BDY SPCL : भ्रष्टाचार, महंगाई और जेपी की संपूर्ण क्रांति
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समाज, जन कल्याण, देशहित जिनके लिए सबसे ऊपर था। जो जीवन भर समाज के अंतिम आदमी की लड़ाई लड़ते रहे। जिनकी एक आवाज पर लोग मर मिटने को तैयार हुए। अपने चहेते नेता को जनता ने 'लोकनायक' की उपाधि से नवाजा।
जीवन भर जनता की आवाज उठाते रहे जयप्रकाश नारायण की शख्सियत ऐसी रही कि जो भी उनसे मिला उनका मुरीद हो गया। उनका आभामंडल के संपर्क में आते ही लोगों में देशप्रेम की लहर सी उठ जाती। उनके सानिध्य में लोग सरकार की दमनकारी नीतियों और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने लगते।
जेपी की जनसभाओं में उमड़ते जनसैलाब को देख इंदिरा का सत्ता जाने का डर सताने लगा और उन्होंने देश में आपातकाल लगाकर जेपी समेत सैकड़ों नेताओं को जेल में डाल दिया। जेपी तब देश में भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे। इंदिरा सरकार की तरफ से तर्क यह दिया गया कि विदेशी फंड पर जेपी आंदोलन चलाकर देश में शांति भंग कर रहे थे।
मां उन्हें प्यार से 'बऊल जी' कहकर बुलाती थीं
जेपी स्वतंत्रता संग्राम में तो शामिल थे ही, साल 1977 देश में देश की जनता के लिए संघर्ष करते रहे। उनका समाजवाद का नारा आज भी हर तरफ गूंज रहा है। आज उनकी जन्मतिथि है, इसलिए जननायक की जीवन पर हम प्रकाश डाल रहे हैं। जेपी के व्यक्तित्व से बहुत कुछ ऐसा सीखा जा सकता है, जिससे कोई भी देश ही नहीं खुद भी मजबूत हो सकता है, एक सार्थक जीवन बिता सकता है।
जेपी का जन्म बिहार के सिताबदियारा में 11 अक्टूबर 1902 में हुआ। पिता का नाम देवकी बाबू और माता का नाम फूलरानी देवी था। जेपी चार साल के हो गए थे और उनके दांत नहीं निकले थे। इस वजह से उनकी मां उन्हें प्यार से 'बऊल जी' कहकर बुलाती थीं।
तब किसी ने नहीं सोचा था कि वो बालक आगे चलकर ऐसा निकलेगा जिसकी एक आवाज पर पूरा हिंदुस्तान उड़ पड़ेगा। वहीं हुआ भी, जेपी ने जब बोलना शुरू किया तो उनकी आवाज में एक पकड़ थी, एक ओज था।
जेपी अठारह वर्ष के हुए तो उनका विवाह हो गया। 1920 में बिहार के गांधीवादी बृज किशोर प्रसाद की पुत्री प्रभावती के साथ जेपी की शादी हुई। कहा जाता है कि शादी के बाद प्रभावती, कस्तूरबा गांधी के साथ गांधी आश्रम में रहीं।
मार्क्सवादी दर्शन से थे प्रभावित
जेपी ने रॉलेट एक्ट जलियांवाला बाग नरसंहार के विरोध में अंग्रेजों के चलाए जा रहे स्कूलों को छोड़ दिया और बिहार विद्यापीठ से उच्च शिक्षा पूरी की। बिहार विद्यापीठ को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और सुप्रसिद्ध गांधीवादी डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा ने इसी मकसद से स्थापित किया था कि प्रतिभाशाली युवा वहां शिक्षा प्राप्त कर प्रेरित हो सकें।
जेपी ने समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर किया और फिर अमेरिकी विश्वविद्यालय में 8 वर्षों तक अध्ययन करते रहे। वहां जेपी ने मार्क्सवादी दर्शन पड़ा, जिसने उन पर गहरा प्रभाव भी छोड़ा।
कांग्रेस में शामिल हुए और कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन किया
स्वतंत्रता आंदोलन में जेपी ने जो काम किया उसका कोई हिसाब नहीं लगा सकता। जानकार कहते है कि वह विलक्षण प्रतिभा के धनी थे।
