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Cabinet Reshuffle: मेघवाल के प्रमोशन से BJP ने वसुंधरा को दिया ये संदेश, एक चेहरे पर भरोसा नहीं कर रहा हाईकमान

Fri, 19 May 2023 06:31 AM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Fri, 19 May 2023 06:31 AM IST
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सार
Cabinet Reshuffle: राजस्थान में दलित करीब 16 फीसदी हैं, और इसमें 60 फीसदी आबादी मेघवालों की है। विधानसभा में सीटों की गणित की बात करें तो 200 में से 34 सीटें एससी और 25 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं। प्रदेश में दलित वोटर्स भाजपा का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है...
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Cabinet Reshuffle: With the promotion of arjun ram Meghwal, BJP is not trusting on face in Rajasthan
Arjun Ram Meghwal - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार

कर्नाटक चुनाव खत्म होते ही भाजपा का फोकस अब राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ पर हो गया है। कानून मंत्री किरेन रिजिजू को हटा कर राजस्थान से ताल्लुक रखने वाले सांसद अर्जुन राम मेघवाल को कानून मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपने को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। मेघवाल के प्रमोशन के साथ भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे प्रदेश में आने वाले चुनाव में भाजपा का चेहरा नहीं होंगी। इसलिए पार्टी जाति के अंकगणित को सही करने में जुटी हुई है। हाल ही में पार्टी ने जाति विशेष नेताओं को नई जिम्मेदारियां दी हैं। भाजपा हाईकमान ने इन नियुक्ति के जरिए प्रदेश की जनता समेत पूर्व सीएम को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि पार्टी किसी एक चेहरे साथ आगे बढ़ने का जोखिम मोल नहीं ले सकती है। इसलिए वे जातीय संतुलन को मजबूत कर रही है।  

यह वीडियो देखें: कर्नाटक के नतीजे से मिले सबक पर काम करेगी बीजेपी, राजस्थान में वसुंधरा राजे की बढ़ी अहमियत?

पिछले महीने ही पार्टी ने राज्य इकाई का नेतृत्व करने के लिए जाट नेता को हटा कर एक ब्राह्मण चेहरे को चुना था। वहीं हाल ही में एक अन्य राजपूत नेता के कद को बढ़ाकर पार्टी ने राजनीतिक रूप से शक्तिशाली राजपूत समुदाय को साधने का प्रयास किया है। प्रदेश के राजनीतिक जानकारों की मानें, तो प्रदेश के नेताओं का केंद्र सरकार में प्रमोशन हो या फिर संगठन के अहम पदों पर नियुक्तियां संगठनात्मक कम और राजस्थान के जातीय गणित को साधने वाली ज्यादा लगती हैं। पिछले दो माह ने भाजपा ने फेरबदल कर राजस्थान में अपनी सोशल इंजीनियरिंग पटरी पर लाने की कोशिश की है। साथ ही ये नियुक्तियां कई सियासी संकेत भी देती हैं।

इसलिए पूर्व सीएम को मिली थोड़ी राहत

राजस्थान में बड़ी संख्या में दलित और खासकर मेघवाल आज भी कांग्रेस के साथ हैं, लेकिन अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीटों पर भाजपा इनकी मदद से जीत हासिल कर लेती है। ऐसे में जनता के बीच अर्जुन राम मेघवाल को दलित चेहरा बनाने की बात तय मानी जा रही थी, लेकिन इन्हें केंद्र में ही बड़ी जिम्मेदारी दे दी गई है। मेघवाल के प्रमोशन के बाद वसुंधरा गुट को झटका भी लगा है। लेकिन राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना कि इस प्रमोशन से उन्हें राहत मिली है। क्योंकि वसुंधरा राजे के लिए उनका गुट लंबे समय से कैंपेन कमेटी के मुखिया के पद की आस लगाए बैठा है। इससे पहले राजस्थान की राजनीति में चर्चा थी कि मेघवाल को केंद्र की राजनीति से हटा कर राजस्थान भेजा जाएगा। वहां इलेक्शन कैंपेन कमेटी का उन्हें चेयरमैन बनाया जाएगा।

क्यों अहम है मेघवाल?

