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Beijing Winter Olympics 2022: बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक के राजनयिक बहिष्कार का क्या मतलब है, क्या भारत लेगा इन खेलों में हिस्सा?

Fri, 10 Dec 2021 01:31 PM IST
Pratibha Jyoti प्रतिभा ज्योति
Updated Fri, 10 Dec 2021 01:31 PM IST
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सार
बीजिंग में अगले साल होने वाले शीतकालीन ओलंपिक का कई देशों ने राजनयिक बहिष्कार किया है। इससे बीजिंग नाराज है। चीन ने गुरुवार को जवाबी कार्रवाई का संकेत दिया।

 
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beijing wiinter olympics 2022 diplomatic political boycott by US, Canada and uk of beijing winter olympics indin players also play this game
बीजिंग ओलंपिक - फोटो : social media

विस्तार

बीजिंग में अगले साल शीतकालीन ओलंपिक होना है, लेकिन अमेरिका ने इसके राजनयिक बहिष्कार की घोषणा की। इसके तुरंत बाद ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा और न्यूजीलैंड ने भी इसका बहिष्कार कर दिया। इन बहिष्कारों से बौखलाए चीन ने गुरुवार को पश्चिमी देशों को चेतावनी दी कि वे इस बहिष्कार की ‘कीमत चुकाएंगे’। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि अमेरिका का यह फैसला केवल एक साजिश है जो नाकाम होकर रहेगा।


हालांकि चीन से सीमा विवाद को लेकर तनाव के बावजूद भारत ने इस तरह की कोई घोषणा नहीं की है। चीन अगले साल फरवी से मार्च तक बीजिंग में शीतकालीन ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों का आयोजन कर रहा है। चीनी अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने किसी भी अमेरिकी अधिकारी को उद्घाटन में शामिल होने के लिए आमंत्रित नहीं किया था। 


खेलों के राजनयिक बहिष्कार का क्या मतलब है?
आमतौर पर राजयनिक बहिष्कार वह होता है जिसमें सरकार की तरफ से आधिकारिक तौर पर कोई राजनयिक बड़ी अंतरराष्ट्रीय सभाओं और प्रमुख शिखर सम्मेलनों में या इस तरह के बड़े आयोजनों में शामिल नहीं होते हैं। शीतकालीन ओलंपिक के राजनयिक बहिष्कार का अर्थ है कि बीजिंग में शीतकालीन ओलंपिक में अमेरिका, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और कनाडा के कोई अधिकारी मौजूद नहीं रहेंगे।

यह खेलों का पूरी तरह बहिष्कार नहीं है, क्योंकि अधिकारियों के नहीं रहने के बावजूद खिलाड़ियों का खेल प्रभावित नहीं होगा, जितना कि एक एथलीट के बहिष्कार करने से होता। हालांकि, बहिष्कार करने वाले किसी भी देश ने यह नहीं कहा है कि उनके एथलीट इन खेलों में शामिल नहीं होंगे, जिसका मतलब है कि खेलों के प्रभावित होने की संभावना नहीं है।
 

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन - फोटो : पीटीआई
अमेरिका ने क्या कारण बताया
अमेरिका के राष्ट्रपति कार्यालय व्हाइट हाउस ने कहा कि चीन में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन की चिंताओं के कारण खेलों में अमेरिका की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल शामिल नहीं होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन पिछले महीने ही कह चुके थे कि वह साल 2022 के शीतकालीन ओलंपिक का राजनयिक बहिष्कार करेंगे। अमेरिका के इस बहिष्कार को शिनजियांग में मुस्लिम उइगर अल्पसंख्यकों पर ‘उत्पीड़न’ के खिलाफ उठाया गया कदम माना जा रहा है।

खिलाड़ियों को मिलेगा सरकार का सहयोग
सोमवार को इस निर्णय की घोषणा करते हुए, व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव जेन साकी ने पश्चिमी चीन के शिनजियांग में ‘नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध’ का हवाला दिया और कहा आधिकारिक प्रतिनिधित्व का शामिल होना चीन के इस अत्याचार को नजरअंदाज करने जैसा होगा, हम ऐसा नहीं कर सकते। हालांकि सरकार ने यह साफ किया है कि अमेरिकी खिलाड़ी ओलंपिक में भाग ले सकते हैं और उन्हें सरकार का पूरा सहयोग मिलेगा। अंततराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मानवाधिकारों के हनन की निंदा करने वाले शीर्ष एथलीटों का भी कहना है कि वे खेलों में भाग लेने की योजना बना रहे हैं।
 

