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August Kranti: क्या है 'अगस्त क्रांति' और क्यों यह भारत के आजादी की लड़ाई का 'अंतिम आंदोलन' मानी जाती है

Fri, 09 Aug 2024 01:01 PM IST
शिवेंद्र तिवारी स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Fri, 09 Aug 2024 01:01 PM IST
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सार
August Kranti: 9 अगस्त 1942 को अगस्त क्रांति का एलान किया गया जिसके कारण 9 अगस्त को अगस्त क्रांति दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके पीछे का इतिहास है कि जुलाई 1942 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित किया कि अगर अंग्रेज अब भारत नहीं छोड़ते हैं तो उनके खिलाफ देशव्यापी पैमाने पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाएगा।
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August Kranti and last movement of Indian freedom struggle news in hindi
अगस्त क्रांति - फोटो : PIB

विस्तार

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 9 अगस्त का आंदोलन इतना महत्वपूर्ण, इतना व्यापक और इतना तीव्र आंदोलन रहा है जिसकी कल्पना अंग्रेज भी नहीं कर सकते थे। महात्मा गांधी और सभी वरिष्ठ नेताओं को जेल में डाल दिया गया। यह वह समय था जब कई नए नेता सामने आए - लाल बहादुर शास्त्री, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और कई युवा इस आंदोलन में शामिल हुए और इसे गति दी। 


भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए तमाम छोटे-बड़े आंदोलन किए गए। अंग्रेजी सत्ता को भारत की जमीन से उखाड़ फेंकने के लिए महात्मा गांधी के नेतृत्व में जो अंतिम लड़ाई लड़ी गई थी उसे 'अगस्त क्रांति' के नाम से जाना गया है। इस लड़ाई में गांधी जी ने 'करो या मरो' का नारा देकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए पूरे भारत के युवाओं का आह्वान किया था। यही वजह है कि इसे 'भारत छोड़ो आंदोलन' या क्विट इंडिया मूवमेंट भी कहते हैं। इस आंदोलन की शुरुआत 9 अगस्त, 1942 को हुई थी, इसलिए इसे अगस्त क्रांति भी कहते हैं।


इस आंदोलन की शुरुआत मुंबई के एक पार्क से हुई थी जिसे अगस्त क्रांति मैदान नाम दिया गया। आजादी के इस आखिरी आंदोलन को छेड़ने की भी खास वजह थी। दरअसल, जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो अंग्रेजों ने भारत से उसका समर्थन मांगा था, जिसके बदले में भारत की आजादी का वादा भी किया था।

भारत से समर्थन लेने के बाद भी जब अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र करने का अपना वादा नहीं निभाया तो महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ अंतिम युद्ध का एलान कर दिया। इस एलान से ब्रिटिश सरकार में दहशत का माहौल बन गया।
 

अगस्त क्रांति
अगस्त क्रांति - फोटो : PIB
अगस्त क्रांति का इतिहास
9 अगस्त, 1942 को इस क्रांति का एलान किया गया जिसके कारण 9 अगस्त को अगस्त क्रांति दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके पीछे का इतिहास है कि जुलाई 1942 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित किया कि अगर अंग्रेज अब भारत नहीं छोड़ते हैं तो उनके खिलाफ देशव्यापी पैमाने पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाएगा। 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के बम्बई अधिवेशन में 'भारत छोड़ो आंदोलन' यानी 'अगस्त क्रांति' का प्रस्ताव पारित किया गया।

अगस्त क्रांति
अगस्त क्रांति - फोटो : PIB
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को भी जानें 
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम जो 1857 से शुरू हुआ था। 1942 आते-आते एक निर्णायक मुकाम पर पहुंच गया। आजादी के इस आंदोलन में दुनिया की सबसे बड़ी अहिंसक जनक्रांति 9 अगस्त, 1942 को शुरू हुई। दरअसल, द्वितीय विश्वयुद्ध ने दुनिया का इतिहास और भूगोल बदलने का काम किया। इस दौरान भारत में कांग्रेस सत्याग्रह चला रही थी। ब्रिटिशों को दबाव में देख उसने आजादी के लिए सुलह करने का प्रस्ताव रखा। 

जनवरी 1942 में कांग्रेस ने सत्याग्रह वापस ले लिया लेकिन चालाक अंग्रेजी हुकूमत ने क्रिप्स मिशन का नाटक खेल दिया। उसने आंदोलन से मुसलमानों और अनुसूचित जातियों को अलग करने की साजिश रची। कुछ दिनों बाद कांग्रेस के नेताओं को अंग्रेजों की चालबाजी समझ में आने लगी। 7 अगस्त को बंबई की सभा में महात्मा गांधी ने कहा कि अब हमें आजादी लड़कर ही लेनी पड़ेगी। यहीं से अगस्त क्रांति का निर्णायक आंदोलन अंग्रेजों भारत छोड़ो, करो या मरो शुरू हुआ।

गांधी रिसर्च फाउंडेशन, जलगांव, (महाराष्ट्र) के डीन डॉ. डी. जॉन चेल्लादुरई ने एक लेख में लिखा कि गांधीजी और एक लाख से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों को कुछ ही दिनों में गिरफ्तार कर लिया गया। गांधीजी ने देशवासियों से कहा कि अगर उन्हें सलाखों के पीछे डाला गया तो वे मरते दम तक अनशन करेंगे। यह सुनकर विनोबा भी गिरफ्तार हो गए और उन्होंने अनशन शुरू कर दिया। उन्होंने अपने साथियों से कहा, 'राम ने आज्ञा दी, हनुमान ने आज्ञा मानी।' गांधीजी को विनोबा का अनशन समाप्त करने के लिए एक दूत भेजना पड़ा और वादा किया कि वे खुद अनशन नहीं करेंगे। यह संघर्ष दृढ़ इच्छाशक्ति और मानवीयता से भरा हुआ था।'

भारत के पक्ष में वैश्विक जनमत बढ़ने लगा। अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने चर्चिल पर दबाव डाला कि वे भारत की मांग मान लें। चर्चिल ने अपना तुरुप का पत्ता खेला। 'मैं भारत के सामने झुकने के बजाय इस्तीफा दे दूंगा।'

प्यारेलाल नायर के शब्दों में, "पांच वर्ष से भी कम समय में अगस्त 1942 का नारा ब्रिटिश सरकार की आधिकारिक कार्ययोजना बन गया और कुछ ही समय में 'भारत छोड़ो' का नारा भी पुराना हो गया और उसकी जगह 'एशिया छोड़ो' ने ले ली।" इस प्रकार भारत छोड़ो आंदोलन ने भारत को स्वतंत्रता दी और विश्व को एक अहिंसक तरीका भी दिया।

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