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‘फाइल’ है भारी, तभी करेंगे ‘हाथी’ की सवारी

अमित मुदगल/अमर उजाला, मेरठ Updated Mon, 27 Jun 2016 03:14 AM IST
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विधानसभा चुनाव से पहले बसपा में उबाल की स्थिति है। बसपाई व्यूह के बड़े सूरमा स्वामी प्रसाद मौर्य के पार्टी बदलने से पार्टी के अंदर घमासान मचा है। हैरत यह है कि बसपा में विधानसभा चुनाव की उम्मीदवारी बदलने के खेल से पार्टी सिपहसालारों के मन में कहीं न कहीं भय है।
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दरअसल, बसपा में दावेदारों  की ‘फाइल’ का वजन उम्मीदवारी तय कर रहा है। प्रत्याशी घोषित हो चुके नेताओं को डर भी यही है कि कहीं किसी और दावेदार की फाइल उससे भारी आ गई तो मैदान छोड़ना पड़ जाएगा।

बसपा में टिकटों की अदला-बदली का खेल पुराना है। बावजूद इसके बसपा के पास दावेदारों की कमी नहीं रही है। कई सीटों पर बदलते समीकरणों ने बसपा की उम्मीदों को मजबूत किया तो कई पर समीकरण कमजोर भी नजर आए।

बावजूद इसके वेस्ट यूपी खासतौर पर मेरठ और आसपास के जिलों में बसपा से उम्मीदवारी के लिये दावेदारों की लंबी लाइन है। पार्टी में नये सिरे से शुरू हुई उठापटक ने हाथी पर सवार धुरंधरों के छक्के छुड़ा दिये हैं।

दरअसल, उन्हें उम्मीदवारी जाने का भय सता रहा है। पहले भी ऐसे कई प्रत्याशियों को पार्टी आलाकमान ने बाहर का रास्ता दिखाया है, जो पूरी शिद्दत से क्षेत्र में काम कर रहे थे। अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहने का आरोप तो लगाया, लेकिन इस संबंध में उम्मीदवार के सामने कोई ठोस वजह नहीं रखी गई।

दरअसल, बसपा आलाकमान हर दावेदार से ‘फाइल’ जमा कराता है। कहने को तो इस फाइल में दावेदार के सियासी क्रिया कलापों का ब्यौरा होता है पर इसके कई अर्थ निकाले जाते हैं। इसी फाइल के कम होते भार ने कइयों के हाथ से उम्मीदवारी छीनी तो कई भारी फाइलों ने उम्मीदवारी दिला दी।

चर्चा है कि सरधना विधानसभा क्षेत्र में इसी रणनीति के तहत प्रत्याशी बदला गया था। सालभर से वहां बसपा का झंडा बुलंद कर रहे संजीव धामा को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। कैंट विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी घोषित किये गए शैलेंद्र चौधरी की फाइल भी सतेंद्र सोलंकी से हल्की रह गई। वह भी एक साल से क्षेत्र में मशक्कत कर रहे थे।

हैरत तो यह है कि ऐसे उम्मीदवारों को ढांढस बंधाने की बजाय सीधे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। छपरौली विधानसभा सीट से वकील अहमद का टिकट काटकर राजबाला को उम्मीदवार बनाया गया।

यही वजह है कि वर्तमान उम्मीदवार भी फाइलों के इस बोझ को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं, क्योंकि अब भी कई भारी फाइल वाले नेता बसपा आलाकमान के दरबार के चक्कर लगा रहे हैं। कई की फाइलें जा भी चुकी हैं पर अभी उनके वजन का आकलन किया जा रहा है। ऐसे में वर्तमान उम्मीदवारों के दिल में यह सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं दूसरे की फाइल और भारी आ गई तो क्या होगा?
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