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अयोध्या मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जब आस्था है कि वहां जन्मस्थान है, तो स्वीकार करना होगा

Sat, 14 Sep 2019 03:12 AM IST
संदीप भट्ट न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संदीप भट्ट Updated Sat, 14 Sep 2019 03:12 AM IST
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Ayodhya case: SC queries Muslim parties on status of birth place as party to dispute
राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दावा किया गया कि 1934 से 1949 के बीच विवादित स्थल पर नियमित रूप से नमाज पढ़ी जाती थी। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा कोई सुबूत नहीं है, जिससे साबित हो कि उस दौरान वहां नमाज नहीं पढ़ी जाती थी।
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मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ वकील जफरयाब जिलानी ने चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष उस दौरान वहां नियमित नमाज पढ़ी जाने की बात कई। उन्होंने कहा कि यह अलग बात है कि जुमे (शुक्रवार) को अधिक लोग नमाज पढ़ने आते थे, जबकि बाकी दिन वहां कम लोग आते थे।
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जिलानी ने कहा कि 1942 में निर्मोही अखाड़े ने जो सूट दायर की थी, उसमें भी विवादित स्थल को मस्जिद बताया गया है। यह नहीं कहा जा सकता कि वहां मस्जिद नहीं थी। 1885 में भी एक याचिका में कहा गया था कि विवादित जमीन के पश्चिमी हिस्से में मस्जिद थी। अभी इसे भीतरी आंगन कहा जाता है।
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5 जून, 1934 को बाबरी मस्जिद के ट्रस्टी ने मस्जिद में हुए नुकसान को लेकर आवेदन दिया था। लोक निर्माण विभाग ने मस्जिद की मरम्मत कराई थी। 1934 दंगे में मस्जिद को नुकसान पहुंचाया गया था और मरम्मत के बाद उस जगह पर फिर से अल्लाह लिखा गया था।
 

गवाह का दावा, 1949 में पढ़ी आखिरी बार नमाज

जिलानी ने कहा कि गवाह मोहम्मद हाशिम ने बयान दिया था कि उन्होंने 22 दिसंबर, 1949 को आखिरी बार नमाज पढ़ी थी। कई और गवाहों के बयान हैं जिन्होंने कहा था कि वर्ष 1934 से 1949 के बीच वहां नमाज पढ़ी जाती थी। नमाज और अजान के लिए इमाम की नियुक्ति होती थी। उन्हें वेतन दिया जाता था। उन्हें दिए जाने वाले वेतन संबंधी कागजात भी मौजूद हैं।

जब आस्था है कि वहां जन्मस्थान है, तो स्वीकार करना होगा : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब आस्था या विश्वास है कि वहां राम जन्मस्थान है, तो उसे स्वीकार करना होगा। हम इस पर सवाल नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्षकार के वकील राजीव धवन से कहा कि आखिर देवता या जन्मस्थान को क्यों नहीं ‘न्यायिक व्यक्ति’ माना जाना चाहिए?

धवन ने कहा कि इसका क्या प्रमाण है कि हिंदू अनंत काल से उस जगह को भगवान राम का जन्म स्थल मान रहे हैं। स्कंद पुराण और कुछ विदेशी यात्रियों के यात्रा वृत्तांत के आधार पर उसे जन्मस्थान नहीं ठहराया जा सकता। इस पर पीठ के सदस्य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने धवन से पूछा कि आखिर ऐसी क्या चीजें हैं, जिनके आधार पर देवता या जन्मस्थान को न्यायिक व्यक्ति नहीं माना जाना चाहिए।
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