के साथ मुगलों को चकमा देकर बीजापुर पहुंच गए। दिसंबर की शुरुआत में वे पन्हला पहुंचे, जहां उनकी शिवाजी महाराज से मुलाकात हुई। पिता-पुत्र की मुलाकात काफी गर्मजोशी से हुई थी, हालांकि इससे मराठा साम्राज्य में चल रहा उत्तराधिकार का मसला नहीं सुलझा।
जिजाबाई और शिवाजी के साथ संवेदना भरे माहौल में पले-बढ़े संभाजी को यह रास नहीं आया। इतना ही नहीं, संभाजी को औरंगजेब के उस कथित आदेश की भी जानकारी मिली थी जिसके तहत उन्हें गिरफ्तार कर दिल्ली भेजा जाना था। आखिरकार नवंबर 1679 के करीब वे अपनी पत्नी यशुबाई के साथ मुगलों को चकमा देकर बीजापुर पहुंच गए। दिसंबर की शुरुआत में वे पन्हला पहुंचे, जहां उनकी शिवाजी महाराज से मुलाकात हुई। पिता-पुत्र की मुलाकात काफी गर्मजोशी से हुई थी, हालांकि इससे मराठा साम्राज्य में चल रहा उत्तराधिकार का मसला नहीं सुलझा।
वाईजी भावे की किताब- फ्रॉम द डेथ ऑफ शिवाजी टू द डेथ ऑफ औरंगजेब में दी गई जानकारी के मुताबिक, जब संभाजी लौटे तो शिवाजी ने अपने साम्राज्य को दो हिस्सों में बांटने का मन बना लिया था। कर्नाटक में शिवाजी ने जहां-जहां जीत हासिल की थी, वह हिस्सा संभाजी को और असल मराठा साम्राज्य राजाराम को सौंपने की बातें सामने आने लगी थीं। राजाराम के शासन संभालने लायक न होने तक इस साम्राज्य को शिवाजी के आठ करीबियों का एक परिषद देखने वाला था।
असल मराठा साम्राज्य पर अपने दावे को राजाराम के हक में जाता देखने के बावजूद तब संभाजी ने पिता के इस फैसले का विरोध नहीं किया था। हालांकि, संभाजी के कथित खराब व्यवहार की खबरें एक बार फिर फैलने लगीं। नतीजतन उन्हें फिर से पन्हाला के किले में कैद कर दिया गया।
असल मराठा साम्राज्य पर अपने दावे को राजाराम के हक में जाता देखने के बावजूद तब संभाजी ने पिता के इस फैसले का विरोध नहीं किया था। हालांकि, संभाजी के कथित खराब व्यवहार की खबरें एक बार फिर फैलने लगीं। नतीजतन उन्हें फिर से पन्हाला के किले में कैद कर दिया गया।
शिवाजी के निधन के बाद राजगद्दी पर लौटे, सौतेली मां को करवाया गिरफ्तार
3 अप्रैल 1680 को छत्रपति शिवाजी महाराज का निधन हो गया। उन्होंने न तो कोई उत्तराधिकारी नियुक्त किया था, न ही कोई वसीयत छोड़ी थी। उनके निधन की खबर शुरुआत में संभाजी तक नहीं पहुंची। इसकी वजह सोयराबाई के आदेशों को बताया जाता है। सोयराबाई अपने बेटे राजाराम को अगला छत्रपति बनवाना चाहती थीं। 21 अप्रैल 1680 को राजाराम को शिवाजी महाराज का उत्तराधिकारी नियुक्त कर छत्रपति बनाने का एलान कर दिया गया।
हालांकि, संभाजी को कुछ मराठा सहयोगियों से इसकी जानकारी मिल गई। 22 वर्षीय संभाजी ने जानकारी के मिलने के बाद किले के प्रमुख रखवाले को मार गिराया और पन्हाला के किले को अपने नियंत्रण में ले लिया। किले के सैनिकों ने भी संभाजी के आदेशों को मानना शुरू कर दिया। आखिरकार 18 जून 1680 को संभाजी ने अपनी सेना के साथ रायगढ़ के किले पर नियंत्रण हासिल कर लिया। संभाजी ने औपचारिक तौर पर 20 जुलाई 1680 को छत्रपति के तौर पर सिंहासन संभाला। इस दौरान 10 वर्ष के राजाराम, उनकी पत्नी जानकी बाई और सौतेली मां सोयराबाई को कैद कर दिया गया। बाद में सोयराबाई को शिवाजी महाराज को जहर देने के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई।
