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Gulab Chand Kataria: गुलाब चंद को राज्यपाल बना भाजपा ने दिया बड़ा संकेत, वसुंधरा युग से आगे बढ़ रही है पार्टी
Sun, 12 Feb 2023 02:40 PM IST
शक्तिराज सिंह
अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली
Published by: शक्तिराज सिंह
Updated Sun, 12 Feb 2023 02:40 PM IST
सार
राजस्थान का नेतृत्व करने की इच्छा पाले वसुंधरा राजे सिंधिया लगातार राज्य की सक्रिय राजनीति में बनी रहीं और अशोक गहलोत सरकार पर जमकर हमले करती रहीं।
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गुलाब चंद कटारिया (बाएं) और वसुंधरा राजे (दाएं)
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाब चंद कटारिया (Gulab Chand Kataria) को असम का राज्यपाल बनाने की घोषणा कर दी गई है। राजस्थान में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले अपने एक कद्दावर नेता को सक्रिय राजनीति से हटाकर भाजपा ने यह संकेत दे दिया है कि वह राज्य में नए नेतृत्व को उभारने की कोशिश करेगी। चूंकि, गुलाब चंद कटारिया को वसुंधरा राजे सिंधिया गुट के बड़े नेता के तौर पर देखा जाता है, इस घोषणा को वसुंधरा गुट के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है जो अभी भी राज्य में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं।
दरअसल, वसुंधरा राजे सिंधिया की भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से तालमेल कमजोर होने को लेकर राजनीतिक गलियारों में हमेशा चर्चा होती रही। कहा गया कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राजस्थान में वसुंधरा युग से आगे बढ़कर नया नेतृत्व विकसित करने पर ध्यान देना चाहता है। इसी को ध्यान में रखते हुए एक तरफ सतीश पूनिया, राज्यवर्धन सिंह राठौर और गजेंद्र सिंह शेखावत जैसे नए नेताओं को मजबूत बनाने की कोशिश की गई, वहीं दूसरी ओर वसुंधरा राजे सिंधिया को पार्टी की केंद्रीय इकाई में उपाध्यक्ष बनाकर उन्हें राज्य की राजनीति से अलग कर केंद्र में लाने की कोशिश की गई।
लेकिन इसके बाद भी राजस्थान का नेतृत्व करने की इच्छा पाले वसुंधरा राजे सिंधिया लगातार राज्य की सक्रिय राजनीति में बनी रहीं और अशोक गहलोत सरकार पर जमकर हमले करती रहीं। लेकिन इसके बाद भी पार्टी नेतृत्व लगातार उसी दिशा में आगे बढ़ रहा हैे जिस तरह का इशारा उसने काफी पहले कर दिया था।
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दरअसल, वसुंधरा राजे सिंधिया की भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से तालमेल कमजोर होने को लेकर राजनीतिक गलियारों में हमेशा चर्चा होती रही। कहा गया कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राजस्थान में वसुंधरा युग से आगे बढ़कर नया नेतृत्व विकसित करने पर ध्यान देना चाहता है। इसी को ध्यान में रखते हुए एक तरफ सतीश पूनिया, राज्यवर्धन सिंह राठौर और गजेंद्र सिंह शेखावत जैसे नए नेताओं को मजबूत बनाने की कोशिश की गई, वहीं दूसरी ओर वसुंधरा राजे सिंधिया को पार्टी की केंद्रीय इकाई में उपाध्यक्ष बनाकर उन्हें राज्य की राजनीति से अलग कर केंद्र में लाने की कोशिश की गई।
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लेकिन इसके बाद भी राजस्थान का नेतृत्व करने की इच्छा पाले वसुंधरा राजे सिंधिया लगातार राज्य की सक्रिय राजनीति में बनी रहीं और अशोक गहलोत सरकार पर जमकर हमले करती रहीं। लेकिन इसके बाद भी पार्टी नेतृत्व लगातार उसी दिशा में आगे बढ़ रहा हैे जिस तरह का इशारा उसने काफी पहले कर दिया था।
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नए नेतृत्व की चर्चा क्यों
कुछ समय पहले राज्य के भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया ने भी खुलेआम यह कह दिया था कि वे 70 वर्ष से अधिक के नेताओं के स्वैच्छिक राजनीतिक संन्यास को बेहतर समझते हैं। उनके इस बयान को सीधे वसुंधरा राजे सिंधिया पर हमला माना गया था जिनके प्रतिद्वंदी नेताओं के रूप में पूनिया को देखा जाता है। हालांकि, बाद में पूनिया ने इसे अपनी व्यक्तिगत राय बताकर मामला शांत करने की कोशिश की थी, इसके बावजूद इस बयान से राजस्थान का राजनीतिक माहौल गर्म हो गया था।
स्वयं प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया को पिछड़ी जाति के बड़े नेता के तौर पर देखा जाता है, माना जा रहा है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें आगे बढ़ाते हुए उन्हीं के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव में उतर सकता है। गुलाब चंद कटारिया को असम का राज्यपाल बनाने के बाद राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद रिक्त हो जाएगा। इस पद पर भी किसी युवा नेता को स्थान दिया जा सकता है। चूंकि, अब सदन का कार्यकाल कुछ महीने ही शेष रह गया हैे, पार्टी सदन के उपनेता राजेंद्र राठौर के नेतृत्व में ही सदन का कामकाज चला सकती है।
