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BSF Day: पाकिस्तान कभी नहीं भूलेगा बीएसएफ के उस साहस को, 1800 वर्ग मील जमीन छीन लाए थे बीएसएफ के जांबाज

Sat, 07 Dec 2024 02:56 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जितेंद्र भारद्वाज Updated Sat, 07 Dec 2024 02:56 PM IST
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सार
सीमा सुरक्षा बल 'बीएसएफ' का स्थापना दिवस, इस बार पाकिस्तान से लगते रेगिस्तानी प्रांत राजस्थान के जोधपुर में मनाया जा रहा है। आठ दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, जोधपुर में भव्य परेड की सलामी लेंगे। बांग्लादेश की लड़ाई में बीएसएफ ने कई मोर्चों पर तो अकेले ही पाकिस्तानी सेना को करारा जवाब दिया था।
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BSF Day: Pakistan will never forget courage of BSF brave soldiers had snatched 1800 square miles of land
BSF - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

सीमा सुरक्षा बल 'बीएसएफ' का इतिहास, वीरता के कारनामों से भरा पड़ा है। कुछ घटनाएं तो ऐसी भी रही, जिसमें बीएसएफ ने आर्मी की तर्ज पर दो कदम आगे बढ़कर दुश्मन को करारा जवाब दिया। बांग्लादेश की मुक्ति की लड़ाई में बीएसएफ ने भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। साल 1971 में कई मोर्चों पर सीमा सुरक्षा बल ने पाकिस्तानी सेना को करारा जवाब दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बीएसएफ के पहले डीजी 'केएफ रुस्तमजी' से कहा था, आपको जो अच्छा लगे, वह करें, लेकिन पकड़े न जाएं। अपनी पूरी ताकत बॉर्डर पर लगा दें। इसके बाद क्या था, बीएसएफ के जांबाजों ने 'केएफ रुस्तमजी'  के नेतृत्व में पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। पड़ोसी मुल्क, बीएसएफ के साहस को कभी नहीं भूल सकता। बीएसएफ के जांबाज, पाकिस्तानी सेना के कब्जे से 1800 वर्ग मील का इलाका छीन लाए। उस वक्त देश के शीर्ष नेतृत्व की जुबान पर बीएसएफ का नाम था। 'ब्लैक शर्ट्स', बीएसएफ के स्पेशल कमांडो ने पाकिस्तानी सेना पर हमला कर उसकी अधिकांश सामरिक पोजिशन तबाह कर दी। 



'गोलक मजूमदार' को दी थी कार्रवाई की पूरी छूट ...  
सीमा सुरक्षा बल 'बीएसएफ' का स्थापना दिवस, इस बार पाकिस्तान से लगते रेगिस्तानी प्रांत राजस्थान के जोधपुर में मनाया जा रहा है। आठ दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, जोधपुर में भव्य परेड की सलामी लेंगे। बांग्लादेश की लड़ाई में बीएसएफ ने कई मोर्चों पर तो अकेले ही पाकिस्तानी सेना को करारा जवाब दिया था। इस लड़ाई में बीएसएफ के पूर्वी फ्रंटियर के आईजी 'गोलक मजूमदार को फैसले लेने और कार्रवाई की पूरी छूट दे दी गई। बांग्लादेश की तरफ से गोलक मजूमदार को 'फ्रेंड्स ऑफ बांग्लादेश' का सम्मान दिया गया। संजीव कृष्ण सूद, एडीजी बीएसएफ (रिटायर्ड) ने अपनी पुस्तक 'बीएसएफ, द आइज एंड ईयर्स ऑफ इंडिया' में बांग्लादेश की मुक्ति के दौरान बीएसएफ शौर्य को लेकर कई खुलासे किए हैं। किताब के पन्ने, बीएसएफ की गौरव गाथा से भरे पड़े हैं।  


स्थापना के 6 साल के भीतर बीएसएफ को बड़ा टॉस्क ... 
एसके सूद ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि एक दिसंबर 1965 को बल की स्थापना के बाद मात्र छह साल के भीतर, 'बांग्लादेश की मुक्ति की लड़ाई' जैसा बड़ा टॉस्क बीएसएफ को मिला था। इस लड़ाई में मार्च 1971 से लेकर इसके खत्म होने, यानी दिसंबर 1971 तक बीएसएफ शामिल रही थी। कई मोर्चों पर बीएसएफ ने असीम बहादुरी का परिचय दिया। बीएसएफ के तत्कालीन चीफ लॉ अफसर, कर्नल एमएस बैंस ने बांग्लादेश के 'अंतिम संविधान' का ड्राफ्ट तैयार करने में मदद की थी। उनके कई सुझावों को ड्राफ्ट में शामिल किया गया। आईजी गोलक मजूमदार ने इस लड़ाई में अहम योगदान दिया था। उन्होंने पहले त्रिपुरा फिर पश्चिम बंगाल में काम किया था, इसलिए 'इंटेलिजेंस' पर उनकी अच्छी पकड़ थी। पाकिस्तान को लेकर उनके पास तमाम खुफिया सूचनाएं थीं। वे अकेले ऐसे व्यक्ति थे, जो 'बांग्लादेश अवामी लीग' के संपर्क में रहे। 