3 अप्रैल 1680 को छत्रपति शिवाजी महाराज का निधन हो गया। उन्होंने न तो कोई उत्तराधिकारी नियुक्त किया था, न ही कोई वसीयत छोड़ी थी। उनके निधन की खबर शुरुआत में संभाजी तक नहीं पहुंची। इसकी वजह सोयराबाई के आदेशों को बताया जाता है। सोयराबाई अपने बेटे राजाराम को अगला छत्रपति बनवाना चाहती थीं। 21 अप्रैल 1680 को राजाराम को शिवाजी महाराज का उत्तराधिकारी नियुक्त कर छत्रपति बनाने का एलान कर दिया गया।
हालांकि, संभाजी को कुछ मराठा सहयोगियों से इसकी जानकारी मिल गई। 22 वर्षीय संभाजी ने जानकारी के मिलने के बाद किले के प्रमुख रखवाले को मार गिराया और पन्हाला के किले को अपने नियंत्रण में ले लिया। किले के सैनिकों ने भी संभाजी के आदेशों को मानना शुरू कर दिया। आखिरकार 18 जून 1680 को संभाजी ने अपनी सेना के साथ रायगढ़ के किले पर नियंत्रण हासिल कर लिया। संभाजी ने औपचारिक तौर पर 20 जुलाई 1680 को छत्रपति के तौर पर सिंहासन संभाला। इस दौरान 10 वर्ष के राजाराम, उनकी पत्नी जानकी बाई और सौतेली मां सोयराबाई को कैद कर दिया गया। बाद में सोयराबाई को शिवाजी महाराज को जहर देने के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई।
1681-1689: मुगलों से टकराव, औरंगजेब को चेतावनी
संभाजी ने छत्रपति बनते ही अपने पिता की तरह मुगलों से जंग जारी रखी। 1682 में औरंगजेब के नेतृत्व में मुगल तेजी से दक्खन पर कब्जा करने की कोशिश में थे। इसके लिए उन्होंने मराठा साम्राज्य को चारों तरफ से घेरने की तैयारी की। हालांकि, संभाजी ने जबरदस्त तैयारी की और गुरिल्ला युद्ध तकनीक के जरिए अपने से काफी बड़ी मुगल सेना को कई बार युद्धों में परास्त किया। इसी दौर में मराठा सेनाओं ने बुरहानपुर पर एक जबरदस्त हमला किया था, जहां मुगलों की सेनाएं तैनात थीं। मराठाओं का हमला इतना जबरदस्त था कि मुगलों को भारी नुकसान हुआ। इसी कड़ी में मराठाओं के एक के बाद एक हमलों के चलते 1685 तक मुगल शासक मराठा साम्राज्य का हिस्सा हासिल नहीं कर पाए। औरंगजेब ने इसके बाद भी मराठा साम्राज्य पर हमले की कोशिशें जारी रखीं, लेकिन कठोर मौसम और पठारी इलाकों में मुगलों को खास सफलता नहीं मिली।
संभाजी महाराज और औरंगजेब की दुश्मनी का एक और किस्सा काफी मशहूर है। दरअसल, 1681 में जब औरंगजेब का चौथा बेटा- मोहम्मद अकबर जब बगावत कर दक्खन में ही कुछ बागी सैनिकों को लेकर अलग हो गया तो औरंगजेब ने उसका पीछा किया और बागी सैनिकों को बुरी तरह परास्त कर दिया। औरंगजेब का बेटा अपनी जान का खतरा जताते हुए संभाजी से मदद मांगने पहुंचा। संभाजी ने इस मौके का फायदा उठाया और अकबर को पनाह दे दी।