वह भारत लौटे और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। उन्होंने आजादी की लड़ाई में कूदने का फैसला पटना में मौलाना अबुल कलाम आजाद की एक बात सुनकर किया था। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कहा था ''नौजवानों अंग्रेजी शिक्षा का त्याग करो और मैदान में आकर ब्रिटिश हुकूमत की ढहती दीवारों को धराशाही करो और ऐसे हिन्दुस्तान का निर्माण करो जो सारे आलम में खुशबू पैदा करे।'' इस बात ने जेपी के जहन में गहरी छाप छोड़ी और वह स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।
जिस कांग्रेस की जेपी के आंदोलनों के डर से चूल्हें हिल गई थीं, एक वक्त जेपी उसी का हिस्सा रहे। साल 1929 में वह कांग्रेस में शामिल हुए थे। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन होने पर जेपी को उसमें शामिल कर लिया गया और उन्हें पार्टी का महासचिव बना दिया गया। जेपी ने उपने जीवन में कई दफा जेल गए और लाठियां खाते रहे।
वे महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थे। गांधी जी के 'करो या मरो' के नारे को उन्होंने हमेशा याद रखा। सन 1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन जेपी की लड़ाई अभी बाकी थी।
जब इंदिरा ने लगाया देश में आपातकाल
19 अप्रैल 1954 में बिहार के गया में जेपी ने विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन के लिए जीवन समर्पित करने का ऐलान किया। 1957 में जनता के हितों के लिए उन्होंने राजनीति को छोड़ने का फैसला कर लिया। लेकिन 60 के दशक के आखिरी दिनों में वह सक्रिय राजनीति का फिर से हिस्सा बने।
इस बार राजनीतिक में उनकी दमदार वापसी हुई। देश में फैले भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ उन्होंने सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद की। 5 जून 1975 की विशाल जनसभा में जेपी ने पहली बार ‘सम्पूर्ण क्रांति’ की बात की।
उस दिन जनसभा में जेपी ने कहा था ''भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं। क्योंकि वह इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वह तभी पूरी हो सकती हैं जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रांति यानी सम्पूर्ण क्रांति आवश्यक है।''
तब देश इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। इंदिरा गांधी की सरकार पर भ्रष्टाचार और अलोकतांत्रिक होने के आरोप लग रहे थे। 1975 में निचली अदालत में इंदिरा पर चुनावों में किए भ्रष्टाचार का आरोप साबित हो गया, इस पर जेपी ने उनके इस्तीफे की मांग की। उनका साफ कहना था कि इंदिरा सरकार कुर्सी छोड़नी ही होगी। कुर्सी का खतरा देख इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी और जेपी और उनके समर्थकों को जेल में डाल दिया।
''सिंहासन खाली करो कि जनता आती है''
जेपी की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली के रामलीला मैदान में एक लाख से ज्यादा लोगों विरोध प्रदर्शन किया। तब हर तरफ जेपी के चाहने वालों का ही हुजूम दिखाई देता था और उन्ही की आवाज सुनाई देती थी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने जेपी के प्रति जनता के इस प्यार को देखते हुए यहां तक कहा था ''सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।''
जनवरी 1977 को आपातकाल हटा। जेपी के आंदोलन ने अपना काम कर दिया था। देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। जेपी की शुरू की गई संपूर्ण क्रांति का प्रभाव न सिर्फ देश में, बल्कि दुनिया के कई छोटे देशों पर पड़ा।
1977 में हुआ चुनाव ऐतिहासिक था। तब 8 अक्टूबर 1988 में जेपी ने पटना में आखिरी सांस ली। 1998 में भारत सरकार ने जेपी को मरणोपरांत को देश के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजा। जेपी आज भी कहीं न कहीं जनता के दिलों में राज करते हैं।