Chandrayaan3Landing: जब अंतरिक्ष में भारत की सफलता से खुश नहीं थे कई देश, तकनीक साझा करने से किया गुरेज
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विस्तार
'चंद्रमा' की सतह (दक्षिणी ध्रुव) पर 'चंद्रयान-3' को पहुंचाना, यह सफर 'इसरो' के वैज्ञानिकों के लिए आसान नहीं रहा। कई देश, जिनके पास उच्च तकनीक रही, लेकिन उन्होंने भारत के अंतरिक्ष मिशन के साथ उसे साझा करने से गुरेज किया। कहीं न कहीं उन देशों के मन में डर का भाव था कि भारत, अंतरिक्ष में कहीं उनसे आगे न निकल जाए। भारतीय वैज्ञानिकों ने इसे एक चुनौती के तौर पर लिया। इसरो के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. एस वैंक्टेशवर शर्मा ने बताया कि चंद्रयान 3 मिशन, विशुद्ध रूप से भारतीय है। इस मिशन की बेसिक तकनीक भारत ने विकसित की है। दूसरे देश जो अंतरिक्ष के क्षेत्र में खुद को बहुत आगे बताते हैं, उन्होंने भारत के साथ सभी तरह की तकनीक साझा नहीं की। बहुत कुछ छिपाया गया।
सहयोग के नाम पर मिले कुछ कमेंट्स
डॉ. एस वैंक्टेशवर शर्मा ने कहा, चंद्रयान 3 मिशन पर लगभग साढ़े छह सौ करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसमें हमें कहीं बाहर से कोई सूचना नहीं मिली। किसी देश से कोई अहम सहयोग नहीं मिला। कुछ देशों ने सहयोग के नाम पर कुछ कमेंट्स कर दिए। उन्होंने अपने कमेंट्स को ही सहयोग मान लिया। चंद्रयान 3 की सफलता विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगी। पब्लिक आउटरीच, बिजनेस और इंडस्ट्री के क्षेत्र में भारत को जबरदस्त प्रोत्साहन मिलेगा। इसे वैज्ञानिकों की रिसर्च और साधना का स्पिन आफ कहते हैं। इलेक्ट्रॉनिक, मेकेनिकल और डायनेमिक्स आदि क्षेत्रों में नई बदलाव देखने को मिलेंगे।
चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर उतारने की तैयारी
'चंद्रयान-3' की सॉफ्ट लैंडिंग के बाद भारत, दुनिया में रूस, अमेरिका और चीन के बराबर आ जाएगा। अभी तक इन्हीं तीन देशों को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने का मुकाम हासिल है। हालांकि इसरो ने 'चंद्रयान-3' को चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर उतारने की तैयारी की है। ये अपने आप में एक बड़ी बात है। अभी तक किसी भी देश ने चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर सफल एवं सॉफ्ट लैंडिंग नहीं की है। इस मामले में दूसरे देशों के पास भारत से उन्नत तकनीक है। कई देशों ने भारत से वह तकनीक साझा नहीं की। इसके बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने बलबूते चंद्रयान 3 को दक्षिण ध्रुव पर उतारने की तैयारी शुरु की थी।