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'भारत के रत्न' पूर्व राष्ट्रपति प्रणव दा... सादगी पसंद, कांग्रेस के संकटमोचक
Sat, 26 Jan 2019 10:36 AM IST
sapna singla
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: sapna singla
Updated Sat, 26 Jan 2019 10:36 AM IST
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प्रणब दा
- फोटो : self
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प्रणब मुखर्जी के बारे में एक बात अक्सर कही जाती है कि वे ऐसे प्रधानमंत्री थे जो देश को ही मिले नहीं नहीं। राज्यसभा सदस्य से सियासी कैरियर शुरू करने वाले प्रणब दा राष्ट्रपति तो बने लेकिन दो बार मौका आने के बाद भी प्रधानमंत्री नहीं बन सके। पश्चिम बंगाल में वीरभूम जिले के मिराती गांव में 11 दिसंबर 1935 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कामदा मुखर्जी और राजलक्ष्मी मुखर्जी के घर जन्मे मुखर्जी को भारतीय राजनीति में उत्कृष्ट राजनेता, सादगी पसंद और कांग्रेस के संकटमोचक के तौर पर जाना जाता है।
पांच बार राज्यसभा और दो बार लोकसभा के लिए चुने गए प्रणब इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह सरकार तक महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे। राजनीति विज्ञान के शिक्षक के तौर पर कैरियर शुरू करने वाले प्रणब दा की राजनीतिक प्रतिभा को देखते हुए मात्र 34 वर्ष की उम्र में इंदिरा गांधी ने उन्हें राज्यसभा भेजा। इंदिरा सरकार में वित्त मंत्री बने। उनके निधन के बाद माना गया कि सबसे सीनियर मंत्री होने के नाते प्रणब कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनेंगे।
हालांकि प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी और इसके बाद प्रणब को पार्टी में दरकिनार किया जाने लगा। लंबे समय तक साइड लाइन रहे प्रणब ने कांग्रेस छोड़ दी। करीब तीन साल बाद उनकी पार्टी का फिर कांग्रेस में विलय हो गया। 1991 में राजीव की हत्या के बाद पीवी नरसिंहराव ने प्रणब को योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया। इसके बाद वे विदेश मंत्री बने।
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दूसरी बार भी पिछड़ गए
2004 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में यूपीए को बहुमत मिला। विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया ने प्रधानमंत्री न बनने की घोषणा की तो प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह के साथ प्रणब का भी नाम आगे आया। यहां दूसरी बार भी प्रणब पीएम की रेस में पिछड़ गए और बाजी मनमोहन के हाथ रही। जिस व्यक्ति को प्रणब ने रिजर्व बैंक का गवर्नर बनवाया था वो प्रधानमंत्री बना और प्रणब पहले रक्षामंत्री और फिर विदेश मंत्री बनाए गए। मनमोहन के दोनों कार्यकाल में, राष्ट्रपति बनने से पहले तक सारे राजनीतिक मामलों मुखर्जी ही संभालते रहेे। 2004 से 2012 के बीच प्रणब 95 से ज्यादा मंत्री-समूहों के अध्यक्ष रहे।
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पांच बार राज्यसभा और दो बार लोकसभा के लिए चुने गए प्रणब इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह सरकार तक महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे। राजनीति विज्ञान के शिक्षक के तौर पर कैरियर शुरू करने वाले प्रणब दा की राजनीतिक प्रतिभा को देखते हुए मात्र 34 वर्ष की उम्र में इंदिरा गांधी ने उन्हें राज्यसभा भेजा। इंदिरा सरकार में वित्त मंत्री बने। उनके निधन के बाद माना गया कि सबसे सीनियर मंत्री होने के नाते प्रणब कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनेंगे।
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हालांकि प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी और इसके बाद प्रणब को पार्टी में दरकिनार किया जाने लगा। लंबे समय तक साइड लाइन रहे प्रणब ने कांग्रेस छोड़ दी। करीब तीन साल बाद उनकी पार्टी का फिर कांग्रेस में विलय हो गया। 1991 में राजीव की हत्या के बाद पीवी नरसिंहराव ने प्रणब को योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया। इसके बाद वे विदेश मंत्री बने।
