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खतरे में पड़ सकती है केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के इन परिवारों की सुरक्षा, खाली करना होगा सरकारी मकान
Fri, 27 Nov 2020 06:11 PM IST
Harendra Chaudhary
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 27 Nov 2020 06:11 PM IST
सार
बीएसएफ और सीआरपीएफ के पीड़ित कर्मी बताते हैं, मौजूदा नियम यह है कि जो भी कर्मी जोखिम वाले क्षेत्रों में तैनात हैं, उनके परिवारों को दिल्ली में तीन साल तक मकान मिलेगा। इसके बाद उन्हें मकान खाली करना होगा...
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सीआरपीएफ
- फोटो : CRPF Facebook
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विस्तार
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के अनेक कर्मियों के परिवारों की सुरक्षा अब खतरे में पड़ सकती है। वजह, ये कर्मी जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व और नक्सल प्रभावित राज्यों के जोखिम वाले क्षेत्रों में ड्यूटी दे रहे हैं। इनके परिवार दिल्ली के सरकारी आवासों में रह रहे हैं। वह जगह सुरक्षित मानी जाती है। शहरी विकास मंत्रालय के 'डायरेक्टरेट ऑफ एस्टेट' ने इस साल के शुरू में ये आदेश दिया था कि जिन कर्मियों की अलॉटमेंट का समय मार्च में पूरा हो गया है, वे तीस जून तक आवास खाली कर दें।
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सीएपीएफ कर्मियों ने मंत्रालय से एक साल का एक्सटेंशन देने का आग्रह किया था, लेकिन राहत नहीं मिली। कर्मियों ने अपने डीजी से भी आग्रह किया कि वे इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय के जरिए 'डायरेक्टरेट ऑफ एस्टेट' से बात करें। जब यहां भी सफलता नहीं मिली तो वे अपनी जेब से पैसा खर्च कर दिल्ली हाईकोर्ट में चले गए। वहां मामले की पांच बार सुनवाई हुई, लेकिन 25 नवंबर को अदालत ने यह कहते हुए केस खारिज कर दिया कि आप इस बाबत सरकार से बात करें। वहीं से राहत सम्भव है। ये नीतिगत मामला है, अदालत इसमें कुछ नहीं कर सकती।
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बीएसएफ और सीआरपीएफ के पीड़ित कर्मी बताते हैं, मौजूदा नियम यह है कि जो भी कर्मी जोखिम वाले क्षेत्रों में तैनात हैं, उनके परिवारों को दिल्ली में तीन साल तक मकान मिलेगा। इसके बाद उन्हें मकान खाली करना होगा। अब साल के मध्य में और खासतौर पर जब देश में कोरोना का कहर जारी है तो वे कैसे दूसरी जगह मकान तलाशेंगे। कुछ अधिकारी और कर्मी तो ऐसे भी रहे हैं, जिन्होंने आतंकियों व नक्सलियों के खिलाफ बड़े एनकाउंटर में हिस्सा लिया है या उन्होंने खुद ऑपरेशन लीड किया है। इस वजह से उनके परिवारों की सुरक्षा पर भी खतरा मंडराता रहता है।
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ऐसी स्थिति में वे चाह कर अपने परिवार को साथ नहीं रख सकते। कर्मियों की मजबूरी है कि वे दिल्ली में ही अपने परिवार को रखें। इन बलों के फंडामेंटल रूल्स एवं सप्लीमेंटरी रूल्स के मुताबिक यदि किसी कर्मी के पास दिल्ली में मकान है। वहीं से उसे नक्सल प्रभावित क्षेत्र, उत्तर पूर्व या कश्मीर में भेज दिया जाता है तो आगामी तीन साल तक उसे दिल्ली में मकान मिलता है। परिवार सुरक्षित माहौल में रहता है।
नियमानुसार, इन बलों में ऐसी पोस्टिंग दो साल के लिए होनी चाहिए, लेकिन कर्मी को वापस आने में पांच छह साल लग जाते हैं। ये भी जरूरी नहीं है कि उसके बाद वह दिल्ली ही आएगा। हो सकता है कि वहां से उसे छत्तीसगढ़ भेज दिया जाए या जम्मू-कश्मीर की किसी यूनिट में तैनाती मिल जाए। सिविल महकमे के कर्मियों के लिए भी यही नियम लागू होता है। ये कर्मी अगर दिल्ली से बाहर जाते हैं तो वे दो साल में वापस आते हैं। बाद में इन कर्मियों को दिल्ली स्थित विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों में ही पोस्टिंग मिलती रहती है। रिटायरमेंट तक सरकारी आवास इनके पास होता है।
दूसरी तरफ सीएपीएफ कर्मी हैं, जिन्हें तीन साल पूरे होते ही आवास खाली करने का फरमान मिल जाता है। यदि कोई कर्मी आवास खाली नहीं करता है तो भारी जुर्माना भरना पड़ता है। दिल्ली में टी-4 आवास के लिए पहले महीने में 25 हजार से ज्यादा जुर्माना लगता है। बाद में हर माह यह जुर्माना बीस, तीस और चालीस फीसदी दर के हिसाब से बढ़ता रहता है।
कर्मियों के अनुसार, अब इस मामले में पीएमओ या केंद्रीय गृह मंत्रालय को हस्तक्षेप करना चाहिए। अगर यहां से आदेश निकले तो अपने घरों से दूर जोखिम वाले इलाकों में ड्यूटी दे रहे कर्मियों को राहत मिल सकती है। सरकार को चाहिए कि वह कम से कम एक साल तक आवास रखने की इजाजत दे दे।