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बिहार विधानसभा चुनाव: जहां है मैदान में जदयू वहां लोजपा के उम्मीदवार ठोक रहे हैं ताल

Sun, 11 Oct 2020 07:37 PM IST
गौरव पाण्डेय शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Sun, 11 Oct 2020 07:37 PM IST
सार

  • भाजपा के प्रचारकों को भरोसा, पार्टी नंबर वन रहेगी
  • राष्ट्रीय जनता दल बन सकती है दूसरी बड़ी पार्टी
  • कहीं तीसरे नंबर पर न आ जाएं नीतीश कुमार
  • लोजपा, वीआईपी, हम, रालोसपा बनेगी सत्ता की सीढ़ी

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Bihar Election: LJP can change the game by contesting against JDU, Election analysis
नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी और चिराग पासवान - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

उत्तर प्रदेश से बिहार में प्रचार करने के लिए पहुंचे संघ और भाजपा से जुड़े सैकड़ों कार्यकर्ताओं की बांछे खिली हुई हैं। उन्हें लग रहा है कि इस बार समय, राजनीतिक घटना क्रम और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का मूव तीनों अभीष्ट संयोग बना रहा है। 121 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा ने 11 सीटें सहयोगी वीआईपी को दे दी हैं, लेकिन 110 सीटों पर भी वह परचम फहराकर बिहार की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन सकती है। उसे सत्ता की इस सीढ़ी तक ले आने में लोजपा (लोक जनशक्ति पार्टी) सबसे बड़ी मददगार होने वाली है।

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जहां-जहां जद(यू) के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं, वहां-वहां लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार ताल ठोंक रहे हैं। अकेले पहले चरण में आधा दर्जन से अधिक लोजपा के उम्मीदवार भाजपा के बागी नेता ही हैं। प्रयागराज से सासाराम, मधुबनी और पटना में चुनाव प्रचार कर रहे सूत्र का कहना है कि करीब-करीब पूरे बिहार में कार्यकर्ताओं में संदेश जा चुका है कि लोजपा भाजपा की सहयोगी दल है। बिहार में एनडीए से अलग है। सूत्र का कहना है कि ऐसे में लोजपा के उम्मीदवारों को भाजपा के मतदाता भी वोट कर सकते हैं। 
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जद(यू) के नेता भी इस तरह के राजनीतिक डेवलपमेंट से काफी हैरान हैं। जद(यू) के सामने एक धर्म संकट भी खड़ा हो गया है। लोजपा सुप्रीमो राम विलास पासवान की चिता की आग अभी ठंडी हुई है। इसलिए पार्टी सहयोगी दल भाजपा पर कोई बड़ा दबाव भी नहीं बना पा रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि लोजपा 2020 के विधानसभा चुनाव में जद(यू) का बड़ा राजनीतिक नुकसान कर सकती है। जद(यू) का कुछ हद तक नुकसान उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा भी कर सकती है। वहीं लोजपा, रालोसपा, हम, वीआईपी, जद(यू) के राजनीतिक अभियानों से भाजपा को फायदा छोड़कर नुकसान होने की कोई गुंजाइश नहीं है।

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नीतीश कुमार के खिलाफ चल रही है बिहार में हवा

बिहार में नीतीश कुमार सरकार के खिलाफ सरकार विरोधी लहर है। भाजपा, संघ और लोजपा के कार्यकर्ता भी इसे स्वीकार कर रहे हैं। रालोसपा में उपेंद्र कुशवाहा के लेफ्टिनेंट का भी मानना है कि जद(यू) को तगड़ा झटका लग सकता है। लोगों में बाढ़, कोविड-19, मजदूरों के पलायन, प्रदेश सरकार के कामकाज समेत तमाम मामलों को लेकर काफी नाराजगी है। हम से चुनाव लड़ चुके सूत्र का कहना है कि लोजपा के नेता तो मौसम विज्ञानी माने जाते रहे हैं। उन्हें इसका आभास था। चिराग भी नीतीश कुमार सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी को समझ रहे हैं। इसलिए ही उन्होंने अलग चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। कुल मिलाकर इसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा को और इसके बाद राजद को हो सकता है। इस बार हम (मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) के नेता जी फिर चुनाव मैदान में हैं।

नीतीश को नहीं छोड़ेगी भाजपा, लेकिन चुनाव बाद बदल सकती है फिजा

भाजपा कार्यकर्ताओं को विश्वास है कि चुनाव में पार्टी अभूतपूर्व प्रदर्शन करने जा रही है। उसकी सीटें जद(यू) से दो गुनी हो सकती है। 2015 में राष्ट्रीय जनता दल को सबसे अधिक सीटें मिली थी। तब जद(यू) और कांग्रेस के साथ राजद चुनाव लड़ी थी। इस बार जद(यू) भाजपा के साथ है तो भाजपा ही सबसे बड़ी पार्टी बनने की ओर है। भाजपा के रणनीतिकार दूसरे नंबर पर राजद को स्थान दे रहे हैं। उन्हें तीसरे नंबर पर जद(यू) नजर आ रही है। रणनीतिकारों का अनुमान है कि इस चुनाव में लोजपा की सीटें पहले की तुलना में अच्छी आ सकती हैं। लोजपा, वीआईपी, रालोपा भाजपा के लिए सत्ता की सीढ़ी भी बन सकती है। 

हालांकि पार्टी के नेताओं का कहना है कि भाजपा नीतीश कुमार को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगी। क्योंकि प्रधानमंत्री के सामने खड़े होने वाले देश के राजनीतिक नेताओं में नीतीश कुमार का चेहरा ही सबसे प्रभावी है। भाजपा के अंदरखाने में दो चर्चाएं हैं। पहली तो यह कि भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया है, लेकिन चुनाव बाद की स्थितियां इस घोषणा को प्रभावित कर सकती हैं। दूसरी चर्चा यह है कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री न बन पाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने की पहल कर सकता है।

अनिश्चितताओं का उत्सव है लोकतंत्र में चुनाव

लोकतंत्र में चुनाव अनिश्चितताओं का उत्सव है। उत्सव के अंतिम परिणाम का केवल कयास लगाया जा सकता है। इसे हर पार्टी के कार्यकर्ता अपने हिसाब से आकलन करके लगाते और सपने देखते हैं। बीते चुनाव गवाह हैं कि कई बार ये सपने धरे के धरे रह जाते हैं। यह सही है कि बिहार में नीतीश कुमार के सरकार की चाहे जितनी आलोचना हो, लेकिन बिहार के आज भी वह नेता नंबर वन हैं। उनकी छवि की टक्कर का अब न तो विपक्ष के पास नेता है और न ही भाजपा के पास भी कोई चेहरा। भूलना नहीं चाहिए 2015 में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी सुशासन बाबू के चेहरे के आगे सफलता हासिल नहीं कर सका था।

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