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Hindi News ›   India News ›   CAPF: In the Force Act, 1970, bureaucrats and BSF-CRPF DG were not in favor of reserving posts for IPS in CAPF

CAPF: फोर्स एक्ट, 1970 में नौकरशाह व BSF-CRPF डीजी, सीएपीएफ में IPS के लिए पद आरक्षित करने के पक्ष में नहीं थे

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Sun, 13 Jul 2025 03:50 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि सीएपीएफ अधिकारी, देश की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वे कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। इसके बावजूद, सीएपीएफ के कैडर अधिकारी, अपने करियर में बहुत अधिक ठहराव का सामना कर रहे हैं।

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CAPF: In the Force Act, 1970, bureaucrats and BSF-CRPF DG were not in favor of reserving posts for IPS in CAPF
CAPF - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कैडर अफसर अपने हितों के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक चले गए। उन्होंने अदालत में जीत भी हासिल की, मगर ग्राउंड पर वे हार गए। 2019 में अदालती लड़ाई जीत चुके कैडर अफसरों को दोबारा से अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। मई में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कैडर अफसरों को बड़ी राहत दी थी। इन बलों में सभी कार्यों के लिए ओजीएएस लागू होगा। 6 महीने के भीतर कैडर रिव्यू पूरा हो। इन सेवाओं के भर्ती नियमों (आरआर) में संशोधन और समयबद्ध पदोन्नति का प्रावधान हो। ओजीएएस मानकों के अनुसार इन बलों में भर्ती नियम और सेवा नियम (एसआर) को बदला जाए। इन बलों में बतौर प्रतिनियुक्ति, बाहर से आने वाले अफसरों की संख्या (सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड के स्तर तक) को धीरे-धीरे कम किया जाए। बीएसएफ के पहले डीजी केएफ रुस्तम ने भी यही बात कही थी कि सीएपीएफ में हम अपने अफसर तैयार करेंगे। आगे चलकर उन्हीं के हाथों में फोर्स का नेतृत्व होगा। हालांकि, अब केंद्र सरकार फैसले के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में पुनर्विचार याचिका लेकर पहुंच गई है। 

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बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि सीएपीएफ अधिकारी, देश की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वे कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। इसके बावजूद, सीएपीएफ के कैडर अधिकारी, अपने करियर में बहुत अधिक ठहराव का सामना कर रहे हैं। अदालत ने इन बलों में बतौर प्रतिनियुक्ति बाहर से आने वाले अधिकारियों की संख्या (सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड के स्तर तक) को धीरे-धीरे कम किया जाए। साथ ही उनकी सेवा अवधि अधिकतम 2 वर्ष तक सीमित हो। मतलब, इन बलों में आईजी रैंक तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति को खत्म किया जा सकता है या सीमित दायरा तय हो सकता है। खास बात है कि पहले सीएपीएफ यानी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में डीआईजी, आईजी, एडीजी, एसडीजी और डीजी के पद पर आईपीएस आ रहे थे, अब कमांडेंट स्तर पर भी आईपीएस ज्वाइन करने लगे हैं। 
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आखिर सीएपीएफ में टॉप तक क्यों नहीं पहुंच पाते कैडर अधिकारी, ये सवाल दोबारा से चर्चा का विषय बन गया है। बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद और सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी एचआर सिंह के अनुसार, बलों में कैडर अधिकारी, नेतृत्व की सभी योग्यताएं पूरी करते हैं। वे बल से जुड़ी हर छोटी बड़ी बात से वाकिफ हैं। जनहित में उन्हें डीजी और एडीजी का पद सौंपा जाना चाहिए। सीआरपीएफ के पहले महानिदेशक वीजी कनेत्कर ने कहा था, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। दूसरी तरफ, 1955 के फोर्स एक्ट में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इतना ही नहीं, 1970 में तत्कालीन होम सेक्रेट्री लल्लन प्रसाद सिंह, जेएस, बीएसएफ व सीआरपीएफ के डीजी ने भी लिखा था कि केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। इन बलों में कैडर अफसरों को ही नेतृत्व करने का मौका दिया जाए। ऐसे में वे धीरे धीरे पदोन्नति के जरिए इन बलों में आगे बढ़ते रहेंगे और एक समय के टॉप तक पहुंच जाएंगे। 
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सीआरपीएफ में आईजी रैंक से रिटायर हुए पूर्व कैडर अफसर वीपीएस पंवार ने 2019 में सुप्रीम कोर्ट से केस जीतने के बाद कहा था, 1970 में यह बात साफ हो चुकी थी कि केंद्रीय बलों का नेतृत्व कौन करेगा। तत्कालीन होम सेक्रेट्री लल्लन प्रसाद सिंह, सीएपीएफ में आईपीएस के लिए पद आरक्षित करने के पक्ष में नहीं थे। केंद्रीय गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव, बीएसएफ व सीआरपीएफ के डीजी ने भी लिखा था कि केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न किया जाए। 1955 के एक्ट में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। उसमें कहा गया था कि इन बलों के कैडर अधिकारियों को ही नेतृत्व का मौका दिया जाए। वे आगे बढ़ेंगे और पदोन्नति के जरिए टॉप तक पहुंच जाएंगे। तब ये सलाह नहीं मानी गई और सीएपीएफ में ज्यादातर पद आईपीएस के लिए रिजर्व कर दिए गए। 

