भूपेंद्र पटेल की ताजपोशी क्यों: गुजरात की आबादी में 12-14% पाटीदार, फिर भी एक-चौथाई सीटों पर जबरदस्त प्रभाव
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विस्तार
गुजरात के मुख्यमंत्री पद से विजय रूपाणी को हटाने का फैसला कई राजनीतिक धड़ों के लिए बड़ा सवाल लेकर आया था। वो भी ऐसे समय में जब गुजरात विधानसभा चुनाव को महज एक साल का समय ही रह गया है। इस बीच रविवार को भाजपा ने एक पाटीदार नेता भूपेंद्र पटेल को राज्य का मुख्यमंत्री घोषित कर सभी अटकलों को विराम दे दिया। भाजपा के इस कदम से काफी हद तक साफ हो गया कि पार्टी अब 2017 में की गई अपनी गलती को दोहराना नहीं चाहती और लंबे समय से नाराज चल रहे पाटीदार समुदाय को अपनी ओर वापस लाने में जुटी है।
एक दिन पहले ही मिल गए थे संकेत?
गौरतलब है कि एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के अहमदाबाद में पाटीदार समुदाय के लिए बनाई गई सरदारधाम बिल्डिंग का वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उद्घाटन किया था। विश्व पाटीदार समाज की ओर से 200 करोड़ में बनाई गई इस इमारत को पीएम ने सरदार पटेल को समर्पित किया। बताया जाता है कि अहमदाबाद की यह बिल्डिंग मुख्य तौर पर पाटीदार समुदाय के लिए ही है, जहां उनके व्यापार, सामाजिक और शिक्षा के केंद्र बनाए गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि मोदी ने इस इमारत का उद्घाटन ठीक उस समय पर कर रहे थे, जब गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने राजभवन पहुंचकर अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंपा था।
उस दौरान यह स्पष्ट नहीं था कि आखिर क्यों प्रधानमंत्री अपने गृह राज्य के सीएम के इस्तीफे के बावजूद सरदारधाम के उद्घाटन समारोह को लाइव संबोधित करते रहे। हालांकि, रविवार को जब मुख्यमंत्री पद के लिए भूपेंद्र पटेल के गुजरात के नए सीएम बनाए जाने की घोषणा हुई, तो यह साफ हो गया कि भाजपा के लिए इस वक्त प्राथमिकता पर पाटीदार समुदाय है, जो कि 2022 के गुजरात चुनाव में भाजपा के लिए अहम भूमिका निभा सकता है।
कौन है पाटीदार समुदाय, क्या है गुजरात में प्रभाव?
भाजपा के पारंपरिक वोटर हैं पाटीदार, पर 2017 के चुनाव में रूठे
वैसे तो पाटीदार पारंपरिक तौर पर भाजपा के ही वोटर रहे हैं, लेकिन 2015-16 में इस समुदाय ने आरक्षण की मांग के साथ प्रदर्शन शुरू कर दिए थे। तब इन प्रदर्शनों को रोकने और पाटीदार समुदाय को मनाने में असफल रहने के चलते भाजपा ने गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को सीएम पद से हटा दिया था और उनकी जगह विजय रूपाणी को सीएम पद सौंप दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि पहले से नाराज पाटीदार समुदाय और ज्यादा नाराज हो गया। इस नाराजगी का असर 2017 के विधानसभा चुनाव में भी दिखा, जहां भाजपा का वोट शेयर 2012 के 60 फीसदी के मुकाबले करीब 11 फीसदी गिरकर 49.1 फीसदी पर ही रह गया।
2017 में भाजपा को 182 सीटों वाली गुजरात विधानसभा में महज 99 सीटें मिलीं, जबकि 2012 में उसके खाते में 115 सीटें थीं। उधर कांग्रेस का वोट शेयर 2014 के लोकसभा चुनाव के 33 फीसदी के मुकाबले 2017 में 41.4 फीसदी पर पहुंच गया। सीटों के मामले में भी कांग्रेस को जबरदस्त फायदा हुआ और पार्टी ने 1990 के बाद अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देते हुए 77 सीटें हासिल की थीं।
पाटीदार बहुल सौराष्ट्र-उत्तर गुजरात में भाजपा को हुआ था नुकसान
- 2017 के चुनाव में पाटीदारों की नाराजगी का असर इसी बात से पता चलता है कि उनके प्रभाव वाले सौराष्ट्र में भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था। जहां 2012 में भाजपा ने सौराष्ट्र की 56 सीटों में से 30 सीटों पर कब्जा जमाया था, वहीं कांग्रेस को महज 15 सीटें मिली थीं, जबकि बाकी अन्य के खाते में गई थीं। लेकिन 2017 में भाजपा को इस क्षेत्र से 19 सीटें ही हासिल हुईं। वहीं, कांग्रेस ने बाजी मारते हुए यहां से 28 सीटें हासिल कीं। यानी पिछले प्रदर्शन से 13 ज्यादा।
- वहीं, पाटीदार समुदाय बहुल उत्तरी गुजरात में भी भाजपा को नुकसान हुआ और पार्टी को 2012 की 32 के मुकाबले 2017 में 29 सीटों पर ही जीत मिली थी। उधर कांग्रेस की सीटों की संख्या 21 से बढ़कर 24 पहुंच गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहनगर (जो कि उंझा जिले का हिस्सा है) में भी कांग्रेस की ओर से खड़ी आशा पटेल ने भाजपा के पांच बार के विधायक नारायण पटेल को 19 हजार वोटों से हरा दिया था।