कानों देखी: बसपा प्रमुख मायावती न तो इस बैठक में गईं और न ही उसमें, क्या लेंगी एकला चलो का निर्णय
मायावती न तो विपक्षी गठबंधन को घास डाल रही हैं और न ही सत्ता पक्ष के साथ खड़ी होकर एकता का संदेश दे रही हैं। यह सवाल जब बसपा के ही एक बड़े नेता और मायावती के करीबी से पूछा गया तो फोन पर हंस पड़े...
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बेंगलुरु में विपक्ष ने 26 दलों की एकता बैठक की। जवाब में एनडीए ने दिल्ली के अशोका होटल में 39 दलों के साथ बैठक की। लेकिन चर्चा मायावती की हो रही है। दोनों मिलन समारोह में एक साथ एक घाट पर पानी न पीने वाले कई दल साथ आ गए, लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में बड़े जनाधार वाली बसपा प्रमुख मायावती न इसमें गई और न उसमें। सवाल उठा कि आखिर मायावती किधर हैं? कभी विपक्ष के मुद्दे उठा देती हैं और कभी जरूरत पड़ऩे पर राजनीतिक कूटनीति को अपनाते हुए सत्ता पक्ष का साथ दे देती हैं। लेकिन मायावती न तो विपक्षी गठबंधन को घास डाल रही हैं और न ही सत्ता पक्ष के साथ खड़ी होकर एकता का संदेश दे रही हैं। यह सवाल जब बसपा के ही एक बड़े नेता और मायावती के करीबी से पूछा गया तो फोन पर हंस पड़े। बड़े मन से जवाब दिया कि आप तो जानते ही हैं कि बसपा इस समय कहां खड़ी है? पक्ष और विपक्ष दोनों बसपा और बहन कुमारी मायावती का साथ चाहते हैं। लेकिन बहनजी राजनीति में सत्ता के लिए कभी समझौता नहीं करती। वहीं अकेली नेता हैं और उन्होंने एकला चलो का निर्णय लिया है।
एनडीए मिलन में खूब हंसे होंगे प्रफुल्ल पटेल
प्रफुल्ल पटेल से जब मिलिए मोहक मुस्कान उनके चेहरे पर तैरती रहती है। खुद प्रफुल्ल पटेल ने बताया कि विपक्ष की पटना बैठक में गए थे और उन्हें हंसी रोकना मुश्किल हो रहा था। इसका कारण यह था कि कुछ दल उसमें ऐसे थे, जिनका लोकसभा में प्रतिनिधित्व न के बराबर था। 18 जुलाई को शिवसेना (उद्धव) के एक नेता को प्रफुल्ल की यही अदा बार-बार याद आ रही थी। साहब कह रहे थे कि दिल्ली के अशोका होटल में भाजपा ने 38 दलों के आने की घोषणा की थी। अंत तक 39 दलों का कुनबा जोड़ लिया है। बिहार के सन ऑफ मल्लाह (वीआईपी) मुकेश साहनी आते-आते रह गए थे। वरना संख्या 40 हो जाती। इस 39 में ऐसे 24 दल थे, जिनका लोकसभा में प्रतिनिधित्व नदारद था। अब ऐसे में प्रफुल्ल पटेल न हंसें, ऐसा हो नहीं सकता। यह बात अलग है कि वे जानें कब इस हंसी का राज बताएंगे।
विपक्ष की एकता में बड़ा किरदार निभा रहे हैं लालू
विपक्षी एकता का श्रेय सबसे बड़ा दल होने के नाते चाहे कांग्रेस ले या इसकी शुरुआत की जमीन तैयार करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, लेकिन इसमें जान डालने में सबसे बड़ी भूमिका राष्ट्रीय जनता दल के संस्थापक और सर्वे सर्वा लालू प्रसाद यादव की है। वह लालू प्रसाद यादव ही हैं, जिन्होंने ममता बनर्जी के पास संदेश भिजवाया। आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल से पटना में उमर अब्दुल्ला समेत अन्य के उलझने के दौरान बीच बचाव किया। पटना में ही राहुल गांधी को 2024 का दूल्हा बनाने का प्रस्ताव रखा। बेंगलुरु में भी लालू प्रसाद यादव ने तालमेल की कई कोशिशें की। लालू की ही लाइन को आगे बढ़ाते हुए ममता ने भी राहुल को अपना फेवरेट बताया। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और ममता बनर्जी जब आपस में बात कर रही थी, तो लालू प्रसाद यादव ने वहां भी तालमेल बनाने का प्रयास किया। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी के जहर बुझे बयानों को रेखांकित करते हुए कांग्रेस को चौधरी को नसीहत देने की अपील की। विपक्ष के तमाम दलों के नेताओं से बात कीजिए तो आपको कहते मिलेंगे कि विपक्षी एकता को दिल से चाहने वाले नेताओं में लालू प्रसाद हैं।
