अयोध्या पर फैसला : पूजा चलती रही... इसलिए देरी नहीं मानी जाएगी
श्रीरामलला विराजमान और जन्मस्थान की ओर से दाखिल याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में निश्चित समयसीमा से बाहर मानने से इनकार कर दिया। इसकी वजह वह पूजा-सेवा है, जो अयोध्या में मस्जिद विवाद के दौरान भी जारी रही।
आमतौर पर परिसीमा के कानून के तहत किसी शिकायत के लिए निर्धारित समय में मुकदमा दायर करना होता है, रामलला की ओर से 1989 में किए गए मुकदमे को 1949 के मामले से संबंधित बताते हुए मुस्लिम पक्ष ने इसे खारिज करने की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इससे पहले गोपाल सिंह विशारद, निर्मोही अखाड़े या सुन्नी वक्फ बोर्ड ने रामलला को पक्षकार नहीं बनाया गया था। दूसरी ओर 22-23 दिसंबर 1949 की रात बाबरी मस्जिद में प्रतिमाएं रखे जाने के बाद इसे अटैच कर दिया गया था। साथ ही सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद से हटाया गया था। बोर्ड ने 12 वर्ष के भीतर मुकदमा दायर किया था।
मस्जिद बनने के बावजूद हिंदू प्रार्थना करते रहे
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रामलला और जन्मस्थान का अलग और अपना कानूनी व्यक्तित्व है। कोर्ट ने हाईकोर्ट के जस्टिस सुधीर अग्रवाल के निर्णय में दिए गए निष्कर्षों पर भी सहमति जताई और कहा कि रामलला में हिंदुओं के ऐतिहासिक आस्था और विश्वास बने रहे, वे प्रार्थना करते रहे, भले ही मस्जिद बना दी गई।
दो घंटे पहले लग गई थीं कोर्ट के बाहर लाइनें
रेलवे स्टेशन की टिकट खिड़की सरीखी दो घंटे लंबी कतारें, उनमें लगे लोगों का सेल्फी लेकर किया जा रहा टाइमपास और दरवाजा खुलते ही भारतीय रेल के जनरल कोच में सीट कब्जाने जैसी आपाधापी। चीफ जस्टिस कोर्ट के बाहर ऐसा अभूतपूर्व माहौल सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में महज उंगलियों पर गिनने लायक मौकों पर ही देखने को मिला है, लेकिन शनिवार को अयोध्या मसले पर ऐतिहासिक फैसले का गवाह बनने की बेताबी ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।
शीर्ष अदालत की कोर्ट नंबर-1 में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय सांविधानिक पीठ को अयोध्या मसले का फैसला करीब 10.30 बजे सुनाना था, लेकिन इस राजनीतिक व धार्मिक संवेदनशीलता वाले मसले का फैसला सुनने के लिए कोर्ट नंबर-1 के तीनों दरवाजों के बाहर सुबह तकरीबन आठ बजे से ही वकीलों, पत्रकारों और अन्य मामलों के वादियों का भारी संख्या में जमावड़ा दिखाई देने लगा।
करीब 10.15 बजे जब दरवाजे खोले गए तो हालात बेकाबू होते दिखाई दिए। हर कोई अंदर घुसने के लिए बेताब था, लेकिन कतार में लगने का सब्र कोई नहीं दिखा रहा था। नतीजतन अदालत के अंदर मछली बाजार जैसे शोरगुल वाले हालात दिखाई दिए। करीब 14 मिनट बाद यानी 10.29 बजे जब पांचों जज अदालत में अपने डायस पर पहुंचे तो माहौल पूरी तरह अराजक हो चुका था। अंत में चीफ जस्टिस गोगोई के सभी को तत्काल शांत होने का आदेश देने के बाद ही स्थिति में सुधार दिखाई दिया और थोड़ी ही देर में अदालत के अंदर सुई गिरने की भी आवाज गूंजने लायक खामोशी छा चुकी थी।
सबसे पहले चीफ जस्टिस गोगोई ने किए हस्ताक्षर
1045 पेज का फैसला पढ़कर सुनाने से पहले पांचों जजों ने उस पर हस्ताक्षर किए। सबसे पहले चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, फिर जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एसए नजीर ने हस्ताक्षर किए। चीफ जस्टिस ने उपस्थित लोगों से कहा कि यह एक सर्वसम्मत फैसला है और इसे पढ़ने में करीब ‘आधा घंटा’ लगेगा।
जजों के जाते ही लगे जय श्रीराम के नारे
फैसला सुनाकर पांचों जज जैसे ही कोर्ट रूम से बाहर निकले तो अंदर का माहौल फिर से पहले की तरह भारी शोरगुल वाला हो गया। कुछ वकील और वादी कोर्ट रूम से निकले और ‘जय श्रीराम’ समेत कई नारे लगाने लगे। कुछ वकील फैसले की समीक्षा करने लगे, जबकि अन्य लोग दूसरों को सूचना देने में जुट गए।
विभिन्न पक्षों के वकीलों ने लिया ग्रुप फोटो
इस मुकदमे में विभिन्न पक्षों की तरफ से जिरह कर रहे वकीलों ने इसकी ऐतिहासिक स्थिति को समझते हुए कोर्ट नंबर-1 के ठीक बाहर अपने ग्रुप फोटो भी खिंचवाए।