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HC: मीरा रोड सांप्रदायिक हिंसा मामले में 14 आरोपियों को जमानत, राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले हुआ था बवाल
Tue, 10 Dec 2024 02:55 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 10 Dec 2024 02:55 PM IST
सार
जस्टिस एनजे जमादार की एकल जज की पीठ ने सोमवार को सुनवाई के दौरान कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्थापित नहीं होता कि उस दिन राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मना रहे काफिले में शामिल लोगों पर हमले की पहले से कोई साजिश थी।
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बॉम्बे हाईकोर्ट
- फोटो : एएनआई
विस्तार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मीरा रोड सांप्रदायिक हिंसा मामले में 14 आरोपी मुस्लिमों को जमानत दे दी। इन सभी लोगों पर जनवरी में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से ठीक पहले कथित तौर पर हिंसा की घटनाओं में शामिल होने का आरोप था।
जस्टिस एनजे जमादार की एकल जज की पीठ ने सोमवार को सुनवाई के दौरान कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्थापित नहीं होता कि उस दिन राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मना रहे काफिले में शामिल लोगों पर हमले की पहले से कोई साजिश थी। जज ने कहा कि आरोपियों की हिरासत को और बढ़ाने के पक्ष कमजोर हैं।
जज ने सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हुए कहा कि इनमें आरोपियों को किसी भी शिकायतकर्ता या और किसी शख्स को प्रताड़ित करते नहीं देखा जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जांच पूरी हो चुकी है। चूंकि आरोपियों की समाज में जड़ें हैं, इसलिए इनके न्याय से बच निकलने की संभावना भी कम है।
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बेंच ने इस बात पर भी गौर किया कि सभी आरोपी जनवरी से कस्टडी में हैं और ट्रायल के जल्द खत्म होने की भी संभावना नहीं है। इसलिए आगे हिरासत बढ़ाना गैरजरूरी है। गौरतलब है कि आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता और असलहा कानून के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। इन सभी लोगों को ठाणे जिले के सत्र न्यायालय की तरफ से जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। इसके बाद सभी आरोपियों ने हाईकोर्ट का रुख किया था।
पुलिस के मुताबिक, आरोपी 50-60 लोगों की भीड़ का हिस्सा थे। इन लोगों पर राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मना रहे लोगों को घेरने, उनके खिलाफ नारेबाजी करने और हमला करने का आरोप था।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसे सबूत होने चाहिए, जिनमें इन आरोपियों के एक साथ अवैध तरीके से जुटने की बात हो। बेंच ने पाया कि जिस जगह यह घटना हुई, वहां राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मना रहे काफिले का होना सिर्फ मौके की बात थी। इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि यह हमला साजिशन किया गया।
अदालत ने कहा, ‘‘इस मामले में 50-60 से अधिक लोगों की ओर से कथित तौर पर दंगा किया गया था। उन आरोपियों का अपराध अवैध जुटाव के सदस्यों के रूप में उनकी पहचान पर निर्भर करता है, जिन्होंने एक से मकसद से कथित अपराध किया। ऐसे में उन्हें विचाराधीन कैदियों के रूप में आगे हिरासत में रखना गैरजरूरी है।’’
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जस्टिस एनजे जमादार की एकल जज की पीठ ने सोमवार को सुनवाई के दौरान कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्थापित नहीं होता कि उस दिन राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मना रहे काफिले में शामिल लोगों पर हमले की पहले से कोई साजिश थी। जज ने कहा कि आरोपियों की हिरासत को और बढ़ाने के पक्ष कमजोर हैं।
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जज ने सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हुए कहा कि इनमें आरोपियों को किसी भी शिकायतकर्ता या और किसी शख्स को प्रताड़ित करते नहीं देखा जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जांच पूरी हो चुकी है। चूंकि आरोपियों की समाज में जड़ें हैं, इसलिए इनके न्याय से बच निकलने की संभावना भी कम है।
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बेंच ने इस बात पर भी गौर किया कि सभी आरोपी जनवरी से कस्टडी में हैं और ट्रायल के जल्द खत्म होने की भी संभावना नहीं है। इसलिए आगे हिरासत बढ़ाना गैरजरूरी है। गौरतलब है कि आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता और असलहा कानून के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। इन सभी लोगों को ठाणे जिले के सत्र न्यायालय की तरफ से जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। इसके बाद सभी आरोपियों ने हाईकोर्ट का रुख किया था।
पुलिस के मुताबिक, आरोपी 50-60 लोगों की भीड़ का हिस्सा थे। इन लोगों पर राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मना रहे लोगों को घेरने, उनके खिलाफ नारेबाजी करने और हमला करने का आरोप था।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसे सबूत होने चाहिए, जिनमें इन आरोपियों के एक साथ अवैध तरीके से जुटने की बात हो। बेंच ने पाया कि जिस जगह यह घटना हुई, वहां राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मना रहे काफिले का होना सिर्फ मौके की बात थी। इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि यह हमला साजिशन किया गया।
अदालत ने कहा, ‘‘इस मामले में 50-60 से अधिक लोगों की ओर से कथित तौर पर दंगा किया गया था। उन आरोपियों का अपराध अवैध जुटाव के सदस्यों के रूप में उनकी पहचान पर निर्भर करता है, जिन्होंने एक से मकसद से कथित अपराध किया। ऐसे में उन्हें विचाराधीन कैदियों के रूप में आगे हिरासत में रखना गैरजरूरी है।’’