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बंगाल: कांग्रेस का पुराना गढ़ कैसे बना ममता बनर्जी का अभेद्य किला, जानें कैसा है भवानीपुर की हॉट सीट का इतिहास
Sun, 22 Mar 2026 01:01 PM IST
अमन तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,
Published by: अमन तिवारी
Updated Sun, 22 Mar 2026 01:01 PM IST
सार
दक्षिण कोलकाता की भवानीपुर सीट पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की अहम गवाह रही है। कभी कांग्रेस का गढ़ रही यह सीट अब ममता बनर्जी का राजनीतिक किला मानी जाती है। आइये इस सीट के बारे में विस्तार से जानते हैं...
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बंगाल सीएम ममता बनर्जी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पश्चिम बंगाल की राजनीति के बदलते दौर में भवानीपुर सीट का अपना एक खास महत्व रहा है। यह सीट राज्य में सत्ता परिवर्तन की सबसे बड़ी गवाह रही है। भवानीपुर सीट दक्षिण कोलकाता में स्थित है। आज इसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक किला माना जाता है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। आजादी के बाद कई दशकों तक यहां कांग्रेस का राज रहा।
भवानीपुर सीट कांग्रेस का पुराना गढ़
भवानीपुर सीट से राज्य के कई बड़े नेताओं का नाता रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने यहां से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी। बाद में उन्होंने निर्दलीय चुनाव भी जीता। मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेताओं ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। लंबे समय तक यह सीट कांग्रेस का शहरी गढ़ बनी रही।
वर्षों तक यह निर्वाचन क्षेत्र पूरी तरह से कांग्रेस के प्रभाव क्षेत्र में रहा। वामपंथी दल केवल 1969 में इसे कुछ समय के लिए भेद पाए, जब इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट निर्वाचन क्षेत्र कर दिया गया था। सीपीआई(एम) नेता साधन गुप्ता, जो 1953 में भारत के पहले दृष्टिबाधित सांसद बने थे, उन्होंने बांग्ला कांग्रेस और सीपीआई(एम) की दूसरी संयुक्त मोर्चा सरकार के दौरान यह सीट जीती थी।
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ये भी पढ़ें: Bengal Election: 'भाजपा के लिए जी का जंजाल बन चुका है SIR, ममता ही आखिरी उम्मीद', सागरिका घोष का बड़ा दावा
सीट के गायब होना के बाद हुई वापसी
1972 में परिसीमन के बाद भवानीपुर सीट चुनावी नक्शे से गायब हो गई थी। लगभग 40 वर्षों तक यह सीट अस्तित्व में नहीं रही। साल 2011 में जब दोबारा परिसीमन हुआ, तब यह सीट फिर से बनी। यह वही समय था जब बंगाल में 34 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत हो रहा था।
टीएमसी का उदय
2011 में नई भवानीपुर सीट पर पहली बार चुनाव हुए। ममता बनर्जी ने अपने करीबी सुब्रत बख्शी को यहां से मैदान में उतारा। बख्शी ने माकपा के नारायण जैन को करीब 50,000 वोटों से हराया। उन्हें कुल 64 प्रतिशत वोट मिले। इसके तुरंत बाद बख्शी ने यह सीट खाली कर दी। मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने यहां से उपचुनाव लड़ा। उन्होंने माकपा की नंदिनी मुखर्जी को 54,000 से ज्यादा वोटों से हराकर अपनी जीत दर्ज की। इस चुनाव में ममता को 77 प्रतिशत वोट मिले थे।
2016 और 2021 के दिलचस्प मुकाबले
2016 के चुनाव में कांग्रेस और वामपंथियों ने गठबंधन किया। उन्होंने ममता बनर्जी के खिलाफ दीपा दासमुंशी को उतारा। इस मुकाबले को 'दीदी बनाम बौदी' कहा गया। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने 65,520 वोट पाकर बड़ी जीत हासिल की। जबकि दासमुंशी को 40,219 वोट मिले वहीं भाजपा के चंद्र कुमार बोस 26,000 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2021 के चुनाव में ममता बनर्जी नंदीग्राम से चुनाव लड़ने चली गईं। भवानीपुर से टीएमसी के शोभनदेव चट्टोपाध्याय जीते। उन्होंने भाजपा के रुद्रनील घोष को 28,000 वोटों से हराया। हालांकि, नंदीग्राम में हार के बाद ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उपचुनाव लड़ना पड़ा। शोभनदेव ने उनके लिए सीट खाली की। ममता ने भाजपा की प्रियंका टिबरेवाल को 58,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया। उन्हें लगभग 72 प्रतिशत वोट मिले।