पूर्व कैडर अधिकारियों के मुताबिक, 1959 में पहली बार आईपीएस अफसर, कमांडेंट बन कर केंद्रीय सुरक्षा बलों में आए थे। ये भी तब हुआ, जब आर्मी ने कहा कि हम अफसर नहीं देंगे। हमें अपनी जरूरतें पूरी करनी हैं। इसके बाद भारत सरकार ने निर्णय लिया कि इन बलों में अफसरों की भर्ती शुरू की जाए। डीएसपी के पद पर भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद 1960 में पहला बैच ट्रेनिंग के लिए एनपीए में पहुंचा। वहां पर आईपीएस के साथ कैडर अफसरों की ट्रेनिंग हुई। 1962 में लड़ाई छिड़ी तो इन बलों में इमरजेंसी कमीशंड ऑफिसर भेजे गए। लड़ाई खत्म होने के बाद वे भी वापस लौट गए। 

बाद के वर्षों में सीआरपीएफ और बीएसएफ ने खुद के चार सौ से अधिक अफसर तैयार कर लिए। तब बीएसएफ के पहले डीजी केएफ रुस्तम ने कहा था, केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस अफसर के लिए पदों का आरक्षण न किया जाए। इसका 1955 के फोर्स एक्ट में भी प्रावधान नहीं है। हम अपने अफसर तैयार करेंगे, जो कुछ समय बाद फोर्स का नेतृत्व करेंगे। इसके बाद 1968 में सीआरपीएफ के पहले डीजी वीजी कनेत्कर ने कहा था, मुझे आईपीएस की जरूरत नहीं है। 

तत्कालीन गृह सचिव एलपी सिंह ने भी दोनों बलों के डीजी की बात को सही माना। सिंह ने कहा, शुरू में बीस फीसदी अफसर आर्मी व आईपीएस कैडर से ले लो। थोड़े समय बाद डीआईजी, कमांडेंट और सहायक कमांडेंट के पद कैडर को सौंप दिए जाएं, लेकिन आईपीएस के लिए वैधानिक आरक्षण न किया जाए। 1970 में गृह मंत्रालय के डिप्टी डायरेक्टर 'संगठन' जेसी पांडे ने लिखा, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईपीएस के लिए पद फिक्स मत करो। इससे कैडर अफसरों के मौके प्रभावित होंगे। 

सीआरपीएफ डीजी ने कहा था, अब केवल वर्किंग फार्मूला ले लो, जो बाद में नई व्यवस्था के साथ परिवर्तित हो जाएगा। आईपीएस, आर्मी और स्टेट पुलिस, इन तीनों के अफसरों के लिए सुरक्षा बलों में डीआईजी, कमांडेंट और एसी के पद पर आरक्षण न हो। पूर्व कैडर अफसरों के मुताबिक, उसके बाद फाइलें बदल गई। उसी साल यह आर्डर निकाला गया कि केंद्रीय बलों में डीजी के 100 फीसदी पद, 100 फीसदी आईजी, 75 फीसदी डीआईजी, 40 फीसदी सीओ और एसी के 10 फीसदी पद आईपीएस को दिए जाएं। समय के साथ इस कोटे में बदलाव होते रहे। साल 1997 में पहली बार सीआरपीएफ कैडर अफसरों को आईजी के 33 फीसदी पद मिले। 2008 में आईजी के 50 फीसदी और डीआईजी के 80 फीसदी कैडर को मिल गए।
2009 में एडीजी के 33 फीसदी पद कैडर को दिए गए। 

1970 से लेकर 2013 तक आईपीएस कैडर, इस मामले में कुछ नहीं बोला। कैडर अधिकारी, पदोन्नति के मोर्चे पर पिछड़ते चले गए। उन्हें मजबूरन कोर्ट में जाना पड़ा। 2015 में हाईकोर्ट से जीते और 2019 में सुप्रीम कोर्ट से जीत गए, लेकिन फिर भी नए सर्विस रूल नहीं बन सके। बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद केंद्र सरकार टालमटोल की नीति पर चल रही है। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के हजारों अफसर प्रमोशन एवं वित्तीय फायदों में हुए भेदभाव को लेकर परेशान हैं। जूनियर अफसरों को तो 15 वर्ष में पहली पदोन्नति नहीं मिल पा रही। 
जिस तरह से केंद्र सरकार की दूसरी संगठित सेवाओं में एक तय समय के बाद रैंक या फिर उसके समकक्ष वेतन मिलता है, वैसा सभी केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधिकारियों को नहीं मिल पा रहा है। करीब बीस साल की सेवा के बाद आईपीएस अधिकारी आईजी बन जाता है, लेकिन कैडर अफसर उस वक्त कमांडेंट के पद तक पहुंच पाता है। मौजूदा दौर में तो वह भी संभव नहीं है। वजह, सीआरपीएफ और बीएसएफ में तो डेढ़ दशक में पहली पदोन्नति मिल पा रही है।


कैडर अफसर 35 साल की नौकरी के बाद बड़ी मुश्किल से डीआईजी या आईजी बनता है। डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों में ओजीएएस यानी 'आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' के तहत सेवा नियम बनाने के आदेश जारी किए थे। अभी तक सर्विस रूल नहीं बनाए गए हैं। बल के कैडर अधिकारियों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बावजूद कोई राहत नहीं दी। मई में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले  से सीएपीएफ के कैडर अफसरों को यह उम्मीद बंधी थी कि अब उनके साथ न्याय होगा, लेकिन अब एक बार फिर से वह उम्मीद धूमिल हो गई है। वजह, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ रिव्यू पेटिशन दाखिल कर दी है।

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