ब्रिगेडियर की जुबानी: गुलेल की तरह गोले दागकर जीत लिए तोललिंग के अड्डे
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भारतीय सेना के अफसर की सूझबूझ और समय पर निर्णय लेने की क्षमता उसके अपरेशन की सफलता को सुनिश्चित कर देती है। मेजर जनरल(रिटा.) लखविंदर सिंह जब कारगिल संघर्ष के दौरान अपने तोपखाना डिवीजन के दु:साहस को बताते हैं, तो उनके आंखों की चमक देखते बनती है। मेजर जनरल उन दिनों ब्रिगेडियर थे। वह तोपखाना डिवीजन के ऐसे इकलौते ब्रिगेडियर हैं जिन्होंने सूझबूझ, रणनीतिक कौशल और सिद्धांत के आधार पर कारगिल संघर्ष में हमला करने के लिए अनूठा प्रयोग किया।
उनके प्रयोग को भारतीय सेना याद रखती है। कारगिल के समय वह श्रीनगर के पास तनमर में तोपखाना यूनिट की ब्रिगेड को कमांड कर रहे थे। अचानक कारगिल संघर्ष छिड़ गया। तब सैन्य कमांडरों ने उनकी यूनिट को कारगिल में मोर्चा लेने के लिए कहा।
दुरूह थी जीत
मेजर जनरल बताते हैं कि जब वह पहुंचे तो पांच-छह पहाडिय़ों पर घुसपैठिए के रुक में घुस आए पाकिस्तानी लड़ाके डटे हैं। इन्होंने स्थायी बंकर बना लिया है और इनके पास भारी तथा उत्तम गुणवत्ता के हथियार हैं। इनका हमला भी सेना की इनफैट्री जैसा ही है। इन घुसपैठियों का मुकाबला हमारी सेना की इनफैंट्री कर रही थी। ग्रेनेडियर यूनिट वहां तैनात थी और उसे काफी नुकसान उठाना पड़ गया था। उसके जेसीओ समेत तीन चार अफसर और अन्य लड़ते हुए शहीद हो गए थे। स्थिति देखकर सफलता मिलना बहुत मुश्किल लग रही थी।
भौगोलिक स्थिति विपरीत थी
सामने सीधा खड़ा नंगा पहाड़ था। ऊंचाई की तोललिंग की चोटी पर दुश्मन काबिज था। उससे कोई दो सौ से अधिक नीचे हमारे इंफैट्री के जवान बहादुरी के साथ डटे थे। लेकिन दुश्मनों के ऊंचाई पर होने के कारण इंफैट्री की बहादुरी बेअसर हो रही थी। इस पहाड़ की स्थिति के सीधा खड़ा होने के कारण इस पर चढऩा भी मुश्किल था।
ऐसी स्थिति में दिन में हमले करने का खतरा काफी बड़ा था। क्योंकि हम नीचे थे, दुश्मन ऊंचाई पर पोजीशन लिए बैठे थे। वह भी सीधा सामने। इंफैट्री के हमला करने पर भी खतरा बड़ा था। हालत यह थी हमले की दशा में एक दुश्मन को निशाने पर लेने में हमारे चीन-चार से अधिक जवानों के शहीद होने का खतरा था।
नहीं हो सकता हमला
हालात, भौगोलिक स्थिति सब देखकर लगा कि हम हमला करके दुश्मन को नियंत्रण में नहीं कर सकते। उसे नहीं भगा सकते। इसका एक बड़ा कारण तोपखाने की दशा, गोला बारुद की स्थिति, उपकरणों का अभाव भी था। लेकिन यह एक चुनौती थी। दुश्मन के कब्जे से अपनी जमीन छुड़ानी थी। ऐसे में जनरल जगजीत सिंह द्वारा अपनाई गई रणनीति ने थोड़ी उम्मीद की लौ जगाई। हमारी दूसरी उम्मीद तब जग गई जब वहां बोफोर्स तोप को तैनात करने पर सहमति बन गई और तैनाती होने लगी। मैं इस तोप का कमांडर रह चुका था। इसमें हमें महारत हासिल थी।
