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Cheetah: भारत की जमीन पर फिर लौटेगा चीता, बेताबी से इंतजार

भूपेंद्र यादव, केंद्रीय मंत्री, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन Published by: भूपेंद्र यादव Updated Mon, 12 Sep 2022 06:37 AM IST
सार

विकास के पश्चिमी मॉडल ने न केवल अनेक प्रजातियों को खतरे में डाला, बल्कि पृथ्वी ग्रह के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। युगों से हम ‘प्रकृति रक्षति रक्षिता’ पर विश्वास करते आए हैं।

चीतों की वापसी
चीतों की वापसी - फोटो : पेक्सेल्स
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विस्तार

चीते की वापसी की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और भारत एक बार फिर जमीन के सबसे तेज जानवर का बेताबी से इंतजार कर रहा है, जिसकी गुर्राहट कभी समूचे देश के जंगलों में गूंजती थी। 17 सितंबर को चीते भारत में लौटेंगे। जल्द ही चीता मध्य प्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान में विचरण कर रहा होगा। भारत में चीतों के न रहने के लिए पथ-निर्धारण, इनाम और शिकार के खेल के लिए बड़े पैमाने पर जानवरों को पकड़ना, पर्यावास में व्यापक बदलाव से उनके शिकार के आधार का सिकुड़ना जैसे कारण हैं। ये सभी कारण मानव की कार्रवाइयों से प्रेरित हैं। इसलिए जंगल में चीते की वापसी एक पारिस्थितिकीय गलती को सुधारने का मौका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मिशन लाइफ का उद्देश्य समावेशी दुनिया का निर्माण करना है, जहां मनुष्य, जीव-जंतुओं सहित प्रकृति के साथ सद्भाव से रहते हैं।



विकास के पश्चिमी मॉडल ने न केवल अनेक प्रजातियों को खतरे में डाला, बल्कि पृथ्वी ग्रह के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। युगों से हम ‘प्रकृति रक्षति रक्षिता’ पर विश्वास करते आए हैं। आजादी के बाद से देश ने केवल एक विशाल जंगली स्तनधारी को खोया है। हम अपनी आबादी के आकार और विकास संबंधी जरूरतों के बावजूद बाघ, शेर, एशियाई हाथी, घड़ियाल और एक सींग वाले गैंडे सहित कई महत्वपूर्ण प्रजातियों व उनके पारिस्थितिकी तंत्रों को संरक्षित करने में सक्षम रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट लायन और प्रोजेक्ट एलीफेंट के साथ इन बेहद महत्वपूर्ण प्रजातियों की तादाद बढ़ाने में भी समर्थ रहा है।




चीता खुले जंगलों, घास के मैदानों और चरागाहों के शून्य को भर देगा। चीता की वापसी धरती के टिकाऊ पर्यावरण के निर्माण की दिशा में एक महत्वाकांक्षी कदम है,क्योंकि एक शीर्ष परभक्षी की वापसी ऐतिहासिक विकासवादी संतुलन को बहाल करती है, जो उनके पर्यावास की बहाली और शिकार के आधार के संरक्षण पर व्यापक प्रभाव डालती है। चीते की वापसी लुप्तप्राय प्रजातियों और खुले वन पारिस्थितिकी तंत्र सहित उसके शिकार-आधार की सुरक्षा को सुनिश्चित करेगी, जो कुछ हिस्सों में विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। प्रोजेक्ट चीता से पर्यावासों की जैव विविधता का संरक्षण होगा, उनके पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाओं और कार्बन को जब्त करने की अधिकतम क्षमता का उपयोग हो सकेगा। चीता को देखने के लिए आने वालों से स्थानीय निवासियों के आजीविका के विकल्पों को बढ़ावा मिलेगा।

विशाल मांसाहारी पशुओं की संख्या में हो रही गिरावट के क्रम को रोकने या उलटने के लिए दुनियाभर में उनके संरक्षण/स्थानांतरण का उपयोग किया जा रहा है। चूंकि भारत ने भी चीते की वापसी का विकल्प चुना है, ताकि  वह शीर्ष परभक्षी के रूप में चीते की वापसी के साथ उसके पारिस्थितिकी तंत्र की गिरावट का रुख पलट सके।   यूं तो चीते की पुन: वापसी कुनो में हो रही है, लेकिन उसकी तादाद में संभावित वृद्धि होने पर उन्हें गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों में प्रवेश कराया जा सकता है। इससे वन्यजीवन के अन्य रूपों और संबद्ध पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के साथ-साथ भारत की खोई हुई विरासत को पूरी तरह बहाल करने में मदद करेगी।

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