Seat ka Samikaran: यहां 11 बार जीता तस्लीमुद्दीन परिवार, 2020 में भाइयों की लड़ाई वाली सीट का ऐसा है इतिहास
‘सीट का समीकरण’ सीरीज की ग्यारहवीं कड़ी में आज हम आपको जोकीहाट विधानसभा सीट के बारे में बताएंगे। इस सीट पर सबसे बड़ा चेहरा तस्लीमुद्दीन थे। यह सीट उनका गढ़ रही थी। 2020 में उनके बेटे शाहनवाज ने यहां से चुनाव जीता था।
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विस्तार
बिहार में साल के अंत में चुनाव होने हैं। सभी पार्टियां चुनाव की तैयारियों में जुट चुकी हैं। इस चुनावी साल में अमर उजाला अलग-अलग सीरीज के जरिए बिहार की सियासत के बारे में बता रहा है। इसी से जुड़ी ‘सीट का समीकरण’ सीरीज की 11वीं कड़ी में आज जोकीहाट विधानसभा सीट की बात। 2020 में यहां से एआईएमआईएम के शाहनवाज आलम जीते थे। बाद में शाहनवाज आलम समेत एआईएमआईएम के चार विधायक राजद में शामिल हो गए।
अररिया जिले की सीट है जोकीहाट
बिहार के 38 जिलों में से एक अररिया जिला भी है। यह जिला 2 अनुमंडल और 09 ब्लाक में बंटा हुआ है। अररिया जिले में कुल 06 विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें नरपतगंज, रानीगंज (एससी), फारबिसगंज, अररिया, जोकीहाट, सिकटी विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। आज बात जोकीहाट विधानसभा सीट की करेंगे। जोकीहाट विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र अररिया लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। इस सीट पर सबसे पहले चुनाव 1967 में हुआ था। जोकीहाट सीमांचल की एक मुस्लिम बहुल सीट है।
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सबसे पहले चुनाव में जीते नजामुद्दीन
जोकीहाट सीट पर सबसे पहले चुनाव 1967 में चुनाव हुए थे। इस चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को जीत मिली। प्रसपा के नजामुद्दीन ने निर्दलीय उम्मीदवार डब्ल्यू रहमान को 2,344 वोट से हरा दिया था।

लगातार तीन बार जोकीहाट से जीते तस्लीमुद्दीन
1969 में बिहार में मध्याविधि चुनाव हुए। इस चुनाव में तस्लीमुद्दीन पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए जोकीहाट सीट पर उतरे। कांग्रेस के टिकट पर उतरे तस्लीमुद्दीन ने जीत दर्ज की। तस्लीमुद्दीन ने भारतीय जन संघ के सत्य नारायण यादव को 8,582 वोट से हरा दिया था। आगे चलकर यह जोकीहाट सीट और तस्लीमुद्दीन एक दूसरे का पर्याय बन गए। संसद की वेबसाइट के मुताबिक पूर्व लोकसभा सांसद तस्लीमुद्दीन का जन्म 4 जनवरी 1943 को अररिया जिले के सिसौना में हुआ था। महज छह साल की उम्र में एक फरवरी 1949 को अख्तरी बेगम से उनका निकाह हुआ। 16 साल की उम्र में उन्होंने अपनी सियासी पारी शुरू की। जब पहली बार 1959 में ग्राम पंचायत, सिसौना से सरपंच बने। इसके बाद 1964 में सिसौना ग्राम पंचायत के मुखिया बने। यहां से उनके शुरुआत हुई वहां से होते हुए वह विधानसभा और लोकसभा भी पहुंचे।
1972 में तस्लीमुद्दीन को कांग्रेस का टीकट नहीं मिला। इस बार उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत दर्ज की। इस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस ने जहीउद्दीन को 23,708 वोट से हरा दिया। 1977 में बिहार के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर फिर से तस्लीमुद्दीन ने ही जीत दर्ज की थी। इस बार तस्लीमुद्दीन ने जनता पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज की। जनता पार्टी के तस्लीमुद्दीन ने कांग्रेस के मोइदुर रहमान को 3,170 वोट से हरा दिया।
1980: मोइदुर रहमान को मिली जीत
1980 के विधानसभा चुनाव में तस्लीमुद्दीन ने जोकीहाट सीट से चुनाव नहीं लड़ा। कांग्रेस (आई) के मोइदुर रहमान जो पिछले चुनाव में तस्लीमुद्दीन से हार गए थे वह इस बार चुनाव जीतने में सफल रहे। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार जहोरुद्दीन को 1,365 वोट से हरा दिया।

