Bihar Politics: टूट-टूटकर क्या भाजपा को मजबूत होने का मौका दे रहे हैं सोशलिस्ट मुख्यमंत्री नीतीश कुमार?
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
राजनीति में दलों का टूटना और बिखरना मायने रखता है। उपेंद्र कुशवाहा के नई पार्टी बना लेने के बाद जद(यू) में घमासान फिलहाल रुक गया है, लेकिन आगे क्या होगा, कहना मुश्किल है। इस घमासान पर जद(यू) के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने बड़ी सधी बात कही। अमर उजाला से विशेष बातचीत में केसी त्यागी ने कहा कि हम राम मनोहर लोहिया वाले सोशलिस्ट हैं। हम सुधरेंगे नहीं और टूटना हमारे भाग्य में हैं। हमारा टूटना और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का निकम्मा होना, भाजपा को मजबूत होने का मौका देता रहेगा। यही देश का दुर्भाग्य भी है।
राजनीतिक समझ के स्तर पर खुद को बहुत परिपक्व बना चुके केसी त्यागी ने बस चंद लाइनों में ही राजनीति की पूरी पटकथा लिख दी। इसमें कहीं तंज है तो कहीं व्यंग्य। तो नीति और नीयत पर सवाल भी है। दिलचस्प यह भी है कि जब नीतीश कुमार का चौथी बार साथ छोडक़र उपेंद्र कुशवाहा चले गए हैं, तो जद(यू) के अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह कुशवाहा द्वारा खड़े किए गए तमाम गंभीर सवालों का जवाब दे रहे हैं। इस जवाब और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अंदाज से साफ लग रहा है कि रणनीतिकारों ने कुशवाहा के पार्टी छोड़ने का अंदाजा पहले ही लगा लिया था। इसलिए कुशवाहा एकतरफा आक्रामक थे और जद(यू) अपनी राह पर। अब कुशवाहा की नई पार्टी राष्ट्रीय लोक जनता दल बिहार में अपनी राजनीतिक जड़ें मजबूत करेगी।
नीतीश कुमार का क्या बिगाड़ पाएंगे उपेंद्र कुशवाहा?
उपेंद्र कुशवाहा ने नया राजनीतिक दल बना लिया है। उनके मीडिया सलाहकार का कहना है कि बिहार में तो दो ही रास्ते हैं। एक महागठबंधन के साथ का है और दूसरा एनडीए का। इसलिए देर सबेर एनडीए का फिर घटक दल बनेंगे। कुशवाहा के करीबी कहते हैं कि बिहार में कुशवाहा के छिटकने के बाद नीतीश कुमार के पास क्या बचेगा, यह कहने की जरूरत नहीं है? जवाब में केसी त्यागी सवाल पूछते हुए कहते हैं कि कोई पहली बार कुशवाहा छोड़कर गए हैं? सवाल राजनीतिक और जनता के बीच में भरोसे का भी है। केसी त्यागी कहते हैं कि पिछला चुनाव वह ओवैसी की पार्टी के साथ लड़े थे। इसके पहले राष्ट्रीय लोकदल के साथ लड़े थे। क्या वह कहीं एक जगह ठहरने वाले हैं। आशय यह कि उपेंद्र कुशवाहा के अलग होने और नई पार्टी बना लेने के बाद नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जद (यू) की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। राजद के संस्थापकों में गिने जाने वाले एक बड़े नेता का कहना है कि अभी वह कुशवाहा को लेकर कुछ नहीं कहना चाहते। वह कभी एनडीए के साथ थे। केंद्र सरकार में मंत्री थे और अवसर देखकर छोड़कर बाहर आ गए थे। वह कुछ पाने के लिए राजनीतिक दलों के साथ जुड़ते हैं और कुछ न मिलने पर साथ छोड़ देते हैं। अब ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व के बारे में क्या कहें?
एक-एककर अपने छोड़ते गए नीतीश कुमार का साथ?
कभी राजनीतिक गुरु की तरह रहे शरद यादव को नीतीश कुमार का विरोध करना पड़ा था। नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव में नब्बे के दशक में बड़ा गहरा राजनीतिक रिश्ता था। लेकिन एक दिन नीतीश कुमार को लालू प्रसाद यादव से अलग होने में कोई खासा संकोच नहीं हुआ था। केसी त्यागी जब राम मनोहर लोहिया वाला समाजवादी कहते हैं, तो उनका इशारा देश में जनता दल परिवार के बिखरने की तरफ भी था। नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा की जोड़ी कभी लव-कुश की जोड़ी कही जाती थी। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा तीन बार नीतीश कुमार का साथ छोड़ चुके हैं। कभी जद (यू) में नंबर दो की हैसियत रखने वाले राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह बीच में साइडलाइन हो गए थे। आजकल फिर पुरानी जगह पर हैं। इससे पहले कभी पवन वर्मा के इशारे पर जद(यू) में पत्ता हिलता था। कभी दौर प्रशांत किशोर का भी था और कभी आरसीपी सिंह का रुख देखे बगैर जद(यू) में हवा भी नहीं बहती। यह नीतीश कुमार की खासियत है कि वह 2005 से बिहार की राजनीति और सत्ता की धुरी बने हैं। कभी वह एनडीए के साथ रहते हैं तो कभी राजद के। कुल मिलाकर सत्ता उनके हाथ में रहती है।
कुशवाहा के अलग होने के बाद भाजपा इतना खुश क्यों हो रही है?
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह 25 फरवरी को बिहार में रहेंगे। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा भी जा रहे हैं। उम्मीद की जा रही है कि गृहमंत्री तब बहुत सधी प्रतिक्रिया देंगे। अभी वह बिहार के मुद्दे पर चुप हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने बिहार में नए राज्यपाल को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से फोन पर बात की थी। इतने भर से वहां राजनीतिक हलचल बढ़ गई थी। अंदरखाने में भाजपा नीतीश कुमार का साथ छोड़ने पर बहुत खुश है। बिहार की राजनीति को गहराई से समझने वाले अनुग्रह चौधरी का कहना है कि भाजपा की निगाह चिड़िया की एक आंख पर टिकी है। नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव ने जिस जातिगत जनगणना का कार्ड को खेला है, भाजपा के रणनीतिकार उसी की काट पर काम कर रहे हैं। मुकेश साहनी, चिराग पासवान, आरसीपी सिंह, उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी का नीतीश कुमार से अलगाव बिहार में सामाजिक बिखराव को बढ़ाएगा। यह बिखराव भाजपा के लिए एक अवसर बनने की संभावना है।