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BNS: दिल्ली पुलिस ने पॉक्सो केस में 10 दिन में जांच की, 23 दिन में चार्जशीट; दोषी को हुई 20 साल कैद
Tue, 30 Jun 2026 08:43 PM IST
राहुल कुमार
डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: राहुल कुमार
Updated Tue, 30 Jun 2026 08:43 PM IST
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला
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भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के अंतर्गत त्वरित जांच एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर पॉक्सो प्रकरण में समयबद्ध न्याय, ये तीन नए कानूनों की सफलता की कहानी है। दिल्ली पुलिस ने बाल यौन उत्पीड़न के पॉक्सो केस में 10 दिन के भीतर जांच पूरी कर ली। इतना ही नहीं, महज 23 दिन में चार्जशीट भी दाखिल कर दी। इसके बाद त्वरित एवं समयबद्ध न्याय का एक उदाहरण पेश किया गया। आरोपी को 20 साल की कैद की सजा सुनाई गई। 50 हजार रुपये का जुर्माना हुआ। वहीं पीड़ित पक्ष को दस लाख रुपये का मुआवजा दिया गया।
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दो वर्षीय बालिका यौन उत्पीड़न का शिकार
गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, यह मामला 27 जून 2025 को दिल्ली के बवाना थाना क्षेत्र में सामने आया था। दो वर्षीय बालिका यौन उत्पीड़न का शिकार हुई। इस मामले की सूचना दिल्ली पुलिस को अस्पताल से मिली थी। पुलिस ने घटनास्थल पर जाकर निरीक्षण किया, चिकित्सीय दस्तावेजीकरण, फोरेंसिक सैंपलिंग तथा गवाहों के बयान के माध्यम से वैज्ञानिक साक्ष्य सुरक्षित किए गए। अभियोजन पक्ष ने विचारण न्यायालय के समक्ष चिकित्सीय एवं प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्यों को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, रोहिणी न्यायालय दिल्ली ने अपने निर्णय में कहा, अभियोजन पक्ष मौखिक, दस्तावेजी, चिकित्सीय एवं फोरेंसिक साक्ष्यों के माध्यम से अभियुक्त का अपराध सिद्ध करने में सफल रहा। कोर्ट ने साक्ष्यों की श्रृंखला को पूर्ण एवं विश्वसनीय माना। इसके बाद अभियुक्त को भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 65 (2), धारा 140 (4) तथा पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 5 (एम) सहपठित धारा 6 के अंतर्गत दोषसिद्ध किया गया।
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7 वर्ष से अधिक की सजा वाले अपराध में फोरेंसिक जांच
बीएनएस की धारा 176 (3) के अंतर्गत सात वर्ष से अधिक दंडनीय अपराधों में अनिवार्य तौर पर फोरेंसिक निरीक्षण किया गया। अपराध टीम एवं फोटोग्राफरों द्वारा घटनास्थल का दस्तावेजीकरण किया गया। भौतिक साक्ष्य सुरक्षित किए गए। शिकायतकर्ता एवं प्रत्यक्षदर्शियों के बयान बीएनएस की धारा 183 के तहत दर्ज किए गए। पीड़िता से संबंधित सेक्सुअल असॉल्ट किट, जैविक नमूने तथा अभियुक्त के रक्त नमूने वैज्ञानिक परीक्षण के लिए भेजे गए। पूरी जांच प्रक्रिया दस दिन में पूरी की गई। सात जुलाई को आरोप पत्र दाखिल किया गया।
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30 जुलाई को आरोप निर्धारित
न्यायालय ने 30 जुलाई को आरोप निर्धारित किए। बहस के दौरान अभियोजन पक्ष ने शिकायतकर्ता, चिकित्सकों, न्यायिक मजिस्ट्रेट, अपराध टीम अधिकारियों तथा विवेचना अधिकारी सहित विभिन्न गवाहों का परीक्षण कराया। इसके जरिए मेडिकल साक्ष्य, गवाही, जब्ती मेमो एवं दस्तावेजी साक्ष्यों ने एक पूर्ण एवं सुसंगत साक्ष्य श्रृंखला स्थापित की। अभियुक्त, बहस के दौरान अपने बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। यह प्रकरण, बाल पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए न्याय संहिता के सफल क्रियान्वयन का एक सशक्त उदाहरण है। समयबद्ध विवेचना, वैधानिक समय सीमा का पालन, वैज्ञानिक साक्ष्यों की फोरेंसिक जांच, त्वरित चिकित्सीय परीक्षण तथा प्रभावी अभियोजन रणनीति ने दोषसिद्धि सुनिश्चित की। यह मामला दर्शाता है कि आधुनिक आपराधिक न्याय प्रक्रियाओं के समन्वित एवं प्रभावी क्रियान्वयन से न्याय प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सकता है।