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अयोध्या मामलाः इसलिए बिखर गए श्रीश्री रविशंकर के सपने

Thu, 23 Nov 2017 04:38 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Thu, 23 Nov 2017 04:38 PM IST
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ayodhya ramjanam bhoomi issue sri sri ravishankar dreams broken
Sri Sri Ravi Shankar
आर्ट ऑफ लिविंग के प्रमुख श्रीश्री रविशंकर बड़ी उम्मीद के साथ अयोध्या में रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद का समाधान निकालने निकले थे। रविशंकर बहुत योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहे थे। उच्चपदस्थ सूत्र बताते हैं कि आगे बढ़ने से पहले रविशंकर ने केंद्र सरकार और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक अपना संदेश पहुंचा दिया था, लेकिन उन्हें सिर मुंड़ाते ही ओले का सामना करना पड़ा।
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बंगलुरू में आयोजित धर्म संसद में पहुंचे सूत्र का दावा है कि अयोध्या पहुंचते-पहुंचते रविशंकर को अपनी साख पर बट्टा साफ दिखाई देने लगा और वह चुपचाप इस मुद्दे से अभी खिसक लेने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं।
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यह थी रविशंकर की योजना

श्रीश्री की योजना इस मुद्दे पर जोरदार मध्यस्थता की थी। वह इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के धार्मिक नेताओं तथा देश के भीतर हिंदू-मुस्लिम धर्म के साधु-संतों के बीच तालमेल बनाकर समाधान निकालने की फिराक में थे। इसके लिए वह काफी सोच समझकर इंतजाम के साथ आगे बढ़े थे।

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हालांकि श्रीश्री के पास मौजूद किसी फार्मूले की कोई भनक नहीं मिल पाई है, लेकिन उनके एजेंडे में अपनी छवि के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को भी निखारना था। इसी के इर्द गिर्द वह अपनी योजना को अंजाम दे रहे थे। अजमेर शरीफ दरगाह के प्रमुख समेत अन्य के गृहमंत्री राजनाथ सिंह से भेंट की योजना का मकसद भी यही था। इसी का अगला पड़ाव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर अयोध्या जाने का था।

इसलिए टूट गए सपने

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Sri Sri Ravi Shankar
अयोध्या से जुड़े और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े प्रतिष्ठित एक साधु के अनुसार श्रीश्री की पहल भाजपा की मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ही स्वीकार्य नहीं थी। विश्व हिंदू परिषद के एक महासचिव का साफ कहना है कि अब जब उच्चतम न्यायालय इसकी प्रतिदिन सुनवाई करने जा रहा है तो ठीक एक महीने पहले श्रीश्री जैसे बाबा का इसमें क्या काम? साफ है विश्व हिंदू परिषद भी इसे नहीं चाहती थी।

रामजन्म भूमि मंदिर न्यास के साधु-संतों को भी श्रीश्री की पहल रास नहीं आ रही थी। श्रीश्री के रास्ते की सबसे बड़ी अड़चन उनका धर्माचार्य या साधु-संत समाज का व्यक्ति न होना भी था। ऐसे में सब सही समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। बताते हैं संघ भी नहीं चाहता था कि जिस राम मंदिर के मुद्दे पर इतना बड़ा आंदोलन हुआ, उसका पटाक्षेप इस तरीके से हो। कहा जा सकता है कि इसको लेकर रविशंकर का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगभग मौन सहमति से सामानांतर शुरू होने वाला प्रयास स्वीकार्य नहीं था।

ऐसे में बड़ा सवाल था कि विरोध का बीड़ा कौन उठाए। बताते हैं यह काम काफी मुखर राम कथा मर्मज्ञ, अयोध्या आंदोलन से जुड़े डा. राम विलास वेदांती ने पूरा कर दिया। सूत्र बताते हैं कि डा. वेदांती के इस प्रयास को न केवल साधु-संत समाज, राम जन्मभूमि न्यास बल्कि आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद की तरफ से तारीफ मिली है।

योगी को भी नहीं समझ में आया

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी श्रीश्री की पहल को नहीं चाहते थे, लेकिन संवैधानिक पद तथा गोरखनाथ मंदिर, राम जन्मभूमि आंदोलन से लगाव रखने के कारण मुख्यमंत्री ने सधी हुई प्रतिक्रिया दी। बताते हैं आंतरिक स्तर पर बढ़े विरोध और पैदा हुई स्थिति के कारण ही केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ऐन वक्त पर श्रीश्री से भेंट के कार्यक्रम को टाल दिया। श्रीश्री वापस लौट आए और अब उच्चतम न्यायालय में सुनवाई शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं।

पॉवरफुल हैं श्रीश्री
सत्ता के गलियारे में श्रीश्री काफी पॉवरफुल हैं। श्रीश्री की सिफारिश पर भाजपा ने 2014 के आम चुनाव में कुछ उम्मीदवार भी उतारे थे। उनका सानिध्य प्राप्त दिल्ली के सांसद महेश गिरी की भी खूब चलती है। महेश गिरी को श्रीश्री के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता है। वह मंत्री और केंद्र सरकार के बीच में भरपूर सक्रिय हैं। हालांकि भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतकर आए यह सांसद खुद काफी सक्रिय रहते हैं। उन्हें भी श्रीश्री के सफल होने की संभावना दिखाई दे रही थी।
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