संभाजी ने छत्रपति बनते ही अपने पिता की तरह मुगलों से जंग जारी रखी। 1682 में औरंगजेब के नेतृत्व में मुगल तेजी से दक्खन पर कब्जा करने की कोशिश में थे। इसके लिए उन्होंने मराठा साम्राज्य को चारों तरफ से घेरने की तैयारी की। हालांकि, संभाजी ने जबरदस्त तैयारी की और गुरिल्ला युद्ध तकनीक के जरिए अपने से काफी बड़ी मुगल सेना को कई बार युद्धों में परास्त किया। इसी दौर में मराठा सेनाओं ने बुरहानपुर पर एक जबरदस्त हमला किया था, जहां मुगलों की सेनाएं तैनात थीं। मराठाओं का हमला इतना जबरदस्त था कि मुगलों को भारी नुकसान हुआ। इसी कड़ी में मराठाओं के एक के बाद एक हमलों के चलते 1685 तक मुगल शासक मराठा साम्राज्य का हिस्सा हासिल नहीं कर पाए। औरंगजेब ने इसके बाद भी मराठा साम्राज्य पर हमले की कोशिशें जारी रखीं, लेकिन कठोर मौसम और पठारी इलाकों में मुगलों को खास सफलता नहीं मिली।
संभाजी महाराज और औरंगजेब की दुश्मनी का एक और किस्सा काफी मशहूर है। दरअसल, 1681 में जब औरंगजेब का चौथा बेटा- मोहम्मद अकबर जब बगावत कर दक्खन में ही कुछ बागी सैनिकों को लेकर अलग हो गया तो औरंगजेब ने उसका पीछा किया और बागी सैनिकों को बुरी तरह परास्त कर दिया। औरंगजेब का बेटा अपनी जान का खतरा जताते हुए संभाजी से मदद मांगने पहुंचा। संभाजी ने इस मौके का फायदा उठाया और अकबर को पनाह दे दी।
इस बीच एक मौके पर संभाजी महाराज ने अकबर की बहन जीनत को एक चिट्ठी लिखी। औरंगजेब को इस जब इस चिट्ठी का पता लगा तो इसे दरबार में पढ़कर सुनाया गया। इसमें लिखा था,
1689: साजिश का शिकार हो गए संभाजी
संभाजी महाराज के शासन के दौरान मुगल सेनाओं ने मराठा साम्राज्य को कब्जे में लेने की काफी कोशिशें कीं, लेकिन बीजापुर और गोलकुंडा के अलावा उसे बाकी जगहों को कब्जे में लेने में सफलता नहीं मिली। सन 1687 में मुगलों के एक और हमले का मराठा सेना ने माकूल जवाब दिया और जीत हासिल की। हालांकि, इसमें संभाजी के विश्वासपात्र और सेनापति हंबीरराव मोहिते की जान चली गई। इससे मराठा सेना काफी कमजोर हो गई। इस कमजोरी के बीच मराठा साम्राज्य में ही संभाजी के दुश्मनों ने उनके खिलाफ साजिशें शुरू कर दीं और उनकी जासूसी की जाने लगी।
1689 में मराठा नेताओं की एक बैठक के लिए जब संभाजी संगमेश्वर पहुंचे तो मुगलों की एक सेना ने उन पर घात लगाकर हमला कर दिया। संभाजी को बहादुरगढ़ ले जाया गया, जहां औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम कबूल करने का प्रस्ताव दिया। हालांकि, संभाजी नहीं माने। इसके बाद उनके हाथ और गर्दन को लकड़ी के तख्ते में फंसा दिया गया और उन्हें बेड़ियों में रखा जाने लगा। बताया जाता है कि एक मौके पर जब औरंगजेब ने उन्हें नजरें नीची करने को कहा तो संभाजी ने इससे इनकार करते हुए घूरना शुरू कर दिया। इसके बाद औरंगजेब ने उनकी आंखें निकलवा दीं।
संभाजी महाराज के शासन के दौरान मुगल सेनाओं ने मराठा साम्राज्य को कब्जे में लेने की काफी कोशिशें कीं, लेकिन बीजापुर और गोलकुंडा के अलावा उसे बाकी जगहों को कब्जे में लेने में सफलता नहीं मिली। सन 1687 में मुगलों के एक और हमले का मराठा सेना ने माकूल जवाब दिया और जीत हासिल की। हालांकि, इसमें संभाजी के विश्वासपात्र और सेनापति हंबीरराव मोहिते की जान चली गई। इससे मराठा सेना काफी कमजोर हो गई। इस कमजोरी के बीच मराठा साम्राज्य में ही संभाजी के दुश्मनों ने उनके खिलाफ साजिशें शुरू कर दीं और उनकी जासूसी की जाने लगी।