विदेश मंत्री एस जयशंकर
विदेश मंत्री एस जयशंकर - फोटो : पीटीआई
क्या भारत अपने एथलीट्स भेजेगा? 
27 नवंबर को रूस के विदेश मंत्री सर्गेइ लवरोफ और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ वर्चुअल बैठक में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शीतकालीन ओलंपिक्स और पैरालंपिक्स खेलों के आयोजन को लेकर चीन का समर्थन किया था। अगले दिन चीन की सरकार का मुखपत्र माने जाने वाले अंग्रेजी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने भारत के इस कदम की सराहना की है और लिखा है कि भारत के सहयोग से पता चलता है कि वह अमेरिका का स्वाभाविक सहयोगी नहीं है। 

ग्लोब्ल टाइम्स ने क्या लिखा
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि अमेरिका के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों के बावजूद, यह मतलब नहीं है कि  भारत सभी क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों में अमेरिका के प्रति झुकाव रखता है। ग्लोबल टाइम्स ने यह भी लिखा था कि विंटर ओलंपिक्स में भारत के इस कदम से साफ है कि वो अमेरिका का छोटा भाई नहीं बनना चाहता है, जैसे कि जापान और ऑस्ट्रेलिया हैं। ग्लोब्ल टाइम्स ने दावा किया कि भारत अपने दम पर ताक़तवर बनना चाहता है और अमेरिका से जुड़ने को लेकर अनिच्छुक है।

भारत के इस रुख की क्या वजह हो सकती है, इस बारे में पूछे जाने पर एक पूर्व राजनयिक का कहना है कि भारत सरकार ने सीमा विवाद या पड़ोसियों से रिश्ते को, खेलों के आयोजन से हमेशा अलग रखने की कोशिश की है। सीमा पर विवाद होने का मतलब यह नहीं कि खिलाड़ियों को प्रतियोगिता में हिस्सा लेने या मेडल हासिल करने से रोक दिया जाए। पाकिस्तान से तनाव के बीच भी अक्सर भारत-पाकिस्तान के बीच में होने वाले क्रिकेट मैच को रद्द करने की मांग की जाती है। लेकिन खेल और कूटनीतिक रिश्तों को अलग करके देखने की जरूरत है। 
 

कश्मीर के गुलमर्ग के रहने वाले आरिफ खान बीजिंग ओलंपिक 2022 के लिए क्वालीफाई करने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी
कश्मीर के गुलमर्ग के रहने वाले आरिफ खान बीजिंग ओलंपिक 2022 के लिए क्वालीफाई करने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी - फोटो : ANI
आरिफ खान शीतकालीन ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाले पहले खिलाड़ी
कश्मीर के गुलमर्ग के रहने वाले आरिफ खान पहले खिलाड़ी बने जिन्होंने इसी महीने बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाले पहले एथलीट बने। भारत ने कभी भी शीतकालीन ओलंपिक में पदक नहीं जीता है और कभी भी खेलों के एक संस्करण में चार से अधिक एथलीटों को नहीं भेजा है। भारत सरकार ने 1998 में शीतकालीन खेलों को प्राथमिकता सूची से हटा दिया और इसे अभी तक बहाल नहीं किया गया है। आरिफ खान ने मीडिया से बातचीत में काह कि यह देश में शीतकालीन खेलों को बढ़ावा देने और कश्मीर के युवाओं के लिए एक बडा अवसर है। 

कब-कब हो चुका है खेलों का बहिष्कार 
ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी बड़े खेल आयोजन का विरोध हो रहा है। इससे पहले भी कई मौकों पर देशों ने अपने कूटनीतिक समीकरणों और राजनीतिक संबंधों के हिसाब से कई बार खेलों के आयोजन का विरोध किया है। हंगरी पर आक्रमण के विरोध में मेलबर्न में हुए 1956 के ग्रीष्मकालीन खेलों में स्पेन, नीदरलैंड और स्विटजरलैंड ने भाग नहीं लिया था। इसी तरह सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर किए गए हमले के विरोध में 1980 में भी अमेरिका ने मॉस्को ओलंपिक से अपने एथलीट्स को वापस बुला लिया था।

1984 में लॉस एंजिल्स खेलों में रूस और 19 अन्य देशों ने भाग नहीं लिया। 1988 में, उत्तर कोरिया और पांच अन्य देशों ने सियोल में ओलंपिक खेलों में कोई एथलीट नहीं भेजा। तिब्बत में मानवाधिकारों के उल्लंघन के कारण बीजिंग में 2008 के ग्रीष्मकालीन खेलों का बहिष्कार करने का भी आह्वान किया गया था।  




 
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