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Somnath: 'सोमनाथ का जीर्णोद्धार नहीं चाहते थे नेहरू', भाजपा का आरोप- यह तुष्टिकरण की राजनीति नहीं तो और क्या?

Thu, 08 Jan 2026 04:53 AM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Thu, 08 Jan 2026 04:53 AM IST
सार

जब सोमनाथ मंदिर के विध्वंस और पुनर्निर्माण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। ऐसे मौके पर भाजपा ने कांग्रेस निशाना साधा। भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने पंडित नेहरू पर आरोप लगाया कि वे सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं चाहते थे। 

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bjp sudhanshu tripathi allaged Nehru did not want the restoration Somnath temple called appeasement politics
सोमनाथ मंदिर और पंडित नेहरू - फोटो : पीटीआई

विस्तार

सोमनाथ मंदिर अब जब अपने विध्वंस से लेकर पुरुत्थान तक अटूट आस्था के 1000 वर्षों का उत्सव मना रहा है। इस बीच भाजपा ने मंदिर के पुनर्निर्माण को बाधित करने की कथित कोशिशों को लेकर कहा कि पं. नेहरू इसका जीर्णोद्धार नहीं चाहते थे। इसके बजाय उन्होंने तुष्टीकरण की नीतियों को प्राथमिकता दी। यही नहीं, उन्होंने आस्था से जुड़े इस मामले में पाकिस्तान को खुश करना ज्यादा बेहतर समझा। उन्होंने दूतावासों को पत्र लिखकर सहायता से भी मना किया था।
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'तुष्टिकरण को प्राथमिकता दी'
भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने बुधवार को एक के बाद एक तीन सोशल मीडिया पोस्ट कर आरोप लगाया कि अतीत में तो सोमनाथ को मोहम्मद गजनवी और खिलजी ने लूटा लेकिन आजाद भारत में भगवान सोमनाथ से सबसे अधिक नफरत पंडित नेहरू को थी। उन्होंने विभिन्न दस्तावेज और पत्रों का हवाला देते हुए लिखा कि पंडित नेहरू की सबसे बड़ी बानगी यह है कि 21 अप्रैल, 1951 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को प्रिय नवाबजादा संबोधित करते हुए पत्र लिखा। इसमें उन्होंने सोमनाथ के दरवाजों की कहानी को पूरी तरह झूठ बताया। नेहरू ने लियाकत अली खान के आगे एक तरह से हथियार डालते हुए लिखा कि सोमनाथ मंदिर के निर्माण जैसा कुछ नहीं हो रहा। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर नेहरू को लियाकत अली से ऐसा क्या डर था जो सोमनाथ मंदिर के बारे में पत्र लिख रहे थे। पाकिस्तान के दुष्प्रचार से निपटने या भारत की सभ्यतागत स्मृति का बचाव करने के बजाय नेहरू ने पाकिस्तान को खुश करना चुना और तुष्टीकरण को प्राथमिकता दी। 
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भाजपा सांसद का आरोप- मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं चाहते थे पंडित नेहरू
भाजपा सांसद ने लिखा, 'यह अंधी तुष्टीकरण की राजनीति और मुगल आक्रांताओं का महिमामंडन नहीं था तो और क्या था?' उन्होंने लिखा, पंडित नेहरू चाहते ही नहीं थे कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार हो। भाजपा नेता ने आगे लिखा, ये तो सब जानते हैं कि पंडित नेहरू ने न केवल कैबिनेट मंत्रियों बल्कि राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन तक को पत्र लिखकर मंदिर के पुनर्निर्माण की जरूरत पर सवाल उठाया था और उन्हें उद्घाटन समारोह में शामिल होने से रोका था। लेकिन ये भी सच है कि नेहरू ने सभी भारतीय मुख्यमंत्रियों को दो-दो बार पत्र लिखकर सोमनाथ मंदिर के निर्माण पर शिकायत करते हुए लिखा कि इससे विदेशों में भारत की छवि खराब हुई है। उन्होंने भारत के तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री आरआर दिवाकर को पत्र लिखकर अभिषेक समारोह की कवरेज कम करने को कहा था। उन्होंने समारोह को दिखावटी बताया और लिखा कि वह राष्ट्रपति के समारोह में शामिल होने से खुश नहीं हैं।
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ट्रस्ट को सहायता देने के भी खिलाफ थे
सुधांशु त्रिवेदी ने दस्तावेज का हवाला देते हुए लिखा, पं. नेहरू ने भारतीय दूतावासों को पत्र लिखकर सोमनाथ ट्रस्ट को किसी तरह की सहायता देने से साफ मना किया, जिसमें अभिषेक समारोह के लिए नदी से पानी का अनुरोध भी शामिल था। चीन में भारत के राजदूत केएम पनिक्कर को लिखे पत्र में नेहरू ने माना कि उन्होंने राष्ट्रपति के सोमनाथ मंदिर दौरे का असर कम करने की कोशिश की थी। भाजपा नेता ने लिखा कि ये बताता है कि उन्होंने निष्पक्ष रहने के बजाय मंदिर के उद्घाटन की अहमियत जानबूझकर घटाने की कोशिश की थी। पाकिस्तान में भारतीय राजदूत को लिखे पत्र में नेहरू ने अभिषेक के लिए सिंधु नदी के पानी के इस्तेमाल को औपचारिक रूप से नामंजूर कर दिया।