1689 में मराठा नेताओं की एक बैठक के लिए जब संभाजी संगमेश्वर पहुंचे तो मुगलों की एक सेना ने उन पर घात लगाकर हमला कर दिया। संभाजी को बहादुरगढ़ ले जाया गया, जहां औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम कबूल करने का प्रस्ताव दिया। हालांकि, संभाजी नहीं माने। इसके बाद उनके हाथ और गर्दन को लकड़ी के तख्ते में फंसा दिया गया और उन्हें बेड़ियों में रखा जाने लगा। बताया जाता है कि एक मौके पर जब औरंगजेब ने उन्हें नजरें नीची करने को कहा तो संभाजी ने इससे इनकार करते हुए घूरना शुरू कर दिया। इसके बाद औरंगजेब ने उनकी आंखें निकलवा दीं।
इतिहासकार डेनिस किंकेड के मुताबिक, जब संभाजी ने कई बार इस्लाम मानने के प्रस्ताव से इनकार कर दिया तो औरंगजेब ने उनकी जुबान भी निकलवा ली। इस स्थिति में संभाजी कुछ दिन जिंदा रहे, लेकिन मुगल शासक ने उनकी यातनाएं बढ़ा दीं। संभाजी के एक-एक कर सभी अंग काटे गए और आखिर में 11 मार्च 1689 को उनका सिर धड़ से जुदा कर उनकी हत्या कर दी गई। इस दौरान औरंगजेब ने संभाजी की पत्नी और बेटे को कैद कर दिया।
औरंगजेब ने मराठा साम्राज्य में अपना डर कायम करने के लिए संभाजी का सिर दक्षिण के कई अहम शहरों में घुमाया, लेकिन औरंगजेब की यह हरकत उल्टी पड़ गई। इस घटना के बाद मराठा साम्राज्य में जो शासक अलग-थलग पड़े थे, वह सभी साथ आ गए और मुगलों को कब्जे से दूर रखा।
संभाजी महाराज के निधन के बाद छत्रपति शिवाजी के छोटे बेटे राजाराम की ताजपोशी हुई। हालांकि, मुगलों ने उन्हें भी कैद करने की कोशिश की। मुगलों से जंग के दौरान 1699 में राजाराम का निधन हो गया। इसके बाद उनकी पत्नी ताराबाई ने औरंगजेब के खिलाफ लड़ाई जारी रखी।
औरंगजेब ने मराठा साम्राज्य में अपना डर कायम करने के लिए संभाजी का सिर दक्षिण के कई अहम शहरों में घुमाया, लेकिन औरंगजेब की यह हरकत उल्टी पड़ गई। इस घटना के बाद मराठा साम्राज्य में जो शासक अलग-थलग पड़े थे, वह सभी साथ आ गए और मुगलों को कब्जे से दूर रखा।
संभाजी महाराज के निधन के बाद छत्रपति शिवाजी के छोटे बेटे राजाराम की ताजपोशी हुई। हालांकि, मुगलों ने उन्हें भी कैद करने की कोशिश की। मुगलों से जंग के दौरान 1699 में राजाराम का निधन हो गया। इसके बाद उनकी पत्नी ताराबाई ने औरंगजेब के खिलाफ लड़ाई जारी रखी।
गौरतलब है कि संभाजी ने औरंगजेब को दक्खन से लौट जाने या दक्खन में ही अपनी कब्र की तैयारी करने से जुड़ी जो चेतावनी दी थी, वह आखिर में सही साबित हुई। मुगल शासक आखिरी समय तक दक्खन पर कब्जा नहीं कर पाए और औरंगजेब 88 साल की उम्र में दक्खन में ही दफन हुआ। मराठा साम्राज्य की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां मुगल साम्राज्य औरंगजेब की मृत्यु के बाद से ही लगातार ढलान पर चला गया, वहीं मराठा साम्राज्य संभाजी के निधन के बाद भी निरंतर चलता रहा।