फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   CB CID arrest six people including two sub inspector know how cops get away with custodial deaths

तमिलनाडु में पुलिस हिरासत में पिता-पुत्र की मौत, जानें कैसे बच जाते हैं आरोपी अधिकारी

Thu, 02 Jul 2020 03:43 PM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Sneha Baluni Updated Thu, 02 Jul 2020 03:43 PM IST
विज्ञापन
CB CID arrest six people including two sub inspector know how cops get away with custodial deaths
तमिलनाडु में पुलिस हिरासत में पिता-पुत्र की मौत - फोटो : ट्विटर

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में क्राइम ब्रांच-सीआईडी ने दो सब-इंस्पेक्टर सहित छह लोगों को पिता-पुत्र को पुलिस हिरासत में बुरी तरह से पीटने से हुई मौत के मामले में गिरफ्तार किया है। पी जयराज और उनके बेटे जे बेनिक्स की पिछले महीने मौत हो गई थी। इसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हिरासत में हुई मौत पर छह हफ्ते के अंदर राज्य के डीजीपी को संबंधित दस्तावेजों के साथ एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। इस घटना ने एक बार फिर हिरासत में होने वाली मौतों में पुलिस अधिकारियों को सजा मिलने की कम दर की ओर ध्यान आकर्षित किया। ऐसे में जानें क्यों आरोपी पुलिसवाले बच जाते हैं।

विज्ञापन


कौन करता है निगरानी
कानून के अनुसार भारत में जेलों की निगरानी एक बोर्ड द्वारा की जाती है, जिसमें अन्य लोगों के साथ जिलाधिकारी या उप-मंडल अधिकारी और सिविल सोसायटी के सदस्य शामिल होते हैं। उन्हें न केवल उनके उचित कामकाज पर ध्यान देना होता है बल्कि कैदियों की परेशानी का भी निवारण करना होता है। हालांकि 2016 में राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में लगभग 1,400 जेलों में से केवल पांच पर नजर रखी जा रही थी और केवल चार राज्यों ने अपनी जेलों में स्वतंत्र आगंतुकों को नियुक्त किया था।
विज्ञापन


यह भी पढ़ें- पुलिस हिरासत में मौत: आरोपी सब-इंस्पेक्टर की गिरफ्तारी पर लोगों ने जलाए पटाखे
विज्ञापन
विज्ञापन


पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराने का अनुपात है बहुत कम
पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के लिए बहुत कम पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया है। इसका कारण है कि इस तरह की मौतों का रिकॉर्ड रखने का अनुपात बहुत कम है। उदाहरण के लिए 2018 में जिसका कि डाटा उपलब्ध है, में पांच प्रतिशत से कम हिरासत में हुई मौतों के लिए पुलिस के अत्याचार को जिम्मेदार ठहराया गया था।


कोई नहीं होता आरोपी
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2001 और 2018 के बीच, देश भर में 1,727 लोगों की हिरासत में मौतें हुईं। इसमें से 334 पुलिसवालों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई और केवल 26 को दोषी ठहराया गया। वास्तव में 2015 से 2018 तक हिरासत में हुई मौत के लगभग 180 मामलों में, जहां मजिस्ट्रियल जांच का आदेश दिया गया था, एक भी पुलिसकर्मी को दोषी नहीं ठहराया गया, हालांकि 80 से अधिक के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी।

भारत ने पास नहीं किया कानून
भारत ने अत्याचार और अन्य क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक बर्ताव या सजा के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन से प्रमाणित 'द प्रिवेंशन ऑफ टॉर्चर' बिल को पारित करने में असफल रहा है। जबकि भारत इसका हस्ताक्षरकर्ता है। इसका मतलब है कि हिरासत में मौत मामले मे दोषियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करनी पड़ेगी।
 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed