जेडीयू और रालोद की बढ़ती दोस्ती पर बीजेपी ने लगायी सेंध
- जेडीयू के बजाय भाजपा का साथ ज्यादा मुफीद मान रहा संगठन
- भाजपा का एक खेमा गठबंधन की पैरोकारी में तो दूसरा विलय की पैरवी में
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
मिशन 2017 फतह के लिए जेडीयू के साथ जा रहे रालोद के कदम भाजपा के रुख से ठिठक गए हैं। दोनों तरफ से गठबंधन के लिए कवायद शुरू हो चुकी है। सब कुछ ठीक रहा तो जल्द ही रालोद-भाजपा का गठबंधन सियासी धरातल पर दस्तक देगा। हालांकि भाजपा का एक खेमा जहां गठबंधन की जोरदार पैरवी में लगा है तो एक खेमा विलय चाहता है।
वहीं, रालोद के कुछ नेता भी भाजपा की बजाय जेडीयू के साथ जाने की वकालत कर रहे हैं। गैर भाजपाई दलों को एक करके राष्ट्रीय राजनीति में ताल ठोकने की कोशिश में जुटे बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की रालोद सुप्रीमो चौधरी अजित सिंह से नई पार्टी बनाने के लिए बात चल रही थी। कई दौर की बात होने पर नई पार्टी में नीतिश कुमार को राष्ट्रीय अध्यक्ष व चौधरी अजित सिंह को संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया जाना तय हो चुका था। लेकिन सियासी धरातल पर उतर रहे इस गठजोड़ के बीच भाजपा ने सेंध लगा दी है।
राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक पश्चिमी यूपी राजनीतिक लाभ लेने के लिए भाजपा के करीब आधा दर्जन विधायकों ने पार्टी हाईकमान से मिलकर रालोद को साथ लाने की पैरोकारी की थी। इस पर हाईकमान ने रालोद के पार्टी में विलय करने का प्रस्ताव रखा, जिसे रालोद ने सिरे से खारिज करते हुए सिर्फ गठबंधन पर विचार करने को कहा है। रालोद का एक खेमा जहां पश्चिमी यूपी में सियासी लाभ लेने के लिए भाजपा के साथ जाने की वकालत कर रहा है तो वहीं दूसरा खेमा जनता परिवार के साथ जाकर राष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप करने की बात कह रहा है।
मिल सकती है राज्यसभा सीट और कोठी
भाजपा से गठबंधन होने की स्थिति में रालोद को राज्यसभा सीट और 12 तुगलक रोड कोठी मिलने के कयास लगाए जा रहे हैं। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक गठबंधन के चलते हिस्से में आने वाली विधानसभा सीटों की संख्या के अलावा भी कुछ मुद्दों पर सियासी गुणा-भाग लगाया जा रहा है।
जेडीयू के साथ न जाकर राजनीतिक फायदे के नफे-नुकसान के गणित के बाद ही रालोद भाजपा के साथ गठबंधन की राह पर आगे बढ़ रहा है। पश्चिमी यूपी की करीब चार दर्जन से ज्यादा सीटों पर रालोद का असर है।
रालोद के परंपरागत वोटर सीट जिताने और हराने की संख्या रखता है। दोनों दलों के एक साथ आने से पश्चिम यूपी में इसका बड़ा सियासी फायदा मिलेगा। रालोद-भाजपा गठबंधन से सबसे बड़ा नुकसान बसपा और कांग्रेस को दिख रहा है। गठबंधन की खबर से पश्चिम की राजनीति में हलचल दिखाई दे रही है। बसपा के साथ कांग्रेस खेमे में बेचैनी महसूस की जा रही है।