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Study: पटाखों से ज्यादा जानलेवा दीयों से जलना, दिल्ली एम्स के चिकित्सकों के अध्ययन आए सामने
Thu, 09 Nov 2023 05:45 AM IST
यशोधन शर्मा
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
Published by: यशोधन शर्मा
Updated Thu, 09 Nov 2023 05:45 AM IST
सार
साल 2022 में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली से कुल नौ मरीजों को इमरजेंसी में भर्ती किया गया, जिनमें से सात लोगों की उपचार के दौरान मौत हुई।
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दीपावली पर दिये
- फोटो : दिये
विस्तार
दिवाली पर हर साल आतिशबाजी की वजह से बच्चों और वयस्कों के जलने की घटनाएं होती हैं, लेकिन नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों का कहना है कि आतिशबाजी के साथ लक्ष्मी पूजन और दीपमालिका के समय भी लोगों को खास ध्यान देने की जरूरत है। एम्स के प्रारंभिक चिकित्सा अध्ययन में यह पुष्टि हुई है कि पटाखों से ज्यादा दीयों की वजह से लोगों की अधिक मौतें हुई हैं।
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जानकारी के अनुसार, दिपावली, आतिशबाजी और दीपमालिका को लेकर दिल्ली एम्स के अलग अलग चिकित्सा अध्ययन सामने आए हैं। इनमें से एक अध्ययन बर्न एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों ने किया है, जिसे अभी प्रकाशित नहीं है। इसके अनुसार, साल 2022 में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली से कुल नौ मरीजों को इमरजेंसी में भर्ती किया गया, जिनमें से सात लोगों की उपचार के दौरान मौत हुई।
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यह सभी मामले शाम के वक्त लक्ष्मी पूजन और दीपमालिका के दौरान दीयों के संपर्क में आने से आग की चपेट में आए। विभाग के प्रमुख डॉ. मनीष सिंघल ने बताया कि आतिशबाजी की वजह से लोग खासतौर पर बच्चे आग की चपेट में आते हैं, लेकिन हमारे विश्लेषण से यह भी पता चला है कि दीयों से जलने वालों में मृत्यु दर 70 फीसदी दर्ज की गई है जो आतिशबाजी की तुलना में बहुत ज्यादा है। इसलिए लोगों को दिपावली के समय न सिर्फ पटाखों बल्कि दीयों से भी सावधान रहने की जरूरत है।
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इस त्योहार पर लोगों को यह भी ध्यान देना चाहिए कि वह कैसे कपड़े पहनकर दीपमालिका करें, क्योंकि सिंथेटिक कपड़े बहुत जल्दी आग को पकड़ लेते हैं। डॉ. शिवांगी ने कहा कि एहतियात और सावधानी के साथ त्योहार मनाना जरूरी है।
झुलसे मरीजों में 93% दृष्टि की आंशिक अस्थायी हानि के शिकार
दिल्ली एम्स के ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेत्र विज्ञान केंद्र (आरपी सेंटर) के डॉक्टरों ने 2016 से 2018 के बीच दिवाली के आसपास एक महीने तक भर्ती होने वाले 3,374 मरीजों पर अध्ययन किया। इसमें से 83 ऐसे मरीजों को चुना गया, जो सीधे आतिशबाजी की वजह से घायल हुए। इनमें 85.11% पुरुष और 14.45% महिलाएं थीं। 72.37% दिल्ली के निवासी थे। इनमें 30.76% की उम्र 10 वर्ष से कम और 47.37% की 10 से 20 वर्ष के बीच थी। 3.95% की आयु 50 वर्ष से अधिक थी।
चिकित्सा दस्तावेज से पता चला कि 93 फीसदी मरीजों को आतिशबाजी की वजह से दृष्टि की आंशिक अस्थायी हानि हुई। यह स्थिति तब है, जब नेशनल प्रोग्राम फॉर कंट्रोल ऑफ ब्लाइंडनेस के अनुसार, भारत में अंधेपन की व्यापकता करीब 1.1% है, जो आतिशबाजी की तुलना में कम है। बच्चों और पुरुषों की बात करें तो कुल 2.3% में पटाखों के कारण आंखों की चोटें पाई गईं।