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क्या है महाराष्ट्र को झकझोर देने वाला भीमा-कोरेगांव हिंसा कांड

Wed, 29 Aug 2018 02:38 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Updated Wed, 29 Aug 2018 02:38 AM IST
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Bhima Koregaon violence case in Maharashtra, what is Bhima Koregaon violence case
भीमा-कोरेगांव हिंसा
पुणे के नजदीक एक जनवरी को भीमा-कोरेगांव युद्ध के 200 साल पूरा होने के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान दो समूहों के बीच संघर्ष में एक युवक की मौत हो गई थी और चार लोग घायल हुए थे। इस हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो जाने के बाद इसकी आंच महाराष्ट्र के 18 जिलों तक फैल गई। 
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भीमा-कोरेगांव में लड़ाई की 200वीं सालगिरह को शौर्य दिवस के रूप में मनाया गया। दलित समुदाय के पांच लाख से ज्यादा लोग शौर्य दिवस मनाने के लिए एकत्र हुए थे। भीम कोरेगांव के विजय स्तंभ पर मुख्य कार्यक्रम शांतिपूर्वक चल रहा था, हालांकि पड़ोस के गांवों में हिंसा भड़क गई। 
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इस दौरान कुछ लोगों ने भीमा-कोरेगांव विजय स्तंभ की तरफ जाने वाले लोगों की गाड़ियों पर हमला बोल दिया। इसके बाद हिंसा भड़क गई जिसमें साणसवाड़ी के राहुल पटांगले की मौत हो गई। कार्यक्रम का आयोजन हर साल किया जाता था, हालांकि इस बार हिंसा भड़क गई। 
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इस हिंसा के विरोध में दलित संगठनों ने बंद बुलाया था जिसमें मुंबई, नासिक, पुणे, ठाणे, अहमदनगर, औरंगाबाद और सोलापुर सहित राज्य के एक दर्जन से अधिक शहरों में दलित संगठनों ने जमकर तोड़फोड़ और आगजनी की थी। 

महाराष्ट्र के पुणे से शुरू हुई जातीय हिंसा मुंबई और कई अन्य शहरों तक पहुंच गई। कई जगह दुकानों और ऑफिसों को आग के हवाले कर दिया गया। हालात बिगड़ते देख खुद राज्य के मुख्यमंत्री ने मामले में न्यायिक जांच के अलावा मृतक के परिजन को 10 लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की। 

क्यों मनाया जाता है शौर्य दिवस

Bhima Koregaon violence case in Maharashtra, what is Bhima Koregaon violence case
दलित-मराठा संघर्ष - फोटो : BBC
यह सारा विवाद अंग्रेजों और पेशवाओं के बीच हुए युद्ध के 200 साल पूरे होने को लेकर हुआ। जिसमें एक जनवरी 1818 में अंग्रेजों ने दलितों की सहायता से पेशवा द्वितीय को शिकस्त दे दी थी। पुणे के कोरेगांव के विजय स्तंभ पर हर साल यह उत्सव मनाया जाता है। 

एक जनवरी सन 1818 में कोरेगांव में भीमा नदी के तट पर पेशवाओं और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ था। जिसमें अंग्रेजों की छोटी सी टुकड़ी ने 28000 सैनिकों वाले पेशवाओं को शिकस्त दे दी थी।

खास बात ये है कि यह देश का इकलौता युद्ध है जिसमें अंगेजों की जीत का जश्न मनाया जाता है और उसकी वजह है अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाले महार सैनिक। कहा जाता है कि अंग्रेजों की सेना में उस समय ज्यादातर दलित ही थे जिन्होंने पेशवाओं को मात दे दी और इसी का हर साल स्थानीय दलित जश्न मनाते हैं।

दलितों के अनुसार मात्र 800 महारों ने पेशवाओं की शक्तिशाली सेना को मात्र 12 घंटे में परास्त कर दिया था। उस समय अंग्रेजों की टुकड़ी का नेतृत्व फ्रांसिस स्टौण्टन ने किया था जबकि पेशवाओं की ओर से ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होल्कर, बड़ौदा के गायकवाड़ और नागपुर के भोसले एक साथ मिलकर लड़ रहे थे।

उस समय पेशवाओं की कुल सेना 28000 के करीब थी जिसमें 20 हजार घुड़सवार और 8 हजार पैदल सैनिक थे। लेकिन इनमें से 2800 सैनिकों ने ही अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया और मात खा बैठे। एक अनुमान के अनुसार इस युद्ध में पेशवा के 500-600 सैनिक मारे गए और बाकी भाग खड़े हुए।

कहा जाता है कि पेशवाओं के अत्याचारों से तंग आकर ही दलितों ने अंग्रेजी सेना का दामन थामा था और युद्ध में पेशवाओं के छक्के छुड़ा दिए। इस जीत के उपलक्ष्य में ही हर साल कोरेगांव में शौर्य दिवस का जश्न मनाया जाता है। इस युद्ध को देश में सदियों तक होते रहे दलितों के दमन के प्रतिशोध के रूप में भी देखा जाता है, जो पेशवाओं ने लंबे समय तक उन पर किए।
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