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Ram Mandir: किसी ने सत्ता खोई तो किसी ने हजारों कारसेवक जुटाए, जानें राम मंदिर आंदोलन के बड़े चेहरे

Sat, 11 Jan 2025 05:56 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 11 Jan 2025 05:56 AM IST
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सार
Ayodhya Andolan Faces: अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का सफर काफी चुनौतियों भरा रहा है। बाबरी विवाद, आदालतों में चली लंबी लड़ाई और फिर शीर्ष अदालत के फैसले के बाद मंदिर का निर्माण शुरू होना। आइए जानते हैं उन हस्तियों के बारे में जिनकी बदौलत यह शुभ दिन आया है...
 
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Ayodhya Ram Mandir History Big Faces Ram Mandir Movement 1990 From Firing Karsevak to Lost Power
राम मंदिर आंदोलन के बड़े चेहरे। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अयोध्या में पिछले साल 22 जनवरी को राम मंदिर की भव्य प्राण प्रतिष्ठा हुई। इस ऐतिहासिक मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ वे चेहरे भी जुटे थे, जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन में अपना अमूल्य योगदान दिया था। हालांकि, मंदिर आंदोलन के जरिए मंदिर का रास्ता प्रशस्त करवाने वाले कई सियासी सूरमा अब इस दुनिया में भी नहीं हैं, लेकिन उनकी भूमिका की अक्सर चर्चा होती है।

वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी
वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी - फोटो : AMAR UJALA
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के एक वर्ष पूरा होने के मौके पर आइये जानते हैं राम मंदिर आंदोलन के 10 बड़े चेहरों के बारे में...

रथ यात्रा के जरिए लालकृष्ण आडवाणी बने सबसे बड़ा चेहरा
राम मंदिर के पक्ष देश में माहौल बनाने के लिए भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने 1990 में सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथ यात्रा निकाली थी। इसी यात्रा से अयोध्या आंदोलन को धार मिली थी। देश के कई शहरों और गांवों से लोग अयोध्या में कार सेवा करने के लिए पहुंच रहे थे। अयोध्या समेत देश के कई हिस्सों में 'राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे' का नारा गूंज रहा था। आडवाणी अयोध्या आंदोलन से भाजपा के सबसे बड़े हिंदुत्व का चेहरा बन गए थे। विध्वंस के दौरान आडवणी अयोध्या में मौजूद थे। विवादस्पद ढांचा विध्वंस मामले में आरोपी बनाए गए, लेकिन अदालत ने बाद में बरी कर दिया। वर्तमान में आडवाणी अपनी उम्र के कारण सक्रिय राजनीति से दूर हैं।

मुरली मनोहर जोशी।
मुरली मनोहर जोशी। - फोटो : अमर उजाला
आंदोलन को धार देने वाले मुरली मनोहर जोशी
राम मंदिर आंदोलन से जुड़ा एक अहम नाम मुरली मनोहर जोशी है। पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के बाद मंदिर आंदोलन में जोशी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 6 दिसंबर 1992 को जब विवादित ढांचा गिराया गया तो जोशी भी अयोध्या में थे। जोशी ने अपने बेबाक भाषणों से आंदोलन को काफी तेज किया था। आडवाणी की तरह वे भी आरोपी बनाए गए, लेकिन अदालत ने उन्हें भी बरी कर दिया। अब आडवाणी की तरह ही सक्रिय राजनीति से दूर हैं।

कल्याण सिंह।
कल्याण सिंह। - फोटो : अमर उजाला
राम मंदिर के लिए सत्ता गंवाने वाले कल्याण सिंह 
भाजपा के दिग्गज नेताओं में शुमार रहे कल्याण सिंह जोकि राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल भी रहे थे। सिंह दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। राममंदिर आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका ने भाजपा को एक नई पहचान दी। वर्ष 1992 में सुप्रीम कोर्ट को विवादित ढांचे की सुरक्षा का हलफनामा दिया। विवादित ढांचा टूटने के बाद उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई। कल्याण बाद में भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। फिर उनका भाजपा से आना जाना लगा रहा। देश में मोदी सरकार आने के बाद वह राज्यपाल बनाए गए। 21 अगस्त 2021 को कल्याण सिंह ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

विनय कटियार।
विनय कटियार। - फोटो : सोशल मीडिया
कट्टर हिंदुत्व का चेहरा विनय कटियार
राम मंदिर आदोलन को लेकर विनय कटियार के तेवर शुरू से सख्त थे। कटियार कट्टर हिंदुत्व का चेहरा माने जाते थे। विध्वंस के दौरान विनय कटियार अयोध्या में मौजूद थे और वो इस मामले में आरोपी थे, लेकिन अदालत से बरी हो गए। कटियार पर कारसेवकों को विवादित ढांचा तोड़ने के लिए उकसाने का आरोप लगा था। वो मौजूदा समय में भाजपा के सदस्य भले ही हैं, लेकिन पार्टी और सरकार दोनों में उनकी भूमिका नहीं है।

उमा भारती
उमा भारती - फोटो : अमर उजाला
आंदोलन से उभरीं उमा भारती
उमा भारती को राजनीतिक पहचान अयोध्या आंदोलन से मिली। विध्वंस के दौरान उमा भारती अयोध्या में मौजूद रहीं और वह भी इस मामले में आरोपी थीं। हिंदुत्व का चेहरा और फायर ब्रांड नेता के तौर पर उनकी पहचान बन चुकी थी। मौजूदा समय में वह भाजपा में सिर्फ नेता हैं। उन्होंने मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में चुनाव लड़ने से मना कर दिया था।

बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना की
बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना की - फोटो : social media
बाल ठाकरे
शिवसेना प्रमुख रहे बाल ठाकरे अपने तेज तर्रार भाषणों की वजह से देश भर में सुर्खियों में रहते थे। 6 दिसंबर 1992 को जब विवादित ढांचा गिराया गया तो बाल ठाकरे ने बड़े गर्व से अयोध्या में शिव सैनिकों की मौजूदगी की बात स्वीकार की थी। अपने बयानों में वह अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की बात करना नहीं भूलते थे। बाल ठाकरे के समर्थक उन्हें हिंदू हृदय सम्राट कहते थे।

अशोक सिंघल।
अशोक सिंघल। - फोटो : अमर उजाला
हजारों कारसेवक जुटाने वाले अशोक सिंघल
संघ के अनुषांगिक संगठन विहिप के मुखिया रहे अशोक सिंघल ने राम मंदिर आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभाई। सिंघल 20 साल तक विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। इंजीनियर की नौकरी छोड़कर उन्होंने समाज सेवा का रास्ता चुना। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन में सिंघल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित धर्म संसद का सिंघल ने संचालन किया। यहीं राम जन्मभूमि आंदोलन की रणनीति तय की गई। सिंघल ने योजना बनाकर कारसेवकों को जोड़ना शुरू किया। देश भर से उन्होंने 50 हजार कारसेवक जुटाए। 1992 में विवादित ढांचा गिराने वाले कारसेवकों का नेतृत्व करने का आरोप सिंघल पर ही लगा था। सिंघल अदालत से अंततः बरी हुए।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी। - फोटो : amar ujala
राजीव गांधी जिनके कार्यकाल में परिसर का ताला खुला
शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के दस महीने बाद एक जिला अदालत के फैसले ने और भी बड़े भूचाल को जन्म दे दिया। ताला खुलवाने की घटना के बारे में रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर नेहरू' में राम चंद्र गुहा लिखा है।

गुहा लिखते हैं, '1 फरवरी 1986 को उत्तर प्रदेश के शहर अयोध्या में जिला न्यायाधीश ने एक छोटे से हिंदू उपासना गृह का ताला खोलकर पूजा करने की इजाजत दे दी। लोगों का ऐसा मानना था कि न्यायाधीश का फैसला नई दिल्ली के निर्देश पर हुआ है।' 

गुहा ने किताब में राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी के हवाले से लिखा कि ‘राजीव गांधी एक ही साथ दोनों पक्षों को संतुष्ट करना चाहते थे। अगर एक काम मुस्लिम मत को आकर्षित करने के लिए किया गया था तो दूसरा उससे भी बड़ा हिंदू मतदाताओं को संतुष्ट करने के लिए किया गया।’ 

इस निर्णय के बाद कांग्रेस न सिर्फ यूपी में लगातार कमजोर होती गई, बल्कि मुस्लिम वर्ग में भी कांग्रेस का आधार लगातार कमजोर होता चला गया। उन्हें 1989 के लोकसभा चुनाव में सत्ता गंवानी पड़ी। 

हिंदु पक्ष की तरफ से इन संतों ने भी लड़ी लड़ाई

महंत रामचंद्रदास परमहंस

हिंदू पक्ष के महंत रामचंद्र दास परमहंस ही वर्ष 1949 में विवाद शुरू होने और वर्ष 1992 में बाबरी ढांचा के विध्वंस होने मुख्य भूमिका में रहे। कभी हिंदू महासभा से जुड़े रहे और परमहंस 1989 में गठित राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष बने। राम मंदिर निर्माण के लिए दिल्ली में 1984 में हुए धर्मसंसद की भी अध्यक्षता की। उनकी अध्यक्षता में जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ। उनका निधन 2003 में हुआ। अंत समय तक राम मंदिर निर्माण के लिए संघर्ष करते रहे।

राम विलास वेदांती।
राम विलास वेदांती। - फोटो : Social Media
राम विलास वेदांती
अयोध्या आंदोलन के चेहरे के तौर राम विलास वेदांती का नाम भी आता है। अयोध्या के बड़े साधुओं में नाम आता है। राम मंदिर आदोलन ने वेदांती को राजनीतिक पहचान दी और वे भाजपा सांसद बने थे।

बाबरी के पूर्व पक्षकार इकबाल अंसारी।
बाबरी के पूर्व पक्षकार इकबाल अंसारी। - फोटो : amar ujala
मुस्लिम पक्ष के चेहरे
हाशिद अंसारी साल 1949 से ही बाबरी के सबसे प्रमुख पैरोकार रहे। पहले साइकिल फिर दर्जी की दुकान खोलने वाले अंसारी 1961 में बाबरी मस्जिद के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से दायर मुकदमे में मुद्दई थे। अंसारी ने ही 1986 में ताला खुलने के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा किया। उनकी राम मंदिर के पैरोकार परमहंस रामचंद्र दास से दोस्ती हमेशा चर्चा में रही। बाद में हाशिद ने पैरोकारी की कमान अपने बेटे इकबाल अंसारी को सौंप दी थी। हाशिद अंसारी का 95 साल की आयु में 20 जुलाई 2016 को निधन हो गया था। 
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