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दूसरी बार भी पिछड़ गए
2004 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में यूपीए को बहुमत मिला। विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया ने प्रधानमंत्री न बनने की घोषणा की तो प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह के साथ प्रणब का भी नाम आगे आया। यहां दूसरी बार भी प्रणब पीएम की रेस में पिछड़ गए और बाजी मनमोहन के हाथ रही। जिस व्यक्ति को प्रणब ने रिजर्व बैंक का गवर्नर बनवाया था वो प्रधानमंत्री बना और प्रणब पहले रक्षामंत्री और फिर विदेश मंत्री बनाए गए। मनमोहन के दोनों कार्यकाल में, राष्ट्रपति बनने से पहले तक सारे राजनीतिक मामलों मुखर्जी ही संभालते रहेे। 2004 से 2012 के बीच प्रणब 95 से ज्यादा मंत्री-समूहों के अध्यक्ष रहे।
बहन ने कहा था राष्ट्रपति बनोगे
Pranab Mukherjee
- फोटो : PTI
प्रणब दा पहली बार सांसद बने तो उनसे मिलने उनकी बहन आई थीं। चाय पीते हुए प्रणब ने कहा, वो अगले जनम में राष्ट्रपति भवन में बंधे रहने वाले घोड़े के रूप में पैदा होना चाहते हैं। इस पर उनकी बहन अन्नपूर्णा देवी ने कहा था, घोड़ा क्यों, तुम इसी जनम में राष्ट्रपति बनोगे। भविष्यवाणी सही साबित हुई और प्रणब दा 25 जुलाई 2012 को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राष्ट्रपति बने।
बेटी का विरोध फिर संघ के कार्यक्रम में गए
बीते साल जब प्रणब मुखर्जी के संघ के कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि नागपुर जाने की खबर आई तो कांग्रेस में उनके सहयोगी रहे नेताओं ही नहीं बल्कि खुद उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने भी असमति जताई। शर्मिष्ठा ने ट्वीट कर अपने पिता को वहां न जाने को कहना था। शर्मिष्ठा ने कहा था, आपकी बातें भुला दी जाएंगी बस तस्वीरें रह जाएंगी। इसके बावजूद मुखर्जी संघ के कार्यक्रम में गए और संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को देश का महान सपूत बताया।
मुखर्जी ने सहिष्णुता का पाठ पढ़ाते हुए कहा था, राष्ट्रवाद किसी धर्म या जाति से बंधा नहीं है। नफरत से देश की पहचान को संकट है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के एक श्लोक का उद्धरण देते हुए उन्होंने कहा था, प्रजा की खुशी में ही राजा की खुशी हो। लगभग जिंदगीभर कांग्रेस में रहे प्रणब हमेशा भाजपा की विचारधारा की मुखालफत करते रहे। इसके बावजूद मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके रिश्ते बेहद अच्छे हैं। एक बार मोदी ने प्रणब को पितातुल्य कहा था।
बेटी का विरोध फिर संघ के कार्यक्रम में गए
बीते साल जब प्रणब मुखर्जी के संघ के कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि नागपुर जाने की खबर आई तो कांग्रेस में उनके सहयोगी रहे नेताओं ही नहीं बल्कि खुद उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने भी असमति जताई। शर्मिष्ठा ने ट्वीट कर अपने पिता को वहां न जाने को कहना था। शर्मिष्ठा ने कहा था, आपकी बातें भुला दी जाएंगी बस तस्वीरें रह जाएंगी। इसके बावजूद मुखर्जी संघ के कार्यक्रम में गए और संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को देश का महान सपूत बताया।
मुखर्जी ने सहिष्णुता का पाठ पढ़ाते हुए कहा था, राष्ट्रवाद किसी धर्म या जाति से बंधा नहीं है। नफरत से देश की पहचान को संकट है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के एक श्लोक का उद्धरण देते हुए उन्होंने कहा था, प्रजा की खुशी में ही राजा की खुशी हो। लगभग जिंदगीभर कांग्रेस में रहे प्रणब हमेशा भाजपा की विचारधारा की मुखालफत करते रहे। इसके बावजूद मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके रिश्ते बेहद अच्छे हैं। एक बार मोदी ने प्रणब को पितातुल्य कहा था।