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Chandrayaan-3: तैयार है प्लान 'बी', चट्टान और विशाल गड्ढे से भी निपटने का है इंतजाम, यहां लगेगी ज्यादा ताकत
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चंद्रयान-3।
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
इसरो ने 'चंद्रयान-3' को 'चंद्रमा' की सतह (दक्षिणी ध्रुव) पर उतारने के लिए पूरी तैयारी कर ली है। 23 अगस्त की शाम को चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग कराई जाएगी। भारत के इस मिशन पर दुनिया की नजरें टिकी हैं। 'चंद्रयान-3' की सॉफ्ट लैंडिंग के बाद भारत, दुनिया में रूस, अमेरिका और चीन के बराबर आ जाएगा। अभी तक इन्हीं तीन देशों को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने का मुकाम हासिल है।अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का कहना है कि 'इसरो' ने चंद्रयान 3 की सॉफ्ट लैंडिंग के लिए प्लान 'बी' तैयार किया है। ये प्लान तभी अमल में लाया जाएगा, जब चंद्रमा पर विशालकाय आकार का कोई गड्ढा यानी क्रेटर सामने होगा। हालांकि, इसरो ने चट्टान और विशाल गड्ढे से भी निपटने का इंतजाम किया है। अंतिम क्षण में सॉफ्ट लैंडिंग की प्रक्रिया को 26 अगस्त तक बढ़ाया जा सकता है।
अगर क्रेटर ज्यादा बड़ा और गहरा नहीं है तो चिंता की कोई बात नहीं होगी। लैंडर और रोवर के सोलर पैनल को पर्याप्त धूप यानी एनर्जी मिलेगी। चंद्रमा पर लैंडर के उतरने का समय भी वही तय किया गया है, जब उस हिस्से में सूर्य की पर्याप्त रोशनी उपलब्ध होगी।
बता दें कि चंद्रमा पर विशालकाय गड्ढों की अच्छी खासी संख्या है। गहरे गड्ढों में सदियों से सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंचा है। इन क्षेत्रों में तापमान माइनस 245 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। चंद्रमा की सतह पर उल्कापिंड का गिरना, ज्वालामुखी फटना या भूगर्भ में किसी अन्य कारण से हुए विस्फोट के चलते ये विशालकाय आकार के गड्ढे 'क्रेटर' बन जाते हैं। इन्हें 'प्रहार' क्रेटर, धंसाव क्रेटर, ज्वालामुखीय क्रेटर, बिल क्रेटर और विस्फोट क्रेटर जैसी श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।
पूर्व वैज्ञानिक एवं प्रमुख रेडियो कार्बन डेटिंग लैब, बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान, लखनऊ, डॉ. सीएम नौटियाल का कहना है कि चंद्रयान 3 की 'सॉफ्ट लैंडिंग' सफलतापूर्वक होगी। इसके लिए सभी तैयारी कर ली गई है। लैंडर सेंसर की लगातार जांच हो रही है। इससे जुड़े विभिन्न उपकरण जैसे लेजर जड़त्वीय संदर्भ और एक्सेलेरोमीटर पैकेज, का-बैंड अल्टीमीटर, लैंडर पोजीशन डिटेक्शन कैमरा (एलपीडीसी), एलएचडीएसी (लैंडर खतरा जांच एवं बचाव कैमरा), लेजर अल्टीमीटर, लेजर डॉपलर वेलोसीमीटर, लैंडर क्षैतिज वेग कैमरा और माइक्रो स्टार सेंसर इनक्लिनोमीटर और टचडाउन सेंसर की स्थिति ठीक है।
लैंडिंग के वक्त बूस्टर रॉकेट की मदद ली जाती है ...
डॉ. सीएम नौटियाल के मुताबिक, लैंडिंग के दौरान बूस्टर रॉकेट की मदद ली जाती है। चूंकि चंद्रयान 3 में स्पीड और ऊंचाई, दोनों को मापने के यंत्र लगे हैं। बूस्टर रॉकेट का इस्तेमाल यहां पर स्पीड को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। यही कारण है कि इसे इसे उल्टी दिशा में फायर किया जाता है। इससे लैंडर की स्पीड कम होती चली जाती है। वह नीचे की तरफ तेजी से गिरना थम जाता है। लैंडिंग के समय दो तीन मीटर प्रति सेकंड की स्पीड रखी जाती है। इसरो ने चंद्रयान 3 मिशन के लिए हर तरह से सतर्कता बरती है। जितनी भी आशंकाएं हैं, उनकी काट निकाली गई हैं।
हालांकि, इसके बावजूद कुछ अप्रत्याशित हो जाता है। इसके लिए प्लान 'बी' तैयार किया गया है, लेकिन इसकी जरुरत पड़ेगी, यह संभावना कम ही नजर आती है। पिछली बार लैंडिंग के लिए आधे किलोमीटर का क्षेत्र तय किया गया था, इस बार 4 किमी x 2.4 किमी का क्षेत्र लिया गया है। लैंडिंग की जगह ऐसी रहेगी, जहां पर रोवर के बाहर निकलते ही उसे एनर्जी मिलनी शुरु हो जाए। यानी उस पर सूरज की लाइट आने लगे। अगर क्रेटर में रोवर उतर गया है तो उसे दीवार पर चढ़ने में दिक्कत आ सकती है। उसके गिरने की संभावना बन सकती है। ऐसे में रोवर अधिक एनर्जी चाहिए।