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BJP Gujarat Gaurav Yatra: आदिवासी वोटर क्यों हैं भाजपा से नाराज? 'कमजोर' कांग्रेस इस मोर्चे पर पड़ रही भारी

Thu, 13 Oct 2022 01:21 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Thu, 13 Oct 2022 01:21 PM IST
सार

BJP Gujarat Gaurav Yatra: गुजरात में आदिवासियों की आबादी लगभग 15 फीसदी है। यह आबादी सबसे ज्यादा दक्षिण गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। दक्षिण गुजरात के छोटे शहरी इलाकों में इनकी आबादी लगभग आधी तो बड़े शहरी क्षेत्रों में दो फीसदी के करीब है। विधानसभा की 182 सीटों में से 27 सीटें इनके लिए आरक्षित हैं...

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BJP Gujarat Gaurav Yatra: BJP want to woo adivasi voters, started a Yatra from 12 October
BJP Gujarat Gaurav Yatra - फोटो : Agency

विस्तार

भाजपा ने 12 अक्तूबर से गुजरात गौरव यात्रा (BJP Gujrat Gaurav Yatra) की शुरुआत कर दी है। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने हरी झंडी दिखाकार इस यात्रा को रवाना किया। आदिवासी समुदाय के मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने के लिए भाजपा की यह तीसरी आदिवासी गौरव यात्रा है। इसके पहले 2002 और 2017 में भी पार्टी इसी तरह की यात्राएं निकाल चुकी है। केंद्र सरकार के कार्यों और द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाने को आदिवासी समुदाय के गौरव से जोड़ते हुए भाजपा उनका समर्थन पाने की कोशिश कर रही है। मुर्मू को राष्ट्रपति बनाने से इस समुदाय में सकारात्मक संदेश गया है। भाजपा को इसका कुछ लाभ मिलना भी तय है, लेकिन इसके बावजूद स्थानीय मजबूत आदिवासी नेतृत्व न होने के कारण भाजपा इस समुदाय में गहराई से पैठ नहीं बना पा रही है।

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जबकि कमजोर चुनावी तैयारी का आरोप झेल रही कांग्रेस इस मोर्चे पर भाजपा को कड़ी टक्कर दे रही है। उसके पास अनंत पटेल के रूप में आदिवासी समुदाय का बेहद लोकप्रिय चेहरा है। वे आदिवासी मतदाताओं को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। हाल ही में उन पर हुए घातक हमले ने आदिवासी समुदाय की भावनाएं उद्वेलित करने का काम किया है। इससे आदिवासी युवा कांग्रेस की ओर लामबंद हो सकते हैं। यदि कांग्रेस यह विक्टिम कार्ड सफलता से खेलने में सफल रही तो भाजपा को इसका नुकसान हो सकता है। इस सियासी नुकसान को भांपते हुए ही भाजपा ने इसे एक 'सियासी ड्रामा' करार देते हुए इसका कोई असर न होने की बात कह रही है।

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कांग्रेस की पारंपरिक पकड़

गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री अमर सिंह चौधरी आदिवासी समुदाय से आते थे। उनके होने से कांग्रेस को आदिवासी मतदाताओं पर मजबूत पकड़ मानी जाती थी। शुरुआती दौर में उनके पुत्र तुषार चौधरी ने भी स्वयं को प्रमुख आदिवासी नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। कांग्रेस ने भी उन्हें यूपीए सरकार में मंत्री बनाकर उनका कद बढ़ाने का भी काम किया, लेकिन इसके बाद भी वे अपने पिता की विरासत को संभाल नहीं सके। गुजरात विधानसभा चुनाव हारने से उनका राजनीतिक कद और ज्यादा छोटा हो गया। हालांकि, वे एक हिस्से पर अब भी अपना असर बरकरार रखे हुए हैं।     

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चर्चा थी कि अमित शाह अनंत पटेल को भाजपा में लाकर स्थानीय आदिवासी चेहरे की कमी को पूरी करना चाहते थे, लेकिन बात न बनने से अनंत पटेल का भाजपा में आने का रास्ता नहीं खुल सका। भाजपा अब केंद्रीय चेहरों के जरिये इस कमी को पाटने की कोशिश कर रही है। उसके पास गणपति बसावा जैसे आदिवासी चेहरे अवश्य हैं, जिन्हें तुषार चौधरी को हराने के ईनाम के तौर पर विधानसभा का अध्यक्ष (पूर्व) बनाकर उनका कद बढ़ाने की कोशिश की गई थी, लेकिन भाजपा के लिए वे बहुत ज्यादा उपयोगी साबित नहीं हो सके। आदिवासी मतदाताओं के समर्थन के लिए भाजपा का अब पूरा भरोसा केंद्रीय आदिवासी नेतृत्व और शीर्ष नेताओं पर टिका हुआ है। बुधवार को जेपी नड्डा के बाद गुरुवार को अमित शाह गुजरात परिवर्तन यात्राओं को आगे बढ़ाकर आदिवासी मतदाताओं का दिल जीतने की कोशिश करेंगे।   

