‘फाइल’ है भारी, तभी करेंगे ‘हाथी’ की सवारी
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दरअसल, बसपा में दावेदारों की ‘फाइल’ का वजन उम्मीदवारी तय कर रहा है। प्रत्याशी घोषित हो चुके नेताओं को डर भी यही है कि कहीं किसी और दावेदार की फाइल उससे भारी आ गई तो मैदान छोड़ना पड़ जाएगा।
बसपा में टिकटों की अदला-बदली का खेल पुराना है। बावजूद इसके बसपा के पास दावेदारों की कमी नहीं रही है। कई सीटों पर बदलते समीकरणों ने बसपा की उम्मीदों को मजबूत किया तो कई पर समीकरण कमजोर भी नजर आए।
बावजूद इसके वेस्ट यूपी खासतौर पर मेरठ और आसपास के जिलों में बसपा से उम्मीदवारी के लिये दावेदारों की लंबी लाइन है। पार्टी में नये सिरे से शुरू हुई उठापटक ने हाथी पर सवार धुरंधरों के छक्के छुड़ा दिये हैं।
दरअसल, उन्हें उम्मीदवारी जाने का भय सता रहा है। पहले भी ऐसे कई प्रत्याशियों को पार्टी आलाकमान ने बाहर का रास्ता दिखाया है, जो पूरी शिद्दत से क्षेत्र में काम कर रहे थे। अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहने का आरोप तो लगाया, लेकिन इस संबंध में उम्मीदवार के सामने कोई ठोस वजह नहीं रखी गई।
दरअसल, बसपा आलाकमान हर दावेदार से ‘फाइल’ जमा कराता है। कहने को तो इस फाइल में दावेदार के सियासी क्रिया कलापों का ब्यौरा होता है पर इसके कई अर्थ निकाले जाते हैं। इसी फाइल के कम होते भार ने कइयों के हाथ से उम्मीदवारी छीनी तो कई भारी फाइलों ने उम्मीदवारी दिला दी।
चर्चा है कि सरधना विधानसभा क्षेत्र में इसी रणनीति के तहत प्रत्याशी बदला गया था। सालभर से वहां बसपा का झंडा बुलंद कर रहे संजीव धामा को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। कैंट विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी घोषित किये गए शैलेंद्र चौधरी की फाइल भी सतेंद्र सोलंकी से हल्की रह गई। वह भी एक साल से क्षेत्र में मशक्कत कर रहे थे।
हैरत तो यह है कि ऐसे उम्मीदवारों को ढांढस बंधाने की बजाय सीधे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। छपरौली विधानसभा सीट से वकील अहमद का टिकट काटकर राजबाला को उम्मीदवार बनाया गया।
यही वजह है कि वर्तमान उम्मीदवार भी फाइलों के इस बोझ को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं, क्योंकि अब भी कई भारी फाइल वाले नेता बसपा आलाकमान के दरबार के चक्कर लगा रहे हैं। कई की फाइलें जा भी चुकी हैं पर अभी उनके वजन का आकलन किया जा रहा है। ऐसे में वर्तमान उम्मीदवारों के दिल में यह सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं दूसरे की फाइल और भारी आ गई तो क्या होगा?
मुस्लिम बिरादरियों का विरोध पहुंचाएगा नुकसान
मेरठ की कई विधानसभा सीटों पर कई बिरादरियों का विरोध भी सभी पार्टियों को नुकसान पहुंचाएगा। मेरठ की बात करें तो यहां सैफी बिरादरी का एक गुट कह चुका है कि उनसे कोई पार्टी वोट न मांगे। वे चुनाव का बहिष्कार करेंगे तो दूसरी तरफ मुस्लिम मलिक दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में ताल ठोंक चुके हैं।
इस बिरादरी का एक बड़ा धड़ा पंचायत कर यह कह चुका है, वह चुनाव का बहिष्कार करेगा। दक्षिण में मलिकों के अच्छे-खासे वोट हैं। इसके अलावा मेरठ में अलवी, अंसारी, कुरैशी जैसी बिरादरियों में भी अलग-अलग दलों को लेकर नाराजगी है और यहां के प्रत्याशियों को इन बिरादरियों को मनाना होगा।
मुस्लिमों पर सबसे ज्यादा निगाह सपा और बसपा की है। अमूमन ये बिरादरियां इन्हीं दोनों दलों को ज्यादा वोट भी करती आई हैं। चुनाव से पहले सपा और बसपा उम्मीदवारों ने इन्हें नहीं साधा तो मुश्किल होगी।