1985: फिर एक बार जीते तस्लीमुद्दीन
1985 में एक बार फिर से यहां से तस्लीमुद्दीन ने चुनाव लड़ा और जीता। यह जीत उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर दर्ज की। तस्लीमुद्दीन ने 1980 में जीतने वाले कांग्रेस के मोइदुर रहमान को 15,763 वोट से हरा दिया।
1990: मोइदुर रहमान को जीत
1990 में तस्लीमुद्दीन ने इस सीट से चुनाव नहीं लड़ा। उनकी जगह जनता दल ने उनके बेटे सरफराज आलम को टिकट दिया। सरफराज को पिता की शाख का फायदा नहीं मिला और वो तीसरे नंबर पर रहे। कांग्रेस के मोइदुर रहमान को यहां से जीत हासिल की। उन्होंने निर्दलीय भूप नारायण यादव को 894 वोट से हरा दिया था।
1995: एक बार फिर जीते तस्लीमुद्दीन
1995 में फिर से तस्लीमुद्दीन ने जोकीहाट सीट से चुनाव लड़ा। इस बार उन्होंने जनता दल के टिकट पर नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा। एसपी के तस्लीमुद्दीन ने निर्दलीय भूप नारायण यादव को 13,466 वोट से हरा दिया। वहीं, कांग्रेस के मोइदुर रहमान तीसरे नंबर पर रहे थे।

1996: तस्लीमुद्दीन के बेटे को मिली उपचुनाव में जीत
1996 में तस्लीमुद्दीन लोकसभा का चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। तस्लीमुद्दीन के लोकसभा जाने के बाद से जोकीहाट विधानसभा सीट खाली हो गई। इसके बाद इस सीट पर उपचुनाव कराए गए। 1996 में कराए गए उपचुनाव में तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम को जीत मिली। उपचुनाव में सरफराज आलम ने जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़कर समाजवादी पार्टी के मंजर आलम को 12,630 वोट से हरा दिया।
साल 2000 में भी इस सीट से सरफराज आलम को ही जीत मिली। इस बार सरफराज आलम ने राजद के टिकट पर चुनाव लड़ा था। उन्होंने जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर उतरे मंजर आलम को 18,499 वोट से हरा दिया।
राजद छोड़ फिर जदयू में आए सरफराज
2005 में बिहार में दो बार चुनाव कराए गए। फरवरी 2005 में हुए चुनावों में एक बार फिर सरफराज और मंजर आलम आमने सामने थे। राजद के टिकट पर चुनाव लड़ रहे सरफराज आलम को इस बार हार का सामना करना पड़ा। पिछली बार जदयू के टिकट पर हारे मंजर आलम ने इस बार जीत दर्ज की। मंजर आलम ने सरफराज आलम को 24,584 वोट से हरा दिया। अक्तूबर 2005 में भी जदयू के मंजर आलम जीतने में सफल रहे। मंजर आलम ने राजद के सरफराज आलम को 2,526 वोट से हरा दिया।
2010 में सरफराज आलम पार्टी बदलकर राजद से जदयू में आ गए। जदयू के टिकट पर उतरे सरफराज आलम ने एक बार फिर से जीत दर्ज की। लगातार दो बार हार का सामना करने के बाद इस बार सरफराज को जीत मिली। सरफराज ने निर्दलीय उम्मीदवार कोशर ज़िया को 25330 वोट से हरा दिया।
2015 में मौजूदा विधायक सरफराज आलम एक बार फिर जदयू के टिकट पर चुनाव जीते। सरफराज आलम ने निर्दलीय उम्मीदवार रंजीत यादव को 53,980 वोट से काफी बड़ी हार दी।
2018 में हुए उपचुनाव में जीते शाहनवाज
2018 में तस्लीमुद्दीन का मृत्यु के बाद अररिया लोकसभा सीट खाली होने पर उपचुनाव कराया गया। इस उपचुनाव में सरफराद आलम ने राजद के टिकट पर जीत हासिल की। इसके बाद जोकीहाट सीट खाली हो गई। 2018 में जोकीहाट सीट पर उपचुनाव हुए जिसमें सरफराज आलम के भाई शाहनवाज आलम ने राजद के टिकट पर जीत दर्ज की। इसके बाद 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में सरफराज आलम को भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह ने हरा दिया। इसके बाद उन्होंने 2020 में अपने भाई के खिलाफ जोकीहाट सीट पर विधानसभा चुनाव लड़ा।
2020: दो भाई आमने सामने
2020 में जोकीहाट सीट पर तस्लीमुद्दीन के दो बेटे शाहनवाज और सरफराज आलम आमने-सामने चुनाव लड़ रहे थे। राजद से तस्लीमुद्दीन के मंझले पुत्र सरफराज अहमद और एआईएमआईएम के टिकट पर तस्लीमुद्दीन के छोटे बेटे शाहनवाज आलम चुनाव मैदान में थे। इस चुनाव में एआईएमआईएम के शाहनवाज को जीत मिली।