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Hindi News ›   India News ›   Azadi Ka Amrit Mahotsav : Here revolution story of Veer vinayak damodar savarkar on every tongue, memories are felt on the streets and chaupal

आजादी का अमृत महोत्सव : यहां हर जुबां पर 'वीर' की क्रांतिगाथा, गलियों और चौपाल पर होता है स्मृतियों का एहसास

Sun, 05 Dec 2021 06:41 AM IST
योगेश साहू पुनीत शर्मा, वीर सावरकर के जन्म स्थल भगूर से
पुनीत शर्मा, वीर सावरकर के जन्म स्थल भगूर से Published by: योगेश साहू Updated Sun, 05 Dec 2021 06:41 AM IST
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सार
देश को बनाने में जिन्होंने अपना जीवन दिया, उनकी विरासत और स्मृतियों से पाठकों को रूबरू कराने की कड़ी में पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, गोपीनाथ बारदोलोई और सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म स्थान से रिपोर्ट आपने पढ़ी। इस बार वीर सावरकर की जन्मस्थली... भगूर के हर घर में उनकी तस्वीर है...15 हजार की आबादी वाला यह गांव अपने आंचल में क्रांति का पूरा इतिहास समेटे है। तब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ शंखनाद के बाद यह राष्ट्रभक्तों का तीर्थ बन गया था।
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Azadi Ka Amrit Mahotsav : Here revolution story of Veer vinayak damodar savarkar on every tongue, memories are felt on the streets and chaupal
विनायक दामोदर सावरकर। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

नासिक से भगूर गांव तक वीर सावरकर की यादों का एक पूरा समंदर फैला है। नासिक से 12 किलोमीटर दूर दक्षिण की ओर बसे इस गांव में जाने के लिए हम ऑटो में बैठे। ऑटो चालक पूरे रास्ते अपने तात्या के किस्से सुनाता रहा। सावरकर की क्रांति गाथा की एक-एक पंक्ति उसके जेहन में बसी थी। कुछ देर बाद हम भगूर गांव में सावरकर के घर के सामने थे, जो अब स्मारक बन चुका है।



गांव में प्रवेश करते ही यहां की गलियों और चौपाल पर सावरकर के बचपन की स्मृतियों का एहसास होता है। गांव के एक छोर से दूसरे छोर तक उनकी वीरगाथाएं सुनाई देती हैं। यहां के लोगों के लिए यह स्मारक किसी मंदिर से कम नहीं है। गोबर से लीपे इस पुराने भवन में आजादी के योद्धा के बचपन की यादें संजोकर रखी हुई हैं। यहां आने वाले सैलानी सहज ही वीर सावरकर की स्मृतियों में खो जाते हैं। जिस जगह उनके परिवार के लोग पूजा किया करते थे वह स्थान भी सुरक्षित है।


वक्त के साथ भगूर अब कस्बे की शक्ल ले चुका है। स्मारक देखने के लिए न केवल महाराष्ट्र बल्कि देशभर से लोग पहुंचते हैं और यहां माथा टेकते हैं। गांव के हर आदमी की जुबान पर वीर की गाथाएं हैं और हर घर में उनकी तस्वीर। 15 हजार की आबादी वाला यह गांव अपने आंचल में क्रांति का पूरा इतिहास समेटे है। यूं तो भगूर गांव की धरती पर कई स्वतंत्रता सेनानियों ने जन्म लिया था। पर, सावरकर ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जो शंखनाद किया, उससे यह गांव राष्ट्रभक्तों का तीर्थ बन गया। 

यहां से जंग-ए-आजादी की अलख कुछ ही दिनों में नासिक तक पहुंच गई। स्मारक के आसपास रहने वाले राजगुरु, भानुधने, धात्रक और गायने परिवार के बुजुर्गों ने सावरकर का बचपन करीब से देखा है। इन्हीं में से एक ने बताया कि बचपन में ही सावरकर का परिवार यहां से नासिक चला गया। देखरेख न होने के कारण मकान जर्जर हो गया। लेकिन कौन जानता था कि यह मकान एक दिन गौरवशाली इतिहास का गवाह बनेगा।

स्मारक में प्रवेश करते ही सामने उनकी मूर्ति नजर आती है। हर दीवार पर सावरकर और परिवार की तस्वीरें लगी हैं। इन्हीं के बीच विदेशी वस्त्रों की होली जलाते हुए सावरकर की तस्वीर समेत कई और तस्वीरें भी आंदोलनों की गवाही देती हैं। पास में ही रहने वाले भानुधने परिवार ने बताया कि दो साल से कोराना के चलते स्मारक बंद था, इसलिए यहां लोगों की आवाजाही भी बंद थी, लेकिन अब फिर से रौनक लौटने लगी है। हर रोज यहां करीब 200 से 300 लोग आते हैं। अच्छा लगता है जब यहां आकर लोग सावरकर के बारे में जानना और पढ़ना चाहते हैं।