हुसैन अली को हार स्वीकार करने के लिए तैयार किया ...  
आईजी गोलक मजूमदार ने कोलकाता में पाकिस्तान के उच्चायुक्त हुसैन अली को हार स्वीकार करने के लिए तैयार किया था। उनके सामने दूतावास पर पाकिस्तान का झंडा उतर रहा था। वे दिसंबर 1971 में लड़ाई खत्म होने तक अवामी लीग के साथ संपर्क में रहे। गोलक मजूमदार को परम विशिष्ट विश्ष्टि सेवा मेडल प्रदान किया गया था। बांग्लादेश सरकार ने उन्हें 'फ्रेंड्स ऑफ बांग्लादेश' के सम्मान से नवाजा। मुक्ति वाहिनी के अस्तित्व में आने से पहले 'मुक्ति योद्धा' तैयार किए जा रहे थे। संजीव कृष्ण सूद के अनुसार, बीएसएफ ने ही मुक्ति वाहिनी को खड़ा किया था। उनकी ट्रेनिंग व संगठन का ढांचा सीमा सुरक्षा बल की अकादमी के तत्कालीन निदेशक ब्रिगेडियर बीएस पांडे ने तैयार किया था। बॉर्डर के विभिन्न हिस्सों पर 17 ट्रेनिंग सेंटर शुरू किए गए थे। इस सेंटरों पर 3000 मुक्ति वाहिनी कैडर को प्रशिक्षण मिला। बीएसएफ ने पाकिस्तान के संचार सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचाया। बांग्लादेश का मुख्यालय स्थापित किया गया। बांग्लादेश को हर तरह की सैन्य मदद दी गई। मुक्ति वाहिनी का वायरलेस सिस्टम, बीएसएफ ने ही खड़ा किया था। बीएसएफ ने पूर्वी पाकिस्तान में अनेक पुलों को ध्वस्त कर पाक सेना को बड़ा नुकसान पहुंचाया। पाकिस्तान में बड़े शहरों का लिंक खत्म कर दिया गया।

बीएसएफ के बिना नवाबगंज पर कब्जा संभव नहीं था ...  
1971 की लड़ाई में बीएसएफ ने स्पेशल कमांडो 'ब्लैक शर्ट्स' तैयार किए थे। ये वही कमांडो थे, जिन्होंने पाकिस्तानी सेना पर घात लगाकर हमला किया। पाकिस्तान की अधिकांश पोजिशन तबाह कर दी गई। जिम्मेदारी के दूसरे चरण में बीएसएफ को सभी बीओपी की सुरक्षा की जिम्मेदारी मिली। दिसंबर 1971 में बीएसएफ को सेना के हर बड़े टॉस्क में शामिल किया गया। सीमा सुरक्षा बल की 23 यूनिटों का कंट्रोल सेना के पास था। 71वीं बटालियन, जिसके पास 10 'पोस्ट ग्रुप आर्टिलरी' थी, उसकी कमांड सहायक कमांडेंट एलएस नेगी ने संभाल रखी थी। नवाबगंज पर कब्जा जमाने में उनका खास योगदान रहा था। मेजर जनरल लछमन सिंह, पीवीएसएम, वीआरसी जीओसी 20 माउंटेन डिवीजन ने 'डीओ' लैटर लिखकर बीएसएफ कमांडर 'आर्टिलरी' की बहादुरी और मदद का जिक्र किया था। उन्होंने लिखा कि सीमा सुरक्षा बल के बिना नवाबगंज पर कब्जा संभव ही नहीं था।

जब लगे 'लॉंग लिव इंडिया बांग्लादेश फ्रेंडशिप' के नारे ... 
पूर्व एडीजी एसके सूद ने अपनी किताब के चौथे अध्याय में लिखा है, जुलाई 1971 में बीएसएफ की 103वीं बटालियन, जो कूच बिहार में थी, उसने पाकिस्तानी सेना के कब्जे से 1800 वर्ग मील का इलाका छीन लिया था। सीमा सुरक्षा बल की 71वीं बटालियन ने महानंदा नदी के बाद पाकिस्तान की सेना पर जबरदस्त हमला किया था। इस लड़ाई में बीएसएफ के सिपाही पदम बहादुर लामा शहीद हुए थे। दो अन्य जवान घायल हुए। यह बटालियन जैसे ही बांग्लादेश के राजशाही में पहुंची, तो वहां लोगों ने 'लॉंग लिव इंडिया बांग्लादेश फ्रेंडशिप' के नारे लगाए। 77वीं बटालियन जो पहाड़ी इलाके में तैनात थी, उस पर पाकिस्तान ने भारी बमबारी की। बीएसएफ ने जब जवाब देना शुरू किया तो पाकिस्तान फ्लैग मीटिंग के लिए राजी हो गया। 22 अप्रैल 1971 को दोनों पक्ष, फायरिंग रोकने पर राजी हो गए। सीमा सुरक्षा बल ने पूर्वी पाकिस्तान की खानपुर बीओपी पर कब्जा कर लिया था। इसमें बीएसएफ के नायक अमल कुमार मंडल शहीद हो गए थे।

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