बिहार में अभी राजनीति का एक खेला और बाकी है
बिहार में अभी राजनीति का एक खेला और होने वाला है। जद (यू) से बाहर हुए आरसीपी सिंह को भी इसकी उम्मीद है। नित्यानंद राय भी बड़े विश्वास से भविष्य की ओर देख रहे हैं। प्रशांत किशोर की भी नजर है। नाम न छापने की शर्त पर राज्यसभा में उपसभापति हरिवंश के करीबी ने बताया कि इसकी स्क्रिप्ट भी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह लिख रहे हैं। सूत्रों को भरोसा है कि शाह के इस दांव से नीतीश कुमार की छटपटाहट और मुश्किल दोनों बढ़ने वाली हैं। बताते हैं कि इसका कुछ न कुछ अंदेशा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को हो चला है। जद(यू) के एक पुराने नेता का कहना है कि बार-बार के झटकों से नीतीश कुमार को दूध की तरह छांछ फूंककर पीने की आदत पड़ गई है। कभी कभी इस आदत के बड़े दुष्प्रभाव भी सामने आ जाते हैं।
स्मृति ईरानी और उनकी अमेठी मांगे मोर
केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को 2019 के लोकसभा चुनाव में बमुश्किल हराया था। कांग्रेसी इसका श्रेय राहुल गांधी के बदले चुनाव प्रबंधकों को देते हैं। उनका कहना है कि केएल शर्मा ऑल इन ऑल होते तो समस्या न आती। अब खबर है कि कांग्रेस को फिर से अमेठी की सीट चाहिए। इसके लिए जमीनी काम तेज हो रहा है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को हमेशा इसका डर भी सताता रहता है। ईरानी को पता है कि राहुल का विरोध ही उन्हें राजनीति में मुकाम दिलवाएगा। इसलिए वह राहुल गांधी का जिक्र आते ही हमलों की बारिश करने से नहीं चूकती। अब स्मिृति ईरानी की पीड़ा दूसरी भी है। अमेठी की जनता की भूख शांत करने में उन्हें खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। उनके ओएसडी, सांसद प्रतिनिधि गुप्ता जी समेत सब लगातार जनता के लिए सिफारिशी चिट्ठियां लिख रहे हैं, लेकिन जनता बस चक्कर काट रही है। यह वही जनता है जो अमेठी में कांग्रेस के राज में मौज कर रही थी। केद्रीय मंत्री को भी नहीं समझ में आ रहा है कि वह अमेठी की जनता मांगे मोर का क्या इलाज ढूंढें?
सब ठीक है, पर राजभर, दारा सब योगी के साथ खपेंगे कैसे?
उत्तर प्रदेश में सत्ता पक्ष का एक वर्ग ओम प्रकाश राजभर और दारा सिंह चौहान सरीखों की वापसी से खुश है। दूसरा वर्ग थोड़ा सशंकित। उसे समझ में नहीं आ रहा है कि पिछले छह महीने से भाजपा के साथ तालमेल बनाने के आतुर ओम प्रकाश राजभर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ कैसे खपेंगे? सत्ता पक्ष के इस वर्ग को पता है कि राजभर ने खुलकर बुल्डोजर बाबा का विरोध किया था। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में इन राजनीतिक मौसम विज्ञानियों ने मुख्यमंत्री के पैर का पसीना सिर पर चढ़ा दिया था। वैसे भी ये सत्ता पक्ष के एक कद्दावर मंत्री के ज्यादा करीब थे। ऐसे में इस वर्ग को मिशन-80 तो सुनने में अच्छा लग रहा है, लेकिन इसका (मुख्य रणनीतिकार की सोशल इंजीनियरिंग) स्वाद उतना ही कड़वा है। क्योंकि सत्ता वर्ग को पता है कि महाराज जी (मुख्यमंत्री) को बिना लाग-लपेट (जैसे को तैसा) वाली राजनीति ही पसंद है। इस वर्ग को यह भी पता है कि न बाबा के राज में अंसारी परिवार पर आफत आती और न लोगों के रंग बदलते।