ये भी पढ़ें: West Bengal: एसआईआर के बाद अंतिम मतदाता सूची जारी होने से पहले अलर्ट, जिलाधिकारियों को सुरक्षा के कड़े निर्देश
सामाजिक बनावट और महत्व
भवानीपुर की आबादी बहुत विविध है। यहां बंगाली मध्यम वर्ग के साथ-साथ हिंदी भाषी व्यापारी समुदाय भी बड़ी संख्या में रहता है। अनुमान के मुताबिक, यहां 42 प्रतिशत बंगाली हिंदू, 34 प्रतिशत गैर-बंगाली हिंदू और 24 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर और ममता बनर्जी का निवास स्थान भी इसी क्षेत्र में आता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यहां की मिली-जुली संस्कृति ममता बनर्जी की राजनीति को बहुत रास आती है।
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भवानीपुर सीट कांग्रेस का पुराना गढ़
भवानीपुर सीट से राज्य के कई बड़े नेताओं का नाता रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने यहां से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी। बाद में उन्होंने निर्दलीय चुनाव भी जीता। मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेताओं ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। लंबे समय तक यह सीट कांग्रेस का शहरी गढ़ बनी रही।
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वर्षों तक यह निर्वाचन क्षेत्र पूरी तरह से कांग्रेस के प्रभाव क्षेत्र में रहा। वामपंथी दल केवल 1969 में इसे कुछ समय के लिए भेद पाए, जब इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट निर्वाचन क्षेत्र कर दिया गया था। सीपीआई(एम) नेता साधन गुप्ता, जो 1953 में भारत के पहले दृष्टिबाधित सांसद बने थे, उन्होंने बांग्ला कांग्रेस और सीपीआई(एम) की दूसरी संयुक्त मोर्चा सरकार के दौरान यह सीट जीती थी।
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सीट के गायब होना के बाद हुई वापसी
1972 में परिसीमन के बाद भवानीपुर सीट चुनावी नक्शे से गायब हो गई थी। लगभग 40 वर्षों तक यह सीट अस्तित्व में नहीं रही। साल 2011 में जब दोबारा परिसीमन हुआ, तब यह सीट फिर से बनी। यह वही समय था जब बंगाल में 34 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत हो रहा था।
टीएमसी का उदय
2011 में नई भवानीपुर सीट पर पहली बार चुनाव हुए। ममता बनर्जी ने अपने करीबी सुब्रत बख्शी को यहां से मैदान में उतारा। बख्शी ने माकपा के नारायण जैन को करीब 50,000 वोटों से हराया। उन्हें कुल 64 प्रतिशत वोट मिले। इसके तुरंत बाद बख्शी ने यह सीट खाली कर दी। मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने यहां से उपचुनाव लड़ा। उन्होंने माकपा की नंदिनी मुखर्जी को 54,000 से ज्यादा वोटों से हराकर अपनी जीत दर्ज की। इस चुनाव में ममता को 77 प्रतिशत वोट मिले थे।
2016 और 2021 के दिलचस्प मुकाबले
2016 के चुनाव में कांग्रेस और वामपंथियों ने गठबंधन किया। उन्होंने ममता बनर्जी के खिलाफ दीपा दासमुंशी को उतारा। इस मुकाबले को 'दीदी बनाम बौदी' कहा गया। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने 65,520 वोट पाकर बड़ी जीत हासिल की। जबकि दासमुंशी को 40,219 वोट मिले वहीं भाजपा के चंद्र कुमार बोस 26,000 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2021 के चुनाव में ममता बनर्जी नंदीग्राम से चुनाव लड़ने चली गईं। भवानीपुर से टीएमसी के शोभनदेव चट्टोपाध्याय जीते। उन्होंने भाजपा के रुद्रनील घोष को 28,000 वोटों से हराया। हालांकि, नंदीग्राम में हार के बाद ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उपचुनाव लड़ना पड़ा। शोभनदेव ने उनके लिए सीट खाली की। ममता ने भाजपा की प्रियंका टिबरेवाल को 58,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया। उन्हें लगभग 72 प्रतिशत वोट मिले।
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सामाजिक बनावट और महत्व
भवानीपुर की आबादी बहुत विविध है। यहां बंगाली मध्यम वर्ग के साथ-साथ हिंदी भाषी व्यापारी समुदाय भी बड़ी संख्या में रहता है। अनुमान के मुताबिक, यहां 42 प्रतिशत बंगाली हिंदू, 34 प्रतिशत गैर-बंगाली हिंदू और 24 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर और ममता बनर्जी का निवास स्थान भी इसी क्षेत्र में आता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यहां की मिली-जुली संस्कृति ममता बनर्जी की राजनीति को बहुत रास आती है।
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