बस, फिर क्या था हमने निर्णय ले लिया कि बोफोर्स से डायरेक्ट फायरिंग करेंगे। डायरेक्ट फायरिंग के साथ-साथ इनडायरेक्ट फायरिंग करेंगे। इंडायरेक्ट फायरिंग में तोप के गोले लक्ष्य से दूर तक फैलकर गिरते हैं। क्योंकि इसमें लक्ष्य कहीं और होता है और गोले की दिशा कहीं और रखकर ऊंचाई, दूरी की गणना करके फायरिंग की जाती है। पैराबोलिक पाथ बनता है। वहीं डायरेक्ट फायरिंग में गोले लक्ष्य के बिल्कुल पास जाते या उसी पर गिरते हैं। यहां दुश्मन सामने था। इसलिए डायरेक्ट फायरिंग के खतरे भी थे। फ्लैश (चमक)दिखते ही दुश्मन का वार आने का खतरा था।
गुलेल की तरह बरसाए गोले
गुलेल की तरह बरसाए गोले
मेजर जनरल लखविंदर सिंह के अनुसार यहां नई चुनाती, दुश्वारियां सब मौजूद थी, इसलिए नए तरीके से ही हमला संभव था। हमने वही किया। छह बोफोर्स तोपें तैनात करने और उनसे गुलेल की तरह सीधे लक्ष्य पर गोले दागने का निर्णय लिया। इसके चारो तरफ 56 गन लगाई कवर फायर देने के लिए। इंफैंट्री पहले ही चाह रही थी कि आर्टिलरी की सहायता मिले।
ग्रिनेडियर विंग भी कुछ खास नहीं कर पा रही थी। मुझे भी इस नए प्रयोग के लिए सबको विश्वास में लेने में मशक्कत करनी पड़ी, लेकिन जब फायर शुरू हुआ तो असर दिखने लगा। हमने दुश्मन की बातचीत इंटरसैप्ट कराई। वह अपने आकाओं से गुहार लगा रहे थे। वह कह रहे थे हमें बचाओ, यहां से निकालो, यहां तो कहर बरस रहा है। मेजर जनरल के अनुसार इसके बाद तो हमारा हौसला बढऩा तय था।
अप्रत्याशित निर्णय था
युद्ध की जमीन में कभी भी ऊंचाई वाली स्थिति से सैनिक पीछे नहीं लाए जाते। तोललिंग पहाड़ी पर हमारे सैनिक दुश्मन से कोई 200-250 फीट नीचे थे। लेकिन हमें अगली फायरिंग के लिए इन्हें नीचे उतारना था। हमारे इस निर्णय पर सैन्य कमांडर बमुश्किल माने। मैजर जनर के अनुसार मैनें उन्हें भरोसा दिलाया कि हमारी ब्रिगेड तोललिंग को जीतकर देगी।
बताते हैं काफी मशक्कत के पास भारतीय सैनिकों को छह सौ गज पीछे हटने को कहा गया। इसके बाद चारों तरफ से सीओ, जेसीओ को लगाकर 56 गन से इंडायरेक्ट(परोक्ष) फायरिंग शुरू कराई। इसके साथ-साथ छह बोफोर्स तोपों ने डायरेक्ट(गुलेल की तरह सीधे) फायरिंग(गोले उगलने शुरू किए) शुरू की। नतीजा सामने था। हमारे सैनिकों ने पहली पोस्ट तोललिंग पर कब्जा कर लिया।
इतिहास में नहीं हुई ऐसी फायरिंग
तोप से हमले के इतिहास में इतना सीधी फायरिंग आज तक नहीं हुई है। दुनिया के सैन्य इतिहास में यह अनूठा प्रयोग था। हमने इसे एक सिद्धांत के आधार पर अपनाया था। मेरा इस सिद्धांत के आधार पर अनुमान था कि यदि तोप की ऊंचाई का आधार लक्ष्य ऊंचाई के अनुपात में सीधा(बराबर) हो तो डायरेक्ट फायरिंग काफी प्रभावी होती है। बस इसी रणनीति के कुशलता से इस्तेमाल ने हमें वह दे दिया, जिसकी हम उम्मीद नहीं कर सके थे।
इसके बाद तो हमारा हौसला काफी बढ़ गया। हमारे जवानों का हौसला काफी बढ़ गया। इसकी आज भी दुनिया में तारीफ होती है। भारतीय सैन्य इतिहास में इस प्रयोग को दर्ज कर लिया गया है। अमेरिका आदि के विशेषज्ञ भी मानने लगे कि कारगिल जैसे दुरुह ठिकाने को इंफैंट्री और आर्टिलरी ने बहादुरी, रणनीति और कौशल से अपने कब्जे में ले लिया।