कुछ समय पहले राज्य के भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया ने भी खुलेआम यह कह दिया था कि वे 70 वर्ष से अधिक के नेताओं के स्वैच्छिक राजनीतिक संन्यास को बेहतर समझते हैं। उनके इस बयान को सीधे वसुंधरा राजे सिंधिया पर हमला माना गया था जिनके प्रतिद्वंदी नेताओं के रूप में पूनिया को देखा जाता है। हालांकि, बाद में पूनिया ने इसे अपनी व्यक्तिगत राय बताकर मामला शांत करने की कोशिश की थी, इसके बावजूद इस बयान से राजस्थान का राजनीतिक माहौल गर्म हो गया था।
स्वयं प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया को पिछड़ी जाति के बड़े नेता के तौर पर देखा जाता है, माना जा रहा है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें आगे बढ़ाते हुए उन्हीं के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव में उतर सकता है। गुलाब चंद कटारिया को असम का राज्यपाल बनाने के बाद राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद रिक्त हो जाएगा। इस पद पर भी किसी युवा नेता को स्थान दिया जा सकता है। चूंकि, अब सदन का कार्यकाल कुछ महीने ही शेष रह गया हैे, पार्टी सदन के उपनेता राजेंद्र राठौर के नेतृत्व में ही सदन का कामकाज चला सकती है।
नुकसान की आशंका कितनी सही
इस बात की अटकलें लगाई जा रही हैं कि यदि भाजपा राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया को साइड लाइन करने की कोशिश करती है तो उसे इसका नुकसान हो सकता है। लेकिन भाजपा नेताओं का मानना है कि उनकी पार्टी की राजनीति हमेशा मजबूत वैचारिक आधार और काडर के बल पर आगे बढ़ी है। पार्टी की वरिष्ठ नेता होने के कारण वसुंधरा पार्टी नेतृत्व के हर निर्णय के साथ खड़ी होंगी।
एक अलग प्रश्न का उत्तर देते हुए भाजपा नेता ने कहा कि पार्टी से बगावत कर अलग राजनीति करने का निर्णय कल्याण सिंह, उमा भारती, येदियुरप्पा और केशुभाई पटेल जैसे किसी भी नेता के लिए फलदायी नहीं साबित हुआ है। यही कारण है कि भाजपा का कोई नेता पार्टी से बगावत करने का निर्णय़ नहीं लेता है।
नए नेतृत्व की ओर देख रही पार्टी
राजस्थान से जुड़े भाजपा के एक शीर्ष नेता ने अमर उजाला को बताया कि अभी राज्य को लेकर इस तरह का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया गया है, लेकिन एक बात सही है कि पार्टी नेतृत्व हर स्तर पर नए नेताओं को अवसर दे रहा है। केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल से लेकर भाजपा शासित विभिन्न राज्यों के मंत्रिमंडल में भी युवा नेताओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी ने 70 वर्ष से अधिक नेताओं के चुनाव न लड़ने की स्वैच्छिक घोषणा करवा दिया था। नए नेताओं को अवसर देने की पार्टी की इस रणनीति का असर हुआ कि वह गुजरात में ऐतिहासिक बहुमत हासिल करने में कामयाब रही। अब उसी तरह की रणनीति राजस्थान में भी अपनाई जा रही है।
इस बात की अटकलें लगाई जा रही हैं कि यदि भाजपा राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया को साइड लाइन करने की कोशिश करती है तो उसे इसका नुकसान हो सकता है। लेकिन भाजपा नेताओं का मानना है कि उनकी पार्टी की राजनीति हमेशा मजबूत वैचारिक आधार और काडर के बल पर आगे बढ़ी है। पार्टी की वरिष्ठ नेता होने के कारण वसुंधरा पार्टी नेतृत्व के हर निर्णय के साथ खड़ी होंगी।
एक अलग प्रश्न का उत्तर देते हुए भाजपा नेता ने कहा कि पार्टी से बगावत कर अलग राजनीति करने का निर्णय कल्याण सिंह, उमा भारती, येदियुरप्पा और केशुभाई पटेल जैसे किसी भी नेता के लिए फलदायी नहीं साबित हुआ है। यही कारण है कि भाजपा का कोई नेता पार्टी से बगावत करने का निर्णय़ नहीं लेता है।
नए नेतृत्व की ओर देख रही पार्टी
राजस्थान से जुड़े भाजपा के एक शीर्ष नेता ने अमर उजाला को बताया कि अभी राज्य को लेकर इस तरह का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया गया है, लेकिन एक बात सही है कि पार्टी नेतृत्व हर स्तर पर नए नेताओं को अवसर दे रहा है। केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल से लेकर भाजपा शासित विभिन्न राज्यों के मंत्रिमंडल में भी युवा नेताओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी ने 70 वर्ष से अधिक नेताओं के चुनाव न लड़ने की स्वैच्छिक घोषणा करवा दिया था। नए नेताओं को अवसर देने की पार्टी की इस रणनीति का असर हुआ कि वह गुजरात में ऐतिहासिक बहुमत हासिल करने में कामयाब रही। अब उसी तरह की रणनीति राजस्थान में भी अपनाई जा रही है।