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SC: 17 साल पुराने पुणे BPO सामूहिक दुष्कर्म मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला; मृत्युदंड उम्रकैद में तब्दील
Mon, 09 Dec 2024 01:18 PM IST
काव्या मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: काव्या मिश्रा
Updated Mon, 09 Dec 2024 01:18 PM IST
सार
वारदात के कुछ दिन बाद ही पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया था। दोनों को पुणे की सेशन कोर्ट ने मार्च 2012 में महिला के अपहरण, दुष्कर्म और हत्या के लिए दोषी ठहराया था और मौत की सजा सुनाई थी।
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Supreme Court
- फोटो : ANI
विस्तार
साल 2007 के पुणे बीपीओ गैंगरेप और हत्या मामले में एक बड़ा फैसला आया है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने दो दोषियों की मौत की सजा उम्रकैद में बदल दी है। इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने दया याचिका पर फैसले में देरी के चलते मौत की सजा को रद्द कर इसे उम्रकैद में बदल दिया था। जिस पर अब शीर्ष अदालत ने भी मोहर लगा दी।
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अपील में जस्टिस अभय एस ओक, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली महाराष्ट्र सरकार की अपील खारिज कर दी।
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यह है पूरा मामला
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की रहने वाली पीड़िता पुणे के हिंजवड़ी बीपीओ में काम करती थी। एक नवंबर 2007 को नाइट शिफ्ट के लिए कंपनी की कैब से जा रही थी। उस समय कार पुरुषोत्तम बोराटे चला रहा था जबकि उसका दोस्त प्रदीप कोकाटे भी उसके साथ मौजूद था। पुरुषोत्तम ने कार कंपनी की ओर ले जाने की जगह पुणे- मुंबई एक्सप्रेस वे के पास एक गांव के पास ले गया। वहां पर सुनसान जगह पर दोनों ने लड़की का दुष्कर्म किया और उसके दुपट्टे से उसका गला घोंट दिया। इतना ही नहीं, पहचान छिपाने के लिए उसका चेहरा पत्थर से कुचलकर फरार हो गए थे।
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वारदात के कुछ दिन बाद ही पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया था। दोनों को पुणे की सेशन कोर्ट ने मार्च 2012 में महिला के अपहरण, दुष्कर्म और हत्या के लिए दोषी ठहराया था और मौत की सजा सुनाई थी। वहीं, हाईकोर्ट ने भी सेशन कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था, जिसके बाद दोनों सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।
पहले सजा रखी बरकरार फिर उम्रकैद में बदली
सुप्रीम कोर्ट ने भी दोनों को राहत नहीं दी और साल 2015 की मई में फांसी को बरकरार रखा। इसके बाद से दोनों पुणे की यरवदा जेल में बंद हैं और दोनों की दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है। दोनों को 24 जून 2019 में फांसी दी जानी दी थी। हालांकि, कई साल बीत जाने के बाद इसी साल जून महीने में दोनों ने कई साल से जेल में बंद होने का हवाला देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में अपनी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने की गुहार लगाते हुए याचिका दायर की थी। ऐसे में 21 जून 2019 को हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि अगले आदेश तक फांसी नहीं दी जाए।
फांसी की सजा को बॉम्बे हाईकोर्ट ने किया था रद्द
फैसला सुरक्षित रखते हुए कोर्ट ने दोषियों की मौत की सजा के निष्पादन में न्यायिक देरी और राज्य द्वारा की गई देरी पर गौर किया था। 29 जुलाई 2019 में दो दोषियों को मिली फांसी की सजा को बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था।दया याचिका पर फैसले में देरी के चलते दोनों ने फांसी की सजा रद्द करने की मांग की थी। जिसपर सुनवाई के बाद अदालत ने इसे उम्रकैद में बदल दिया। अब इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मोहर लगा दी है।
हाईकोर्ट ने कहा था, 'हम याचिकाकर्ताओं द्वारा जेल में बिताए गए समय को देखते हुए मृत्युदंड को 35 साल की अवधि के लिए आजीवन कारावास में बदलते हैं।'