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जानिए 2015 की अवार्ड वापसी का सच, साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष ने किया खुलासा

Fri, 10 Aug 2018 05:58 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 10 Aug 2018 05:58 PM IST
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Award wapasi 2015: vishwanath prasad tiwari Said it was politically motivated to malign modi govt
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने साल 2015 में लेखकों, शायरों और वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा सम्मान वापस किए जाने पर बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने कहा है कि 2015 में जो अवार्ड वापस किए थे, वो पूरी तरह राजनीति से प्रेरित मामला था। 
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तिवारी ने कहा है कि उनके पास इस बात के सबूत हैं कि ये अभियान खुद से शुरू नहीं हुआ था बल्कि एक योजना के तहत शुरू किया गया था और इसका मकसद सरकार को बदनाम करना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ देशभर में माहौल बनाना था। 
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विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने एक लेख में इन बातों का जिक्र किया है। साल 2015 में देश में करीब 50 से ज्यादा लेखकों और शायरों ने ये देश में कथित असहिष्णुता के बढ़ते माहौल का हवाला देते हुए अपने सम्मान सरकार को लौटा दिए थे।
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यही नहीं तिवारी ने यह दावा भी किया है कि इस पूरे अभियान के पीछे लेखक और कवि अशोक वाजपेई का दिमाग था और उन्होंने ही 50 से ज्यादा साहित्यकारों से पुरस्कार वापस कराए। पुरस्कार वापसी का मकसद  सिर्फ और सिर्फ बिहार विधानसबा चुनाव से पहले मोदी सरकार को बदनाम करना था।

तिवारी ने अवार्ड वापसी अभियान को लेकर एक बड़ा लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कई खुलासे किए हैं। उन्होंने अपने लेख में कहा, "मेरे पास सबूत है कि अवार्ड वापसी देश के पांच लेखकों के दिमाग की उपज थी जिसे योजना बनाकर शुरू किया गया था। इसमें से कुछ तो पीएम मोदी के सत्ता में आने के पहले से ही उनके खिलाफ माहौल बना रहे थे क्योंकि मोदी लहर से साफ हो गया था कि अगला देश का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनने जा रहे हैं। 2015 में बिहार में भाजपा की हार पर भी इन्होंने जश्न मनाया था।" 

अवार्ड वापसी का मामला क्या है

Award wapasi 2015: vishwanath prasad tiwari Said it was politically motivated to malign modi govt
अशोक वाजपेयी
आखिर क्या है पूरा मामला

कन्नड़ लेखक कलबुर्गी की हत्या के बाद लेखक उदय प्रकाश ने साहित्य सम्मान लौटाकर सबसे पहले विरोध की शुरुआत की और उनके बाद साहित्यिक बिरादरी के कई अन्य लेखकों ने भी अपने अवार्ड वापस कर दिए। 

केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने पिछले साल फरवरी में लोकसभा में बताया कि इन लेखकों ने यह कहते हुए अपने पुरस्कार लौटाए थे कि उनकी अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला किया जा रहा है और अकादमी इस मुद्दे पर चुप है। शर्मा ने यह भी कहा कि पिछले तीन सालों में 39 लेखकों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए हैं। अकादमी ने इस अवधि में कुल 280 पुरस्कार बांटे थे।

पुरस्कार वापसी के बाद अकादमी ने 23 अक्टूबर 2015 तथा इसके बाद 17 दिसम्बर को एक अन्य बैठक बुलाई थी। इन बैठकों में एक प्रस्ताव पारित कर पुरस्कार लौटा चुके लेखकों से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया गया था। इस अनुरोध को केवल एक लेखक राजस्थान के नन्द भारद्वाज ने स्वीकार किया था और पुरस्कार लौटाने का अपना निर्णय वापस लिया था। 

लेखकों का कहना था कि देश में फैल रहे सांप्रदायिक वैमनस्व के विरोध में साहित्य अकादमी द्वारा दिया गया सम्मान लौटा रहे हैं। इन लेखकों ने मशहूर लेखक और साहित्य अकादमी बोर्ड के सदस्य एमएम कलबुर्गी की हत्या और दादरी कांड में एक मुस्लिम की हत्या पर विरोध जताते हुए कहा था कि अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है और अगर अब नहीं बोले तो खतरे और भी बढ़ जाएंगे।

कलबुर्गी की हत्या की निंदा नहीं करने पर साहित्य अकादमी का लेखक समाज ने विरोध किया था। लेखक समाज इस बात से भी खफा था कि कलबुर्गी की हत्या पर साहित्य अकादमी में शोक सभा तो आयोजित की गई, लेकिन उनकी हत्या की निंदा नहीं की गई। 
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