CAPF: जवानों और ग्राउंड कमांडरों को MHA के चिंतन शिविर से क्यों रखा गया दूर? केवल IPS की मौजूदगी पर उठे सवाल
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) में तैनात भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों का चिंतन शिविर सोमवार को नई दिल्ली में आयोजित हुआ। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने चिंतन शिविर की अध्यक्षता की। इस दौरान सीमा सुरक्षा, क्षमता निर्माण, कनिष्ठ अधिकारियों का मार्गदर्शन, मिशन भर्ती, आयुष्मान सीएपीएफ की निगरानी, प्रशिक्षण, सीएपीएफ ई-आवास पोर्टल, अवसंरचना परियोजनाओं की निगरानी, कल्याण और श्रेष्ठ परिपाटियों सहित कई मुद्दों पर चर्चा की गई। सीएपीएफ के पूर्व अफसरों ने इस शिविर की प्रासंगिकता पर कई सवाल खड़े किए हैं। इनका कहना है कि जब सीएपीएफ के जवान से लेकर ग्राउंड कमांडर तक और दूसरे रैंक वाले कैडर अफसरों को इस शिविर में बुलाया ही नहीं जाता, तो फोर्स में मौजूद समस्याओं की सही जानकारी गृह मंत्रालय तक कैसे पहुंचेगी। शिविर में यदि हर रैंक का एक प्रतिनिधि शामिल हो तो ही जमीनी सच्चाई बाहर आ सकती है।
यह भी पढ़ें: CRPF: करप्शन पर एक्शन मोड में आए DG, भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस नीति से नपे सीआरपीएफ के दो रसूखदार कमांडेंट
तभी 'क्वॉलिटी ऑफ इंटरेस्ट' में फर्क मालूम पड़ता है
बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं, उन अफसरों को इस शिविर में बुलाया जाना चाहिए, जिन्हें केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की गहराई से जानकारी हो। चाहे कोई भी फोर्स हो, उसमें ऑपरेशनल ट्रूप्स और सिस्टम, बहुत अहम होता है। इसके बारे में ग्राउंड कमांडर को ही ज्यादा मालूम होता है। वजह, ये लोग जवानों के सीधे कॉन्टैक्ट में होते हैं। बॉर्डर या किसी दूसरे क्षेत्र में किसी भी ऑपरेशन के दौरान कौन सी दिक्कतें आ रही हैं, उन्हें ग्राउंड कमांडर बेहतर तरीके से जानते और समझते हैं। जवानों की निजी समस्याएं भी होती हैं। ऐसे में अगर इनके प्रतिनिधियों को भी चिंतन शिविर में बुलाया जाए तो उसके ज्यादा सार्थक नतीजे सामने आ सकते हैं। अगर इन्हें मौका मिलता है तो 'क्वॉलिटी ऑफ इंटरेस्ट' में फर्क मालूम पड़ता है। प्रैक्टिकल सॉल्यूशन मिलने की अधिक संभावनाएं रहती हैं। जवानों या कैडर अफसरों की पदोन्नति, छुट्टी, रहन सहन और ऑपरेशनल सिचुएशन को किस तरह से इंप्रूव कर सकते हैं, आदि समस्याओं के हल में मदद मिल सकती है।
हम अभी तक अंग्रेजों का सिस्टम फॉलो कर रहे हैं
गत वर्ष सीआरपीएफ से बतौर सहायक कमांडेंट, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले सर्वेश त्रिपाठी कहते हैं, देखिये अभी तक देश के केंद्रीय बलों में अंग्रेजों का सिस्टम फॉलो किया जा रहा है। अब ये सवाल भी उठता है कि सीएपीएफ के चिंतन शिविर में केवल आईपीएस ही क्यों रहते हैं। बल के जवानों या दूसरे रैंक को प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जाता। एक आईपीएस डीजी, साल दो साल के लिए किसी बल में आता है। क्या पूरे बल को समझने के लिए यह अवधि पर्याप्त है। चिंतन शिविर का आयोजन एक स्वस्थ प्रक्रिया है, अच्छी बात है, लेकिन इसमें जवानों और ग्राउंड कमांडरों की बात रखने वाला कोई नहीं होता, ये बहुत खराब बात है। किसी फोर्स में 35 साल काम कर चुके कैडर अफसरों के अनुभव को इस शिविर में शामिल करना चाहिए। जवानों को भी बुलाया जाए। कहने का अर्थ है कि सभी रैंकों में से एक-एक प्रतिनिधि को चिंतन शिविर में अपनी बात रखने का अवसर मिले। अगर ऐसा होता है तो ही असल समस्या का पता चलेगा।
केंद्रीय बलों में समस्याओं का अंबार है
बतौर सर्वेश त्रिपाठी, केंद्रीय बलों में बहुत ज्यादा समस्याएं हैं। गृह मंत्री की घोषणा के बावजूद जवानों को सौ दिन का अवकाश नहीं मिला। उनके रहने की व्यवस्था ठीक नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट ने सीएपीएफ में ओपीएस लागू करने का फैसला सुनाया तो केंद्र सरकार उसे भी लागू नहीं कर रही। अगर पिछले पांच वर्ष की बात करें, तो सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी, सीआईएसएफ और असम राइफल्स में 50155 कर्मियों ने जॉब को अलविदा कह दिया है। इतना ही नहीं, इन बलों में आत्महत्या के केस भी बढ़ रहे हैं। इन बलों में 'समूह ए' अधिकारियों की सेवाएं 1986 से