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सीबीआई-ईडी निदेशकों को पांच साल: एक 'रुका हुआ फैसला', केंद्र सरकार ने नहीं की जिसकी परवाह
Mon, 15 Nov 2021 04:29 PM IST
प्रशांत कुमार झा
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: प्रशांत कुमार झा
Updated Mon, 15 Nov 2021 04:29 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट के वकील डॉ. एलएस चौधरी बताते हैं, केंद्र सरकार सीबीआई और ईडी निदेशक के कार्यकाल को पांच वर्ष तक बढ़ाने के लिए जो अध्यादेश लेकर आई है, उसके दो मतलब हो सकते हैं। एक, केंद्र सरकार चाहती है कि ऐसे पद पर लंबे समय तक उसकी पसंद का व्यक्ति काबिज रहे। सीबीआई और ईडी, इन दोनों एजेंसियों के कामकाज को लेकर विपक्ष समय-समय पर आवाज उठाता रहा है।
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सीबीआई दफ्तर
- फोटो : iStock
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विस्तार
केंद्रीय जांच एजेंसी 'सीबीआई' और प्रवर्तन निदेशालय 'ईडी' के निदेशकों का कार्यकाल पांच वर्ष करने वाले अध्यादेश को लेकर विपक्षी दलों ने अपना विरोध प्रकट किया है। विपक्षी दलों ने संसद में इस मुद्दे को उठाए जाने की बात कही है। दूसरी ओर सिविल सोसायटी के सदस्य इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। सीबीआई-ईडी निदेशकों को 5 साल देने से पहले केंद्र सरकार को एक 'रुका हुआ फैसला', इस पर गौर करना चाहिए था। यह फैसला अभी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग हैं। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 2013 में दिए अपने एक फैसले में 'सीबीआई' को 'अवैध' बताया था। हालांकि केंद्र ने उस फैसले पर सर्वोच्च अदालत में स्टे ले लिया था, लेकिन उसके बाद से ही 'केंद्रीय जांच एजेंसी' की वैधता पर प्रश्नचिन्ह लगा है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एलएस चौधरी ने बताया, केंद्र ने इस मामले में जल्दबाजी दिखाई है। केंद्र सरकार को निदेशकों का कार्यकाल बढ़ाने सम्बन्धी अध्यादेश लाने से पहले, सीबीआई को अवैध बताए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए था।
दुर्लभ व असाधारण मामलों में ही सेवा विस्तार दें: सुप्रीम कोर्ट
केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय सतर्कता आयोग (संशोधन) 2021 और दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिशमेंट एक्ट (संशोधन) 2021, ये दोनों अध्यादेश संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत से कुछ दिन पहले ही लाए गए हैं। संसद का शीतकालीन सत्र 29 नवंबर से प्रारंभ होगा। सत्र के दौरान इन अध्यादेशों से संबंधित बिल संसद में पेश किए जा सकते हैं। विपक्ष ने इसे हड़बड़ी वाला कदम बताते हुए केंद्र की मंशा पर सवाल उठाए हैं। हाल ही में जस्टिस एलएन राव की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ईडी निदेशक संजय मिश्रा के कार्यकाल को लेकर एक फैसला सुनाया था। ईडी के निदेशक मिश्रा, जिन्होंने 2018 में कार्यभार ग्रहण किया था, केंद्र ने अब उन्हें सेवा विस्तार प्रदान किया है। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट की बैंच का कहना था कि केवल दुर्लभ और असाधारण मामलों में ही सेवा विस्तार किया जाना चाहिए। सीबीआई में निदेशक नहीं, बल्कि खुद एजेंसी की वैद्यता ही सवालों के घेरे में है।
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 'सीबीआई' को अवैध बताया था...
सीबीआई के निदेशक सुबोध कुमार जायसवाल ने पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि पश्चिम बंगाल, राजस्थान, झारखंड, महाराष्ट्र, केरल, पंजाब, छत्तीसगढ़ और मिजोरम सरकार ने सीबीआई को जांच कार्य के लिए दी सामान्य सहमति वापस ले ली है। इससे जांच एजेंसी के कामकाज में बाधा आ रही है। बैंक धोखाधड़ी से संबंधित लगभग 78 फीसदी मामलों की जांच केवल इस वजह से शुरु नहीं हो पा रही है कि विभिन्न राज्य इसके लिए सहमति नहीं दे रहे हैं। राज्यों के पास जांच एजेंसी द्वारा भेजे गए अनुरोध पत्र, लंबित पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी सीबीआई जांच के मामले में राज्यों द्वारा आम सहमति वापस लेने के मुद्दे पर चिंता जताई थी। अब केंद्र सरकार ने एकाएक सीबीआई निदेशक के कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाने के लिए अध्यादेश जारी कर दिया। डॉ. एलएस चौधरी ने सीबीआई की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। गोवाहाटी हाईकोर्ट ने छह नवंबर 2013 को नरेंद्र कुमार बनाम भारत सरकार केस में फैसला सुनाया था। अदालत का कहना था कि सीबीआई, संवैधानिक संस्था नहीं है। इसके पास किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा था, संविधान के अनुसार केंद्र सरकार ऐसी एजेंसी या फोर्स नहीं रख सकती है। अदालत ने सीबीआई को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
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छुट्टी के दिन गुवाहाटी कोर्ट के फैसले पर लिया था 'स्टे'...
गोवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले से एक बड़ा संकट खड़ा हो गया था। देश की केंद्रीय जांच एजेंसी, एकाएक अवैध घोषित कर दी गई। केंद्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में नौ नवंबर 2013 को दूसरे शनिवार की छुट्टी के दिन स्टे ले लिया। तभी से वह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। कई बार मामले पर सुनवाई हुई, लेकिन हर बार केंद्र सरकार की ओर से नई तारीख ले ली जाती। अब कोरोना संक्रमण की वजह से वह अपील मंजूर नहीं हो सकी। मामले की सुनवाई कम से कम पांच जजों की बेंच के समक्ष होगी। अगर सिविल सोसायटी द्वारा, सीबीआई निदेशक के कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाने के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाती है तो सुनवाई के दौरान सीबीआई को अवैध बताने वाला मामला भी आ सकता है। केंद्र एवं राज्यों के बीच ऐसे विवाद थम सकते हैं, बशर्ते इसके लिए संविधान में संशोधन कर दिया जाए। यह प्रक्रिया उतनी आसान भी नहीं है। केंद्र, राज्य और कानून के जानकारों को इस बाबत काम करना होगा। उसमें यह ध्यान देना होगा कि संशोधन प्रक्रिया में कहीं संविधान के मूल ढांचे के साथ कोई छेड़छाड़ न हो जाए। पुलिस, जब राज्य सूची के विषयों में शामिल होगी तो केंद्रीय जांच ब्यूरो को राज्यों की सहमति लेने के लिए अनुरोध पत्र नहीं भेजने पड़ेंगे।
केंद्र सरकार के निर्णय के दो मतलब हैं: एलएस चौधरी
सुप्रीम कोर्ट के वकील डॉ. एलएस चौधरी बताते हैं, केंद्र सरकार सीबीआई और ईडी निदेशक के कार्यकाल को पांच वर्ष तक बढ़ाने के लिए जो अध्यादेश लेकर आई है, उसके दो मतलब हो सकते हैं। एक, केंद्र सरकार चाहती है कि ऐसे पद पर लंबे समय तक उसकी पसंद का व्यक्ति काबिज रहे। सीबीआई और ईडी, इन दोनों एजेंसियों के कामकाज को लेकर विपक्ष समय-समय पर आवाज उठाता रहा है। विपक्ष का आरोप यह रहता है कि केंद्र, इन एजेंसियों का दुरुपयोग कर रहा है। इनके जरिए राजनीतिक हित साधे जाते हैं। दूसरी बात ये है कि सरकार ने बड़े बदलाव करने का खाका तैयार किया है। उसके लिए जरुरी है कि निदेशक के पास लंबा कार्यकाल रहे। दो साल के कार्यकाल में वैसे निर्णयों को लागू कर पाना मुमकिन न हो। हाल ही में सीबीआई, सहमति के जिस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची है, उस पर सर्वोच्च अदालत परीक्षण करने के लिए तैयार है। सर्वोच्च अदालत ने कहा, ये वांछनीय हालात नहीं हैं। जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश, इन दो जजों की बेंच ने इस मामले को मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना के पास भेज दिया था।
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दुर्लभ व असाधारण मामलों में ही सेवा विस्तार दें: सुप्रीम कोर्ट
केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय सतर्कता आयोग (संशोधन) 2021 और दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिशमेंट एक्ट (संशोधन) 2021, ये दोनों अध्यादेश संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत से कुछ दिन पहले ही लाए गए हैं। संसद का शीतकालीन सत्र 29 नवंबर से प्रारंभ होगा। सत्र के दौरान इन अध्यादेशों से संबंधित बिल संसद में पेश किए जा सकते हैं। विपक्ष ने इसे हड़बड़ी वाला कदम बताते हुए केंद्र की मंशा पर सवाल उठाए हैं। हाल ही में जस्टिस एलएन राव की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ईडी निदेशक संजय मिश्रा के कार्यकाल को लेकर एक फैसला सुनाया था। ईडी के निदेशक मिश्रा, जिन्होंने 2018 में कार्यभार ग्रहण किया था, केंद्र ने अब उन्हें सेवा विस्तार प्रदान किया है। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट की बैंच का कहना था कि केवल दुर्लभ और असाधारण मामलों में ही सेवा विस्तार किया जाना चाहिए। सीबीआई में निदेशक नहीं, बल्कि खुद एजेंसी की वैद्यता ही सवालों के घेरे में है।
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गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 'सीबीआई' को अवैध बताया था...
