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सरकार बनाम आरबीआई: नेहरू का पत्र केंद्र सरकार के लिए बन सकता है हथियार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 05 Nov 2018 08:33 AM IST
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नरेंद्र मोदी-उर्जित पटेल
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केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर रघुराम राजन के बीच तनाव और बढ़ता ही जा रहा है। वैसे यह पहली बार नहीं है जब सरकार और आरबीआई आमने-सामने हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार आरबीआई विवाद का हल ढूंढने के लिए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की चिट्ठी का सहारा ले सकती है।
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इन दिनों केंद्र की मोदी सरकार और रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के बीच तनाव की खबरें मीडिया में छाई हुई हैं। ऐसी चर्चा भी थी कि सरकार आरबीआई एक्ट का सेक्शन-7 लागू करके इसकी स्वायत्तता पर लगाम लगाना चाहती है। जवाहर लाल नेहरू के समय में भी आरबीआई के चौथे गवर्नर रहे बेनेगल रामा राव और सरकार के बीच मतभेद थे। जिसकी वजह से उन्होंने जनवरी 1957 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
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राव ने साढ़े सात साल के कार्यकाल के बाद इस्तीफा दिया था क्योंकि जवाहर लाल नेहरू ने वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णमचारी (टीटीके) का साथ देते हुए यह साफ कर दिया था कि आरबीआई सरकार की विभिन्न गतिविधियों का हिस्सा है। वह सरकार को सलाह दे सकता है लेकिन उसे सरकार के साथ भी रहना है। यह बातें नेहरू ने जनवरी 1957 में एक पत्र में लिखी थीं। जिसमें उन्होंने सुझाव दिया था कि यदि राव को लगता है कि उनके लिए कार्य जारी रखना संभव नहीं है तो वह पद से इस्तीफा दे सकते हैं। इसके कुछ दिनों बाद राव ने इस्तीफा दे दिया था।
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राव ने टीटीके पर अभद्र व्यवहार का आरोप लगाया था। दोनों के बीच मतभेदों की शुरूआत एक बजट प्रस्ताव को लेकर हुई थी। टीटीके ने आरबीआई को वित्त मंत्रालय का एक भाग बताया था। इसके अलावा उन्होंने संसद में इस बात को लेकर शंका जाहिर की थी कि वह किसी तरह के सोच विचार के लिए सक्षम है या नहीं। राव को लिखे पत्र में भारत के पहले प्रधानमंत्री और राहुल गांधी के नानाजी ने लिखा, 'आरबीआई सरकार को सलाह दे सकती है लेकिन उसे सरकार के साथ तालमेल बनाकर रहना होगा।'
नेहरू ने कहा था यह बिलकुल हास्यास्पद बात होगी यदि केंद्रीय बैंक अलग तरह की नीति अपनाए यदि वह सरकार के उद्देश्यों या उसके तरीकों से सहमत नहीं है। पत्र में नेहरू ने लिखा था, 'आपने आरबीआई की स्वायत्तता पर दबाव डाला है। निश्चित रूप से यह स्वायत्त है लेकिन यह केंद्र सरकार के नेतृत्व के अधीन भी है। मौद्रिक नीतियों को निश्चित रूप से सरकार की बड़ी नीतियों का अनुसरण करना चाहिए। वह सरकार के मुख्य उद्देश्यों और नीतियों को चुनौती नहीं दे सकता है।'
नेहरू ने पत्र में लिखा था, 'जब आपने मुझसे बात की तो मैंने आपको बताया था कि केंद्र सरकार नीतियां बना सकती है और आरबीआई केंद्र सरकार की नीतियों के विरुद्ध किसी तरह की नीति नहीं बना सकती है। आपने इसपर सहमति जताई थी। मगर आपके मेमोरेंडम में मुझे अलग दृष्टिकोण मिला है।' आरबीआई का मानना था कि टीटीके के बजट प्रस्ताव से ब्याज दरें बढ़ जाएंगी और उसने केंद्रीय बोर्ड को एक प्रस्तावव भेजा था। 12 दिसंबर 1956 को बोर्ड ने सरकार से कहा था कि वह उन सभी मामलों में आरबीआई से सलाह लें जिससे मौद्रिक संरचना और नीति पर असर पड़ता हो। उसी दिन नेहरू ने गवर्नर को पत्र लिखते हुए उनके (आरबीआई) अनुचित दृष्टिकोण को केंद्र के खिलाफ आंदोलनात्मक बताया था।