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किताब में दावा: उल्फा प्रमुख को नाराज करने से डरता था ISI, परेश बरुआ को लेकर ऐसी बातें होती थीं; जानें सब कुछ

Sun, 11 Feb 2024 12:58 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: काव्या मिश्रा Updated Sun, 11 Feb 2024 12:58 PM IST
सार

किताब 'उल्फा : द मिराज ऑफ डॉन' में 1970 के दशक के अंत में प्रतिबंधित समूह के गठन से लेकर मौजूदा समय तक के सफर का जिक्र किया गया है। इसमें दावा किया गया है कि आईएसआई उल्फा प्रमुख से डरता था।

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book claims ISI considered ULFA's Paresh Baruah prize catch who couldn't be allowed to get offended
परेश बरुआ - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

असम के उल्फा उग्रवादियों को लेकर एक नई किताब में कई दावे किए गए हैं। इसमें बताया गया है कि 1991-92 में उल्फा उग्रवादियों को प्रशिक्षित करने वाली आईएसआई विद्रोही समूह के प्रमुख परेश बरुआ से डरता था। इसलिए वह किसी भी हालत में उसे नाराज नहीं करना चाहता था। यहां तक कि बरुआ ने पूर्वोत्तर राज्य में अभियान चलाने के लिए एजेंसी की कमान संभालने से भी इनकार कर दिया था, तब भी आईएसआई ने उससे कुछ नहीं कहा। 

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'द मिराज ऑफ डॉन' में दावा
किताब ऐसे समय में सामने आई है, जब अरविंद राजखोवा के नेतृत्व वाले धड़े और केंद्र के बीच शांति वार्ता चल रही है। अनुभवी पत्रकार राजीव भट्टाचार्य की किताब 'उल्फा : द मिराज ऑफ डॉन' में 1970 के दशक के अंत में प्रतिबंधित समूह के गठन से लेकर मौजूदा समय तक के सफर का जिक्र किया गया है। बरुआ अब वार्ता विरोधी उल्फा (इंडिपेंडेंट) गुट का प्रमुख है। माना जाता है कि वह चीन के युन्नान प्रांत में कहीं छिपा हुआ है।
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यहा दिया गया प्रशिक्षण
उल्फा उग्रवादियों के पहले बैच को 1991-92 में पाकिस्तान में तीन समूहों में प्रशिक्षित किया गया था। इसमें कुल लगभग 40 कैडर शामिल थे। एक समूह को पेशावर के पास प्रशिक्षित किया गया था। जबकि अन्य को अफगानिस्तान के कंधार और पाकिस्तान में सफेद कोह पहाड़ों के पास दर्रा आदम खेल में हथियार बाजार ले जाया गया था।
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आईएसआई के नहीं मानता था फरमान
किताब में कहा गया है कि आईएसआई को उम्मीद थी कि बरुआ उनके आदेश मानेगा, जबकि इस बात ने उल्फा प्रमुख को परेशान कर दिया था। भट्टाचार्य ने लिखा, 'बरुआ एजेंसी के सामने झुकने और असम में अभियान चलाने के आदेश लेने जैसे उसके सभी फरमानों को मानने के लिए तैयार नहीं था। एक समय पर, उसने मान लिया था कि आईएसआई के साथ उसका जुड़ाव खत्म होने की कगार पर है। आखिरी बैठक के दौरान बरुआ अचानक से खड़ा हुआ और हमेशा के लिए अलविदा करके कार्यक्रम स्थल से चला गया था।' हालांकि, आईएसआई बरुआ से डरता था, इसलिए उसे नाराज नहीं कर सकता था।

शनिवार को लॉन्च की गई किताब में दावा किया गया है कि एजेंसी यह अच्छी तरह से जानती थी कि उल्फा के साथ जुड़े रहने से बहुत फायदे हो सकते हैं। जैसे कि पूर्वोत्तर के अन्य अलगाववादी समूहों तक पहुंच, जिन्हें पाकिस्तान में प्रशिक्षित किया जा सकता है।

हार्पर कॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित पुस्तक में कहा गया कि इसलिए, एजेंसी ने न केवल दूसरे बैच को अपना प्रशिक्षण पूरा करने की अनुमति दी, बल्कि जल्द ही ढाका में दूतावास में अपने सदस्यों को निर्देश दिया कि वे बरुआ से अगले बैच को भेजने का अनुरोध करें। अनुरोध पर बरुआ ने वैसा ही किया और खुद रावलपिंडी में स्थित आईएसआई मुख्यालय में भी गया। इससे यह विवाद न केवल खत्म हो गया था बल्कि इसने एक समझौते पर मुहर लगा दी थी जो कई वर्षों तक चलने वाली थी।

कयानी ने उल्फा सदस्यों के साथ हाथ मिलाया
इसमें यह भी कहा गया है कि लेफ्टिनेंट जनरल अशफाक परवेज कयानी ने उल्फा सदस्यों के एक समूह के साथ उस समय बातचीत की और हाथ मिलाया जब वे उस देश में प्रशिक्षण ले रहे थे। कयानी ने 2007 में पाकिस्तान सेना प्रमुख के तौर पर जनरल परवेज मुशर्रफ का पद संभाला था।

बांग्लादेश में दो महीने तक रहा था कैद में
पुस्तक में यह भी बताया गया है कि कैसे बरुआ को खुफिया एजेंसी डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस द्वारा बांग्लादेश में दो महीने से अधिक समय तक कैद में रखा गया था। 1993 में चटगांव में पुलिस ने एक जहाज में रोमानिया से लाए गए अत्याधुनिक हथियारों की खेप को जब्त कर लिया था। हथियार छोड़ने के लिए बरुआ ने खुफिया एजेंसी से संपर्क किया था। तभी बरुआ को एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी के साथ डीजीएफआई की हिरासत में ले लिया गया था और मीरपुर सैन्य छावनी में रखा गया।

यहां रखा गया था
भट्टाचार्य ने पुस्तक में कहा, 'डीजीएफआई उल्फा और भारत के पूर्वोत्तर के अन्य विद्रोही समूहों की बांग्लादेश में गतिविधियों के बारे में पूरी तरह से अवगत था। लेकिन उसने कभी उम्मीद नहीं की थी कि यह संगठन इतना बेशर्म होगा कि वह गुप्त रूप से देश में हथियारों की एक बड़ी खेप आयात करेगा! इसलिए, परेश और उल्फा के अन्य पदाधिकारियों को डीजीएफआई की अलग-अलग कोठरियों में रखा गया था, लेकिन किसी का भी शारीरिक उत्पीड़न नहीं किया गया, जैसा कि आमतौर पर ऐसी जगहों पर होता है।'


किताब में दावा किया गया कि बरुआ के जेल के अंदर भूख हड़ताल पर बैठने के बाद दोनों को रिहा किया गया था। एजेंसी ने दोनों से पूछताछ की और फिर उन्हें बिना शर्त रिहा कर दिया था। किताब में यह भी बताया गया है कि बांग्लादेश में बरुआ को मारने की कैसे चार बार कोशिश की गई।

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