आदिवासियों की हिस्सेदारी

गुजरात में आदिवासियों की आबादी लगभग 15 फीसदी है। यह आबादी सबसे ज्यादा दक्षिण गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। दक्षिण गुजरात के छोटे शहरी इलाकों में इनकी आबादी लगभग आधी तो बड़े शहरी क्षेत्रों में दो फीसदी के करीब है। विधानसभा की 182 सीटों में से 27 सीटें इनके लिए आरक्षित हैं। इन सीटों के अलावा अन्य सीटों पर भी आदिवासी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में निवास करते हैं। सुरक्षित सीटों के आलावा भी ये लगभग 50 सीटों पर किसी पार्टी के उम्मीदवार की हार-जीत में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इन विधानसभा सीटों पर इनकी आबादी 10 फीसदी से ज्यादा है।  

भाजपा ने अपनी गौरव यात्राओं की शुरुआत पांच ऐसे इलाकों से की है जहां आदिवासी आबादी भारी संख्या में निवास करती है। लेकिन इन यात्राओं की शुरुआत भी स्थानीय प्रमुख मंदिरों और धार्मिक स्थलों से की गई है। इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है। 1992 के राममंदिर आंदोलन में आदिवासी समुदाय के युवाओं ने बड़ी भागीदारी निभाई थी। इसके बाद 1995 में हुए चुनाव में भाजपा को 15 आदिवासी सीटों पर सफलता मिली थी। भाजपा उसी प्रदर्शन को दोबारा दोहराने की रणनीति बना रही है। दक्षिण गुजरात आदिवासियों का सबसे बड़ा क्षेत्र माना जाता है। आदिवासियों के लिए सुरक्षित 26 सीटों में से 17 सीटें इसी इलाके से आती हैं।

इस इलाके में किसकी पैठ

आदिवासी मतदाताओं पर पारंपरिक रूप से कांग्रेस का वर्चस्व रहा करता था, लेकिन 1990 में यह जनता दल के पास चला गया। मंडल-कमंडल की राजनीती के दौर की शुरुआत के बाद भाजपा ने इन मतदाताओं में तेजी से अपनी पैठ बनाई और 1995 में अच्छी सफलता दर्ज की। हालांकि, वर्तमान स्थिति में इन मतदाताओं में भाजपा और कांग्रेस दोनों की ही लगभग बराबर पकड बनी हुई है। गुजरात अस्मिता के नाम पर मोदी के उभार ने भाजपा की पैठ मजबूत करने का काम किया है। पिछले चुनाव में यह बढ़त 50 फीसदी से ज्यादा वोटों तक पहुंच गयी थी।  

अरविंद केजरीवाल की आंदोलनकारी समय में निभाई गई भूमिका ने उनकी आदिवासियों में बेहतर पकड़ बनाने में मदद की है। उन्होंने आदिवासी समुदाय के नेताओं को अपने साथ जोड़कर भाजपा-कांग्रेस दोनों के ही कान खड़े कर दिए हैं। यदि वे अपना जनाधार बढ़ाने में कामयाब रहे तो दोनों ही शीर्ष दलों को इसका नुकसान हो सकता है। हालांकि, वोटों के बंटवारे में सीटें किसकी कम-ज्यादा होंगी, यह अभी कहना मुश्किल है।

क्या हैं मुद्दे?

भाजपा आदिवासियों के बीच द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाने, आदिवासी नेताओं को केंद्रीय इकाई में जगह देने और केंद्र सरकार द्वारा उन्हें उपलब्ध कराई गयी राशन योजना, आवास योजना और पीएम किसान सहायता योजना का बखान कर रही है, तो कांग्रेस आदिवासियों को वन क्षेत्र पर कोई निर्णय करने से पहले आदिवासियों की अनुमति लेने के मुद्दे उछाल रही है। इस कानून को खत्म करने के लिए वह केंद्र सरकार को जोरदार तरीके से जिम्मेदार ठहरा रही है। वहीं, अरविंद केजरीवाल इन इलाकों में आदिवासियों के बच्चों के लिए बेहतर स्कूल-स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का सपना दिखा रहे हैं, जिससे आज़ादी के 75 सालों बाद भी वे वंचित रहे हैं। अब आदिवासियों की प्राथमिकता किस मुद्दे के साथ रहने वाली है, यह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा।

क्या है यात्रा का प्लान?

गुजरात भाजपा नेता यजुवेंद्र दुबे ने अमर उजाला को बताया कि 11 दिन चलने वाली इन यात्राओं के दौरान भाजपा 120 बड़ी जनसभाएं और 358 स्वागत सभाएं आयोजित करेगी, जिनमें आदिवासी समुदाय के प्रभावशाली लोगों को सम्मानित करने का काम किया जायेगा। इस दौरान भाजपा के आदिवासी समुदाय के मंत्री, सांसद, विधायक और पार्टी संगठन के नेता लोगों को केंद्र सरकार के द्वारा आदिवासी समुदाय के लोगों के लिए किये गए कार्यों की जानकारी देंगे। द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाने को आदिवासी समुदाय का गौरव बताने की कोशिश होगी। विशेषकर आदिवासी महिलाओं को इसके जरिये पार्टी से जोड़ने की कोशिश की जायेगी।



यजुवेंद्र दुबे का दावा है कि केंद्र सरकार के सराहनीय कार्यों के कारण इस समुदाय में भाजपा के लिए आकर्षण बढ़ा है। केंद्र सरकार ने आदिवासियों का जीवन स्तर उठाने का काम किया है। यही कारण है कि इस बार भाजपा सभी सुरक्षित सीटों के साथ अन्य आदिवासी बहुल सीटों पर जीत दर्ज करेगी।

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