चमोली त्रासदी से प्रभावित नहीं होगी चारधाम यात्रा, पर्यटन सामान्य बनाए रखने के लिए तैयार है प्रशासनः सतपाल महाराज
- कोरोना काल में पूरी तरह ठप रहा पर्यटन का कारोबार, कुंभ के कारण तेज हुईं धार्मिक पर्यटन की गतिविधियां
- पर्यटन मंत्री ने कहा- चमोली त्रासदी से चारधाम यात्रा पर कोई असर नहीं पड़ेगा, सड़कों को साफ रखने के साथ-साथ अन्य आवश्यक तैयारियां भी कर रहा है प्रशासन
विस्तार
उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने कहा है कि चमोली त्रासदी के कारण चारधाम यात्रा पर कोई असर नहीं पड़ेगा। धार्मिक स्थलों पर जाने के लिए आवश्यक सड़कों को जल्दी ही पूरी तरह से साफ कर दिया जाएगा। आसपास के इलाकों में धार्मिक पर्यटकों के ठहरने के लिए किसी तरह की समस्या न हो, इसके लिए भी आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं। चारधाम यात्रा शुरू होने में अभी लगभग दो महीने का समय है। तब तक रास्तों पर पड़ा मलबा हटा दिया जाएगा।
सतपाल महाराज ने अमर उजाला से बातचीत करते हुए कहा कि चमोली त्रासदी दिन के समय होने के कारण जानमाल बचाने में काफी मदद मिली। केंद्र से सुरक्षा बलों के जवान और एनडीआरएफ की टीम तत्काल सक्रिय हुई, जिससे लोगों को बचाने में बड़ी मदद मिली। इसमें मौसम ने भी मदद की और त्रासदी के बाद बारिश या और बर्फबारी नहीं हुई। अगर यही त्रासदी रात के समय हुई होती तो स्थिति बहुत गंभीर होती जैसा कि केदारनाथ त्रासदी के समय हुआ था।
पता करेंगे कि पाइप लगा था या नहीं
एनटीपीसी प्लांट से भारी संख्या में लोगों के लापता होने की खबर है। इनके बचाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। सतपाल महाराज ने कहा कि नियमों के अनुसार जहां भी टनल में कामकाज होता है, वहां लगभग एक मीटर मोटाई की लोहे का मजबूत पाइप भी बिछाया जाती है। इससे ग्लेशियर टूटने, एवलांच होने या किसी अन्य दुर्घटना के समय लोग इसी के रास्ते से बचकर निकलते हैं। इस घटना में यह पाइप बिछाया गया था या नहीं, वे इसकी जांच कराएंगे।
अति संवेदनशील न होने की अपील
सतपाल महाराज ने कहा कि चमोली त्रासदी जैसी घटनाओं से लोग बेहद संवेदनशील हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि वे अपील करते हैं कि लोग धैर्य बनाए रखें और एजेंसियों को लोगों की जानमाल बचाने में सहयोग करें। उन्होंने कहा कि अति संवेदनशील होने से चीजें ज्यादा खराब हो जाती हैं और इससे बचने की कोशिश करनी चाहिए।
मंत्री ने कहा कि चमोली के रैनी गांव में यह त्रासदी हुई थी। इसके कारण विष्णु प्रयाग तक बहाव बहुत तेज था। लेकिन अलकनंदा तक आते-आते पानी और मलबे का वेग बहुत कम हो गया और स्थिति नियंत्रण में आ गई। श्रीनगर के बांध से पानी को खाली कराकर इसमें तेज रफ्तार का पानी रोकने की रणनीति बनाई गई है। इस कारण पानी की गति तेज नहीं रह जाती और विनाश की संभावना को कम से कम करने की कोशिश कर ली जाती है। 2013 में हुई केदारनाथ त्रासदी के समय भी इस बांध ने घटना की गंभीरता को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
पर्यटकों को करें सचेत
ग्लेशियर अनुसंधान से जुड़े टेरी के सीनियर फेलो डॉ. श्रेष्ठ तायल ने अमर उजाला को बताया कि स्थानीय जनता पहाड़ों की संवेदनशीलता के प्रति बहुत सतर्क रहती है। सांस्कृतिक और पारंपरिक रूप से वह कोई भी ऐसा काम नहीं करते हैं जो पहाड़ों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता हो। लेकिन पर्यटक के तौर पर गए लोग इसी तरह संवेदनशील नहीं होते। प्रशासन को पहाड़ों पर पर्यटन करने जा रहे लोगों को विशेष रूप से प्रशिक्षित करना चाहिए।
डॉ. श्रेष्ठ तायल के मुताबिक चमोली और केदारनाथ जैसी त्रासदी मानवजनित होती है। पहाड़ों पर लगातार बढ़ रहे प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन से बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग और नदियों के जल प्रवाह मार्ग पर हो रहे अवैध निर्माण ग्लेशियर तबाही जैसी पर्यावरण समस्या को जन्म देते हैं। इनसे बचने के लिए मनुष्य को यथासंभव प्रकृति की तरफ वापस लौटना पड़ेगा। सामान्य गतिविधियों में भी संवेदनशीलता बनाए रखनी होगी।