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CAPF: कानूनी लड़ाई के लिए मजबूर अर्धसैनिक बलों के कैडर अफसर, प्रमोशन से दूर अफसरों पर क्यों पड़ रही दोहरी मार

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Thu, 16 Mar 2023 08:32 PM IST
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सार
CAPF: कैडर अफसरों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी वे दोहरी मार झेल रहे हैं। सरकार ने सर्वोच्च अदालत के फैसले को मनमर्जी से लागू कर दिया है। एनएफएफयू का फायदा देने के लिए पदोन्नति का नियम लागू कर दिया। जब पदोन्नति का लाभ नहीं मिल रहा था तो ही सरकार, एनएफएफयू लाई थी। अब जिसकी पदोन्नति हो रही है, उसे ही एनएफएफयू दिया जा रहा है...
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CAPF: Cadre officers of paramilitary forces away from promotion are facing double whammy
CAPF - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

पांच केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल/सीएपीएफ, जिसमें बीएसएफ, सीआरपीएफ, एसएसबी, सीआईएसएफ और आईटीबीपी शामिल हैं। इन बलों में 'समूह ए' अधिकारियों की सेवाएं 1986 से संगठित हैं, मगर अधिकारियों को उसका लाभ नहीं मिल सका। 2006 के दौरान जब छठे केंद्रीय वेतन आयोग ने आईएएस, आईपीएस व आईआरएस सहित अन्य सभी संगठित समूह ए सेवाओं 'ओजीएएस' के लिए गैर कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन 'एनएफएफयू' योजना शुरू की, तो कैडर अधिकारियों ने भी इसका लाभ देने की मांग की।

हालांकि तब 'सीएपीएफ' को संगठित समूह 'ए' सेवा के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद कैडर अफसरों ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद तीन सितंबर 2015 के दिन अदालत ने अपने फैसले में सीएपीएफ को 1986 से 'संगठित समूह ए सेवा' घोषित कर दिया। दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने पांच फरवरी 2019 को दिए अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तीन जुलाई 2019 को अपनी एक घोषणा के जरिए 'सीएपीएफ संगठित सेवा ए' को मंजूरी प्रदान कर दी। अब कैडर अफसरों में भी यह उम्मीद जगी कि उन्हें एनएफएफयू के परिणामी लाभ मिल जाएंगे।

रेल मंत्रालय ने दिया, मगर गृह मंत्रालय ने नहीं

रेलवे सुरक्षा बल 'आरपीएफ' भी सीएपीएफ के साथ न्यायालय में सह-याचिकाकर्ता था। केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद रेल मंत्रालय ने न्यायालय के आदेश को अक्षरश: लागू कर दिया। आरपीएफ को संगठित सेवा का दर्जा मिल गया। उन्हें एनएफएफयू के सभी लाभ मिल गए और साथ ही उनकी सेवा का नाम बदलकर 'आईआरपीएफएस' कर दिया। जानकारों का कहना है कि सीएपीएफ में पुराने सेवा नियमों की आड़ में खंडित एनएफएफयू को न्यायालय के आदेश की व्याख्या कर लागू किया गया है। नतीजा, इससे सीएपीएफ कैडर अफसरों की एक बहुत छोटी संख्या को ही उसका लाभ मिल सका। अधिकांश अफसरों की पदोन्नति से जुड़ी समस्याएं जस की तस बनी रहीं। एक ही न्यायालय के आदेश की विभिन्न मंत्रालयों द्वारा अलग-अलग व्याख्या कर दी गई।

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अधिकारियों के मुताबिक, जब तक ओजीएएस 'संगठित सेवा' पैटर्न के अनुसार, भर्ती नियमों/सेवा नियमों में संशोधन नहीं किया जाता है, तब तक ओजीएएस का लाभ नहीं दिया जा सकता। सीएपीएफ के अधिकारियों की मांग है कि ओजीएएस पैटर्न के अनुसार, संशोधित भर्ती नियम/सेवा नियमों के साथ कैबिनेट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूर्ण कार्यान्वयन किया जाए। अनेकों बार मांग करने के बाद भी उनके सेवा नियम/भर्ती नियम संशोधित नहीं किए गए।


क्यों दोहरी मार झेल रहे हैं कैडर अधिकारी?

कैडर अफसरों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी वे दोहरी मार झेल रहे हैं। सरकार ने सर्वोच्च अदालत के फैसले को मनमर्जी से लागू कर दिया है। एनएफएफयू का फायदा देने के लिए पदोन्नति का नियम लागू कर दिया। जब पदोन्नति का लाभ नहीं मिल रहा था तो ही सरकार, एनएफएफयू लाई थी। अब जिसकी पदोन्नति हो रही है, उसे ही एनएफएफयू दिया जा रहा है। कैडर अधिकारियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना का नोटिस, सर्वोच्च अदालत में फाइल किया गया है। कैडर रिव्यू को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का जो आदेश आया था, वह भी सुप्रीम कोर्ट में है। सर्वोच्च अदालत ने इन दोनों केसों को एक साथ क्लब कर दिया है।

मौजूदा स्थिति में अधिकांश कैडर अफसरों को न तो एनएफएफयू का फायदा मिल सका और न ही समय पर उनका कैडर रिव्यू हो सका है। कैडर रिव्यू नहीं होने के कारण सीएपीएफ के ग्राउंड कमांडर व अन्य रैंक वाले अधिकारी पदोन्नति के मोर्च पर बुरी तरह पिछड़ गए हैं। सीधी भर्ती के माध्यम से विशेषकर सीआरपीएफ और बीएसएफ में आने वाले सहायक कमांडेंट को पहली पदोन्नति लगभग 15 वर्ष में मिल रही है। इससे आगे के करियर का अंदाजा लगाया जा सकता है। डिप्टी कमांडेंट तक पहुंचने में डीसी 22 साल और कमांडेंट के लिए 27 साल लग रहे हैं। डीआईजी, आईजी व एडीजी के बारे में सोच सकते हैं।  