राजस्थान में दलित करीब 16 फीसदी हैं, और इसमें 60 फीसदी आबादी मेघवालों की है। विधानसभा में सीटों की गणित की बात करें तो 200 में से 34 सीटें एससी और 25 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं। प्रदेश में दलित वोटर्स भाजपा का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि जिस दल ने एससी और एसटी सीटों पर कब्जा किया सरकार उसी की बनी। ऐसे में मेघवाल को बड़ी जिम्मेदारी मिलना इन वोटर्स को अपनी तरफ रखने की कोशिश हो सकती है। मेघवाल प्रदेश की बीकानेर लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी के पास श्रीगंगानगर लोकसभा सीट पर भी भाजपा के दलित सांसद निहालचंद मेघवाल छह बार से लोकसभा सीट जीत रहे हैं। निहालचंद को मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था। लेकिन बालात्कार के आरोप के चलते उन्हें हटाकर अर्जुन राम मेघवाल को मंत्री बनाकर जातीय संतुलन बनाया गया था। हालांकि अर्जुन राम मेघवाल सरकारी अफसर थे। वे वीआरएस लेकर राजनीति में आए थे। इसलिए जनता में उनकी पकड़ थोड़ी कमजोर है। लेकिन उनकी सांगठनिक दृष्टि बहुत मजबूत है। इसलिए भाजपा ने राजस्थान चुनाव के लिए बनाई अपनी कोर कमेटी में भी इन्हें शामिल किया है।

लोकसभा अध्यक्ष, उप राष्ट्रपति से भी सध रहे जातिगत समीकरण 

प्रदेश में ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय, ये भाजपा का कोर वोटर है। यही वजह है कि चुनाव से ठीक पहले अब भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग इसी दिशा में नजर आ रही है। एक ओर जहां सीपी जोशी को प्रदेशाध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने ब्राह्मणों को साधने की कोशिश की है। वहीं, दूसरी ओर राजेंद्र राठौड़ को चुनाव से ठीक पहले नेता प्रतिपक्ष बनाकर राजपूतों को भी अपनी तरफ करने का प्रयास किया है। राठौड़ के अलावा फिलहाल राजस्थान में केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत प्रदेश के बड़े राजपूत चेहरे हैं। वहीं राजस्थान में ओम बिड़ला और गुलाबचंद कटारिया को अहम पद देकर भाजपा ने वैश्यों को पहले ही साधा हुआ है। ओम बिड़ला जहां लोकसभा अध्यक्ष हैं, वहीं गुलाबचंद कटारिया को हाल ही में असम का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। इसके अलावा राजस्थान से घनश्याम तिवाड़ी ब्राह्मण चेहरे के रूप में राज्यसभा के सदस्य हैं।

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राजस्थान में जाति के तौर पर जाट समाज का बड़ा प्रभाव है। यही वजह है कि भाजपा ने वर्तमान में कई अहम पदों पर जाट नेताओं को बिठाया है। प्रदेश अध्यक्ष के बाद सतीश पूनिया को उपनेता प्रतिपक्ष बनाया है। वहीं, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ इसी जाति से आते हैं और वे राजस्थान के रहने वाले हैं। केंद्रीय मंत्री के रूप में कैलाश चौधरी राजस्थान में जाट समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। प्रदेश में आदिवासी समुदाय में मीणा सबसे बड़ा वोट बैंक है। इसी के चलते डॉ. किरोड़ीलाल मीणा को राजस्थान से राज्यसभा सांसद बनाया हुआ है। कुल मिलाकर 12 फीसदी वोट बैंक राजस्थान में आदिवासियों का है, मगर सांसद के अलावा इस समुदाय के पास फिलहाल कोई खास प्रतिनिधित्व भाजपा में अब तक नहीं है।

बड़े नेताओं में अब वसुंधरा ही बाकी

भाजपा ने एक-एक कर तमाम बड़े नेताओं के बीच संतुलन साधते हुए उन्हें अलग-अलग पदों पर नियुक्त कर दिया है। जबकि आने वाले दिनों में कुछ नेताओं को भी नियुक्ति होने की संभावना है। ऐसे में प्रमुख नेताओं में अब सिर्फ वसुंधरा राजे ही हैं, जिन्हें लेकर भाजपा हाईकमान कोई निर्णय नहीं ले सका है। प्रदेश के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वसुंधरा राजे फैक्टर विधानसभा चुनाव 2023 और लोकसभा चुनाव 2024 में अहम रहेगा। ऐसे में भाजपा को उन्हें लेकर जल्द ही कोई ठोस निर्णय लेना पड़ेगा।

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