सीबीआई के निदेशक सुबोध कुमार जायसवाल ने पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि पश्चिम बंगाल, राजस्थान, झारखंड, महाराष्ट्र, केरल, पंजाब, छत्तीसगढ़ और मिजोरम सरकार ने सीबीआई को जांच कार्य के लिए दी सामान्य सहमति वापस ले ली है। इससे जांच एजेंसी के कामकाज में बाधा आ रही है। बैंक धोखाधड़ी से संबंधित लगभग 78 फीसदी मामलों की जांच केवल इस वजह से शुरु नहीं हो पा रही है कि विभिन्न राज्य इसके लिए सहमति नहीं दे रहे हैं। राज्यों के पास जांच एजेंसी द्वारा भेजे गए अनुरोध पत्र, लंबित पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी सीबीआई जांच के मामले में राज्यों द्वारा आम सहमति वापस लेने के मुद्दे पर चिंता जताई थी। अब केंद्र सरकार ने एकाएक सीबीआई निदेशक के कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाने के लिए अध्यादेश जारी कर दिया। डॉ. एलएस चौधरी ने सीबीआई की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। गोवाहाटी हाईकोर्ट ने छह नवंबर 2013 को नरेंद्र कुमार बनाम भारत सरकार केस में फैसला सुनाया था। अदालत का कहना था कि सीबीआई, संवैधानिक संस्था नहीं है। इसके पास किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा था, संविधान के अनुसार केंद्र सरकार ऐसी एजेंसी या फोर्स नहीं रख सकती है। अदालत ने सीबीआई को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
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छुट्टी के दिन गुवाहाटी कोर्ट के फैसले पर लिया था 'स्टे'...
गोवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले से एक बड़ा संकट खड़ा हो गया था। देश की केंद्रीय जांच एजेंसी, एकाएक अवैध घोषित कर दी गई। केंद्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में नौ नवंबर 2013 को दूसरे शनिवार की छुट्टी के दिन स्टे ले लिया। तभी से वह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। कई बार मामले पर सुनवाई हुई, लेकिन हर बार केंद्र सरकार की ओर से नई तारीख ले ली जाती। अब कोरोना संक्रमण की वजह से वह अपील मंजूर नहीं हो सकी। मामले की सुनवाई कम से कम पांच जजों की बेंच के समक्ष होगी। अगर सिविल सोसायटी द्वारा, सीबीआई निदेशक के कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाने के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाती है तो सुनवाई के दौरान सीबीआई को अवैध बताने वाला मामला भी आ सकता है। केंद्र एवं राज्यों के बीच ऐसे विवाद थम सकते हैं, बशर्ते इसके लिए संविधान में संशोधन कर दिया जाए। यह प्रक्रिया उतनी आसान भी नहीं है। केंद्र, राज्य और कानून के जानकारों को इस बाबत काम करना होगा। उसमें यह ध्यान देना होगा कि संशोधन प्रक्रिया में कहीं संविधान के मूल ढांचे के साथ कोई छेड़छाड़ न हो जाए। पुलिस, जब राज्य सूची के विषयों में शामिल होगी तो केंद्रीय जांच ब्यूरो को राज्यों की सहमति लेने के लिए अनुरोध पत्र नहीं भेजने पड़ेंगे।
केंद्र सरकार के निर्णय के दो मतलब हैं: एलएस चौधरी
सुप्रीम कोर्ट के वकील डॉ. एलएस चौधरी बताते हैं, केंद्र सरकार सीबीआई और ईडी निदेशक के कार्यकाल को पांच वर्ष तक बढ़ाने के लिए जो अध्यादेश लेकर आई है, उसके दो मतलब हो सकते हैं। एक, केंद्र सरकार चाहती है कि ऐसे पद पर लंबे समय तक उसकी पसंद का व्यक्ति काबिज रहे। सीबीआई और ईडी, इन दोनों एजेंसियों के कामकाज को लेकर विपक्ष समय-समय पर आवाज उठाता रहा है। विपक्ष का आरोप यह रहता है कि केंद्र, इन एजेंसियों का दुरुपयोग कर रहा है। इनके जरिए राजनीतिक हित साधे जाते हैं। दूसरी बात ये है कि सरकार ने बड़े बदलाव करने का खाका तैयार किया है। उसके लिए जरुरी है कि निदेशक के पास लंबा कार्यकाल रहे। दो साल के कार्यकाल में वैसे निर्णयों को लागू कर पाना मुमकिन न हो। हाल ही में सीबीआई, सहमति के जिस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची है, उस पर सर्वोच्च अदालत परीक्षण करने के लिए तैयार है। सर्वोच्च अदालत ने कहा, ये वांछनीय हालात नहीं हैं। जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश, इन दो जजों की बेंच ने इस मामले को मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना के पास भेज दिया था।