संगठित हैं, मगर अधिकारियों को उसका लाभ नहीं मिल सका। मौजूदा स्थिति में अधिकांश कैडर अफसरों को न तो एनएफएफयू का फायदा मिल सका और न ही समय पर उनका कैडर रिव्यू हो सका है। कैडर रिव्यू नहीं होने के कारण सीएपीएफ के ग्राउंड कमांडर व अन्य रैंक वाले अधिकारी पदोन्नति के मोर्च पर बुरी तरह पिछड़ गए हैं। सीधी भर्ती के माध्यम से विशेषकर सीआरपीएफ और बीएसएफ में आने वाले सहायक कमांडेंट को पहली पदोन्नति लगभग 15 वर्ष में मिल रही है। इससे आगे के करियर का अंदाजा लगाया जा सकता है। डिप्टी कमांडेंट तक पहुंचने में डीसी 22 साल और कमांडेंट के लिए 27 साल लग रहे हैं। डीआईजी, आईजी व एडीजी के बारे में सोच सकते हैं। कैडर अफसरों को अपने हकों के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
क्यों बढ़ रही आत्महत्या या बल छोड़ने वालों की संख्या
पूर्व अफसरों का तर्क है कि आईपीएस अधिकारी अमूमन आईजी और उसके ऊपर के पदों पर नियुक्ति पाते हैं। ऐसे में उन्हें बुनियादी स्तर से कमांड स्तर तक, बल की समस्याओं का कोई खास अनुभव नहीं होता। इसका एक सीधा और ज्वलंत उदाहरण सुरक्षा बलों में आत्महत्या/फ्रेटरीसाइड के मामले बढ़ना है। इन्हें न रोक पाना, बड़े अधिकारियों की विफलता है। बलों में आत्महत्या जैसे मुद्दों को बुनियादी जरूरतों से जोड़कर देखने की संवेदनशीलता, इसका अभाव देखा जा सकता। ऐसे लगभग अधिकांश मामलों में घरेलू कारण/फैमिली प्रॉब्लम का हवाला देकर केस रफा-दफा कर दिया जाता है। ऐसे चिंतन शिविर में कैडर अधिकारियों की अनुपस्थिति मूलभूत सच्चाई को दरकिनार करने जैसा है। सीधे नियुक्त राजपत्रित अधिकारियों को एक रैंक में 15 साल तक नौकरी करनी पड़ती है। क्या किसी डीजी ने इस समस्या की ओर गौर किया है। ग्राउंड पर जवानों के बीच कभी कार्य न करने वालों को ही बड़े पदों पर नियुक्त किया जाता है।
हर जिले में स्थापित हो पैरामिलिट्री फोर्स की एक वाहिनी
सरकार को दूरदर्शी सोच के साथ देश के हर जिले में पैरामिलिट्री की एक वाहिनी स्थापित करने की ओर अग्रसर होना चाहिए। इन बलों में काम कर चुके कैडर अधिकारियों को नीतियां बनाते और लागू करते समय, उन्हें बतौर 'डोमेन एक्सपर्ट' हिस्सा बनाया जाए। अगर कैडर अफसर अपने हक के लिए न्यायालय में जाते हैं, तो सरकार ही उनके विरोध में खड़ी मिलती है। ऐसे में हतोत्साहित होने के अलावा इस बल के कार्मिकों के पास कोई चारा नहीं रह जाता। ओल्ड पेंशन स्कीम और अधिकारियों को एचआरए देने के केस में उच्च न्यायालय के फैसले के उपरांत भी कार्मिकों को उसका लाभ न देना और उसके विपरीत सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय जाने का फैसला करना, बल के कार्मिकों के प्रति सरकार का नकारात्मक रवैया चिंताजनक है। ऐसे में न्यायालयों के चक्कर काटते अधिकारी व कार्मिक किस तरह आतंकवाद और प्रतिविद्रोहिता, दंगे व कानून व्यवस्था का दायित्व पूरा करते होंगे, ये समझना बहुत मुश्किल कार्य नहीं है। चिंतन शिविर इन तथ्यों से बहुत दूर प्रतीत होते हैं। झूठे आंकड़े और प्रोत्साहन के तथ्य राजनीतिक नेतृत्व को दिखाकर अपनी पीठ ठोकी जा रही है।
स्थानीय उत्पादों की खरीद को बढ़ावा दे सीएपीएफ
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चिंतन शिविर में कहा, सीमावर्ती इलाकों को विकसित करने और वहां रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम शुरू किया गया है। सीमाओं की सुरक्षा के लिए हर सीमावर्ती गांव और वहां के निवासियों के साथ संपर्क और संवाद बहुत जरूरी है। सभी सीएपीएफ को स्थानीय उत्पादों की खरीद को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और पलायन रुकेगा। आईपीएस अधिकारियों की शपथ में ही देश की एकता, अखंडता और आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी निहित होती है। सीमाओं की सुरक्षा को जिले की कानून-व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय से ही सुनिश्चित किया जा सकता है। सीएपीएफ में राष्ट्रीय स्तर की खेल टीम तैयार की जाए। जवानों को हर रोज कम से कम एक घंटा खेलकूद के लिए मिलना चाहिए। इससे न सिर्फ उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सुधरेगा, बल्कि देश की मिट्टी से उनका जुड़ाव भी बढ़ेगा। आईपीएस अधिकारियों का जवानों के साथ आत्मीय रिश्ता होना चाहिए। वे जवानों के साथ-साथ उनके परिवार की भी चिंता करें।