मुंबई हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, अब हाजी अली दरगाह में जा सकती हैं महिलाएं
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मुंबई हाईकोर्ट ने आज एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हाजी अली दरगाह में महिलाओं पर लगी पाबंदी हटा दी है। अब महिलाएं भी हाजी अली दरगाह में जा सकती है। हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान इस बात की इजाजत देता है। इसी आधार पर महिलाओं से लगी पाबंदी हटा दी गई है। महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ रहीं तृप्ति देसाई ने इसे बड़ी जीत करार दिया है।
मुस्लिम महिला आंदोलन 2014 में इस केस को मुंबई हाईकोर्ट लेकर गया था। मंबई हाईकोर्ट ने आज अपनी सुनवाई में कहा, 'संविधान के तहत महिलाओं को भी वहां पर जाने की इजाजत है जहां पर पुरुष जा सकते हैं। महिलाओं को सुरक्षा मुहैया कराना हाजी अली ट्रस्ट की जिम्मेदारी है।'
आपको बता दें कि हाजी अली दरगाह में महिलाएं जा तो सकतीं थी लेकिन वो मजार से एक हाथ पीछे खड़ी होती थी। इसके खिलाफ मुस्लिम महिला आंदोलन नाम की संस्था ने बाम्बे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। ट्रस्ट महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ है। हाजी अली दरगाह ट्रस्ट के मुफ्ती मंजूर ने कहा है कि वे इस फैंसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।
मिला था आपसी समझौते का समय
मामले की सुनवाई जस्टिस वीएम कनाडे और जस्टिस रेवती मोहिते-डेरे की खंडपीठ ने की। याचिकाकर्ता नूरजहां सफिया नियाज की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव मोरे ने हाई कोर्ट में पैरवी की। नियाज ने अगस्त 2014 में अदालत में याचिका दायर कर यह मामला उठाया था। जिसके बाद कोर्ट ने दोनों पक्षों को आपसी समझौता करने का भी समय दिया था लेकिन दरगाह के अधिकारी महिलाओं के प्रवेश पर रोंक पर अड़े रहे।
इस बीच कोर्ट के फैसले पर दरगाह आला हज़रत बरेली शरीफ के प्रवक्ता मुफ़्ती सलीम नूरी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दरगाह ट्रस्ट ने मजबूत के साथ अपना पक्ष नहीं रखा। उन्होंने कहा, 'लगता है कोर्ट में मज़बूती से अपना पक्ष नहीं रख सका जबकि हमारे पैगम्बर अलैहिस्सलाम का हुक्म है कि मुस्लिम महिलाएं कब्रिस्तान या क़ब्रों पर न जाएँ। कोर्ट का फैसला देख कर दरगाह ट्रस्ट को मजबूती से सुप्रीम कोर्ट में शरीयत का पक्ष में रखना चाहिए।'
सलीम नूरी ने कहा, 'दरगाह ट्रस्ट से हम अपील करते है कि वो जिस वकील से केस की पैरवी कराएं उन्हें आला हजरत की इस टॉपिक पर लिखी किताब," मज़ारात पर औरतों की हाज़री जरूर पढ़ने को दें।वकील को बहुत मज़बूत साक्ष्य और दलीलें मिल जाएँगी। साथ ही मुस्लिमों की ये जिम्मेदारी बनती है कि वे अपनी शरीयत के उसूलों पर चलते हुए अपनी औरतों को दरगाह और कब्रिस्तान में न जाने दें।'
इससे पहले भी महिलाओं के हक में आ चुके हैं फैसले
दरगाह के ट्रस्टी का का कहना है कि किसी पुरुष मुस्लिम संत की कब्र पर महिलाओं का जाना इस्लाम में गुनाह है इसलिए दरगाह के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी सही है।गौरतलब है कि पूजा स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर महिलाओं की लड़ाई चल रही है।
इससे पहले महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं को 400 साल बाद प्रवेश की अनुमति मिल थी। मंदिर में प्रवेश के अधिकार के लिए महिलाओं ने न सिर्फ सड़क पर उतर कर आंदोलन किया बल्कि कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था।
फैसले से कोई खुश तो कोई नाराज
हाजी अली दरगाह मामले में याचिकाकर्ता जाकिया सोमन फैसले से बहुत खुश हैं। उन्होंने सामाचार एजेंसी एएनआई से कहा, 'यह मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने की दिशा में बहुत बड़ा कदम है।' उत्तर प्रदेश की पहली महिला काजी हिना जहीर फैसले की तारीफ करते हुए हाजी कहती हैं कि 'यह एक बहुत ही अच्छा और तार्किक निर्णय है।'
वहीं एमआईएम के हाजी अराफात फैसले के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि कोर्ट को इसमें दखल नहीं देना चाहिए था। 'अब जब उन्होंने हमारे खिलाफ फैसला दे ही दिया है तो हम अब सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।'