भाजपा का आरोप- हिंदू धार्मिक अनुष्ठान नहीं आए पसंद
भाजपा नेता के मुताबिक, सेक्रेटरी-जनरल और विदेश सचिव को लिखे गए पत्रों में नेहरू ने कहा कि दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट से पवित्र नदी के जल के लिए आने वाले अनुरोधों पर बिल्कुल ध्यान न देने का निर्देश दिया जाए, जो हिंदू धार्मिक गतिविधियों के प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों से भी उनकी स्पष्ट बेचैनी को दर्शाता है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने पहले ही राष्ट्रपति और केएम. मुंशी दोनों को अपनी नाराजगी बता दी थी। उनका कहना था कि उन्हें यह बात ज्यादा पसंद आएगी कि राष्ट्रपति उद्घाटन समारोह में हिस्सा न लें। यह दिखाता है कि वे राष्ट्राध्यक्ष को एक बड़े हिंदू सभ्यतागत कार्यक्रम से दूर रखने की सक्रिय कोशिश कर रहे थे, जिसे वह राजनीतिक रूप से असुविधाजनक मानते थे।

कांग्रेस पर साधा निशाना
सुधांशु त्रिवेदी ने सोशल मीडिया पोस्ट के बाद प्रेस कांफ्रेंस की, जिसमें उन्होंने कहा कि नेहरू सिर्फ एक नेता नहीं थे बल्कि एक विचार के प्रतीक थे। आज इस बात को जानने की जरूरत है कि वह विचार भारत के लिए कितना खौफनाक था। कांग्रेस पर निशाना साधते हुए त्रिवेदी ने कहा, मुस्लिम लीगियों के लिए अजीज मिजाज और हिंदुओं के मान पर गिरती गाज है जो मानसिकता उस समय थी, वही आज भी दिखाई दे रही है। त्रिवेदी ने कहा कि खुद कांग्रेस सरकार की तरफ से आधिकारिक तौर पर प्रकाशित कराई गई एलएस बख्शी की किताब में सरकार कह रही है कि महाराजा रणजीत सिंह ने काबुल जीतने के बाद संधि में शर्त रखी थी कि गजनवी के लूटे सोमनाथ मंदिर के दरवाजे भारत को लौटाए जाएं। उन्होंने कहा कि सवाल यह खड़ा होता है कि लियाकत अली की मिजाजपुर्सी में लगे सच बोल रहे थे या भारत सरकार के मंत्रालय की तरफ से प्रकाशित बात सत्य है।


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कांग्रेस ने कहा-नेहरू ने गांधी-पटेल की नीति का पालन किया था
कांग्रेस ने पंडित जवाहरलाल नेहरू पर सोमनाथ मंदिर मुद्दे पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाने के लिए भाजपा की आलोचना की और कहा कि सत्तारूढ़ पार्टी नेहरू के पत्रों में से चुनिंदा बातें निकालकर झूठ और आधी-अधूरी सच्चाई का सहारा ले रही है। कांग्रेस नेता पीयूष बबेले ने कहा कि जब भाजपा तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के दोबारा बने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में शामिल होने का मुद्दा उठा रही है तो उसे यह भी बताना चाहिए कि अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास के समय तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और इसके उद्घाटन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को क्या इसलिए नहीं आमंत्रित किया गया कि कि वे दलित और आदिवासी समुदाय से आते हैं? उन्होंने कहा कि पंडित नेहरू ने महात्मा गांधी और सरदार पटेल की सहमति से तय उस नीति का पालन किया था कि धर्मस्थल के निर्माण में सरकारी पैसे का उपयोग नहीं होना चाहिए।

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