गांव में 28 मई को सावरकर के जन्मदिन और 26 फरवरी को पुण्यतिथि पर कार्यक्रम होते हैं। जन्मदिन का जलसा गांव में किसी उत्सव से कम नहीं होता है। सियासी लोगों का भी उस दिन यहां जमावड़ा रहता है। स्मारक की देख-रेख करने वाले मनोज कुंवर बताते हैं कि यहां शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे, उद्धव ठाकरे समेत महाराष्ट्र की तमाम सियासी हस्तियां आ चुकी हैं। पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी स्मारक पर माथा टेक चुके हैं। स्मारक के पास ही वह प्राइमरी स्कूल है जिसमें सावरकर 5वीं तक पढ़े थे।

इसके बाद आगे पढ़ाई नासिक में हुई। वर्तमान में स्कूल का स्वरूप बहुत बदल गया है। इसका भवन भी नया बन गया है। अब इसमें 300 से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं। गांव वाले बताते हैं कि सावरकर में नेतृत्व क्षमता बचपन से थी। सुबह-शाम को स्कूल के मैदान में बच्चों की टोली जमा होती थी। सावरकर इनके नेता होते थे। इनके खिलौने होते थे धनुष बाण, तलवार और भाला। सावरकर के पोते रणजीत सावरकर का कहना है कि एक साजिश के तहत उनके दादा के स्वतंत्रता सेनानी होने पर संदेह जताया जाता है, जो लोग इस कुचक्र में शामिल हैं वे राष्ट्रविरोधी हैं। इनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। सावरकर ने सभी स्वतंत्रता सेनानियों को रिहा करवाने के लिए पिटीशन दायर की थी । उसमें कहीं माफी का जिक्र नहीं था।

हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा
वीर सावरकर ने पूरे विश्व में भारत की पहचान हिंदू के रूप में बनाने के लिए हिंदुत्व शब्द को गढ़ा था। सावरकर के हिसाब से भारत में रहने वाला व्यक्ति मूलत: हिंदू है और यही हिंदुत्व शब्द की परिभाषा है। जिस शख्स की मातृभूमि भारत हो वह इस देश का नागरिक है। इतिहासकारों का कहना है कि सावरकर ने एक किताब ‘हिंदुत्व हू इज हिंदू’ लिखी थी। इसमें उन्होंने पहली बार राजनीतिक विचारधारा के तौर पर हिंदुत्व का इस्तेमाल किया था।

हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा को विकसित करने में सावरकर का बड़ा योगदान रहा है। हालांकि सावरकर कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ के सदस्य नहीं रहे लेकिन संघ फिर भी उन्हें प्रणेता मानता रहा है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत तो यहां तक कह चुके हैं कि सावरकर को बदनाम करने की मुहिम आजादी के बाद से ही शुरू हो गई थी। उन्होंने कहा था कि वर्तमान समय में सावरकर के बारे में सही जानकारी की कमी है। नौजवानों को उनकी लिखी किताबें पढ़नी चाहिए।

विचार और व्याख्या
सावरकर के विचार और आजादी के लिए उनके योगदान को घर-घर पहुंचाने के लिए यहां के युवाओं ने सोशल मीडिया पर एक ग्रुप बना रखा है। इस ग्रुप से कई हजार लोग जुड़े हुए हैं। सावरकर द्वारा लिखी गई किताबें और जिस देशभक्ति के साहित्य को वह पढ़ा करते थे उसका खूब प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। महाराष्ट्र के स्कूलों तक सावरकर की लिखी किताबें पहुंचाई जा रही हैं।

सावरकर ने अपनी मृत्यु से दो साल पहले आत्महत्या या आत्मसमर्पण नाम का एक लेख लिखा था...
इस लेख में उन्होंने अपनी इच्छा मृत्यु के समर्थन को स्पष्ट किया था। उनका कहना था कि आत्महत्या और आत्म त्याग के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर होता है। एक निराश इंसान आत्महत्या से अपना जीवन समाप्त करता है, लेकिन जब किसी के जीवन का मिशन पूरा हो चुका हो और शरीर इतना कमजोर हो चुका हो कि जीना असंभव हो तो जीवन का अंत करने को स्व बलिदान कहा जाना चाहिए। सावरकर की आत्मकथा 'मेरा आजीवन कारावास' में उनके अंतिम दिनों के लिखे गए कई पत्र प्रकाशित हैं। इसमें एक पत्र ऐसा भी है जिसमें उन्होंने कई तर्कों के जरिये इच्छा मृत्यु की व्याख्या की है।

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