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भीमा-कोरेगांव मामला : 'सर्वोच्च न्यायालय ने की कार्यकर्ताओं की स्वतंत्रता व गरिमा की रक्षा'
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 28 Sep 2018 10:26 PM IST
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भीमा-कोरेगांव मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद इतिहासकार रोमिला थापर ने कहा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा की है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भीमा-कोरेगांव मामले की सुनवाई करते हुए पांचों कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर एसआईटी जांच की मांग को ठुकरा दिया था।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पांचों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं प्रो. रोमिला थापर, प्रो. देवकी जैन, प्रो. प्रभात पटनायक, प्रो. सतीश देशपांडे और माया दारूवाला ने शुक्रवार को प्रेस कांफ्रेंस की। मुख्य याचिकाकर्ता रोमिला थापर ने कहा कि उनका उद्देश्य न्यायपालिका का ध्यान अपनी तरफ खींच कर यह जताना था कि राज्य सरकार गैर कानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए का दुरुपयोग कर रही है।
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इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पांचों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं प्रो. रोमिला थापर, प्रो. देवकी जैन, प्रो. प्रभात पटनायक, प्रो. सतीश देशपांडे और माया दारूवाला ने शुक्रवार को प्रेस कांफ्रेंस की। मुख्य याचिकाकर्ता रोमिला थापर ने कहा कि उनका उद्देश्य न्यायपालिका का ध्यान अपनी तरफ खींच कर यह जताना था कि राज्य सरकार गैर कानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए का दुरुपयोग कर रही है।
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देश में दो तरह का आतंकवाद
थापर ने चिंता जताते हुए कहा कि देश में ‘दो प्रकार का आतंकवाद’ है, पहले वे आतंकी जो बम लगाते हैं, दंगे फैला कर लोगों को हिंसक बनाते हैं, और जानबूझकर डर फैलाने के लिए प्रेरित करते हैं। जबकि दूसरे प्रकार के आतंकी, राजकीय संस्थाएं और अधिकारी हैं, जो गैरकानूनी और अन्यायपूर्ण कार्यों के जरिए अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर बेगुनाहों को परेशान करते हैं। थापर का कहना है कि 28 अगस्त को जिस तरह से गिरफ्तारियां हुई हैं, वह चिंताजनक है। यूएपीए कानून के तहत पुलिस कभी भी बिना वारंट किसी के भी घर में घुस सकती है और गिरफ्तार कर सकती है। इस मामले में सभी याचिकाकर्ताओं ने जस्टिस चंद्रचूड़ की तारीफ भी की है।