डीओपीटी नियमों के तहत नहीं हो रहा क्रियान्यवन

नियमानुसार, सीएपीएफ में हर पांच साल बाद कैडर रिव्यू होना जरुरी है। डीओपीटी ने कई बार कहा है कि रिव्यू प्रक्रिया जल्द पूरी करें। कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी यानी गृह मंत्रालय कह देता है कि अभी तो कोर्ट में केस है। इसका सीधा असर कैडर अफसरों पर पड़ रहा है। उन्हें तय समय पर पदोन्नति नहीं मिल पा रही है। गलत तरीके से एनएफएफयू के क्रियान्वयन में विरोधाभास हो रहा है। किसी को इसका दोहरा लाभ तो किसी के हिस्से केवल मार आ रही है। कुछ पदों पर डीआईजी व उससे ऊपर के रैंकों में प्रमोशन होने पर एनएफएफयू का लाभ दिया जा रहा है। दूसरी ओर, जिनकी पदोन्नति नहीं हो रही है, उन्हें एनएफएफयू भी नहीं मिल रहा।

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खास बात है कि जिस पॉलिसी को पदोन्नति के साथ लिंक किया गया है, उसका डीओपीटी के नियमों के तहत क्रियान्यवन नहीं हो रहा। देश में बाकी की 54 'संगठित सेवाएं ग्रुप ए' ओजीएएस में डीओपीटी के तहत लाभ मिलता है। वहां एनएफएफयू के लिए पदोन्नति का नियम नहीं लगता। सीएपीएफ में पदोन्नति का नियम अड़ा देते हैं। आईएएस व आईपीएस में टाइम बाउंड प्रमोशन मिलता है। इस सेवा के अफसरों को प्रमोशन व वेतन लाभ, दोनों फायदे मिलते हैं। आईएएस को तो दो साल पहले ही सभी फायदे मिल जाते हैं। एनएफएफयू के आदेश में कहा गया है कि एनएफएसजी और एनएफएफयू देसे से पहले आरआर को बदला जाए। उसके बाद इसका लाभ दें। एनएफएफयू के प्रावधानों में बदलाव करते वक्त इन्हें शामिल किया जाए, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ है।

इन दोनों ही बलों में नहीं हो सका कैडर रिव्यू

एनएफएफयू के लिए तय रिक्रूटमेंट रूल्स में एनएफएसजी और एनएफएफयू का जिक्र ही नहीं है। जानबूझकर नए नियम नहीं बनाए जा रहे। पुराने नियमों को आधार बनाया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय में 14 मार्च को उक्त केस की सुनवाई थी, लेकिन जजों के संवैधानिक बैंच में होने के कारण इस मामले की सुनवाई नहीं हो सकी। एनएफएफयू का केस 2012 में तो एनएफएसजी का केस 2015 में हुआ था। ये केस अब हाई कोर्ट में अवमानना को लेकर लंबित है। कैडर रिव्यू का केस 2020 में केस हुआ था। अब यह केस सुप्रीम कोर्ट में है। कैडर अधिकारियों का कहना है कि जब बाकी संगठित सेवाओं में यह लाभ दिया जा रहा है, तो सीएपीएफ को वह फायदा क्यों नहीं मिल रहा। उन सभी विभागों ने डीओपीटी के मुताबिक अपने 'आरआर' में संशोधन कर लिया था, इसलिए उन्हें तय समय पर लाभ मिल गया। सीआरपीएफ का पिछला कैडर रिव्यू 2016 में हुआ था। बल के लिए कैडर रिव्यू कमेटी 'सीआरसी' की बैठक 15 दिसंबर 2015 को हुई थी, जबकि उसे 29 जून 2016 को कैबिनेट की मंजूरी मिली थी। इसी तरह बीएसएफ के कैडर रिव्यू को 12 सितंबर 2016 को कैबिनेट की स्वीकृति प्रदान की गई थी। अभी तक इन दोनों ही बलों में कैडर रिव्यू नहीं हो सका है।  

संसद में पूछे गए सवाल का मिला ये जवाब

संसद के बजट सत्र में यह सवाल पूछा गया था कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में सीधी भर्ती के जरिए 'सहायक कमांडेंट' बनने वाले युवा अधिकारी आखिर नौकरी क्यों छोड़ रहे हैं। लोकसभा सांसद रवनीत सिंह ने यह सवाल पूछा था कि हाल ही के वर्षों में सीमा प्रहरी बल, 'आईटीबीपी' में विशेषकर सहायक कमांडेंट 'एसी' के स्तर पर बड़ी संख्या में सैनिकों ने नौकरी छोड़ी है। इसके जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा था, आईटीबीपी में नौकरी छोड़ने वालों की संख्या अधिक नहीं है। पिछले दस वर्षों के दौरान नौकरी छोड़ने की औसत दर आमतौर पर एक समान रही है। यह देखा गया है कि अधिकारी बेहतर करियर के अवसरों का लाभ उठाने के लिए अथवा कुछ बाध्य करने वाली घरेलू परिस्थितियों के कारण त्यागपत्र देते हैं। रिक्तियों को सीधी भर्ती, सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा और पदोन्नति के माध्यम से नियमित तौर पर भरा जाता है।

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