कुरुक्षेत्र: मोदी, ममता से कम मायने नहीं रखते राहुल के लिए पांच राज्यों के चुनाव नतीजे
पांच राज्यों के चुनावों के नतीजे केंद्र सरकार, भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष की राजनीति पर असर डालेंगे। इनसे पता चलेगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ किस ओर जा रहा है। इनसे ममता बनर्जी का राजनीतिक भविष्य भी तय होगा। लेकिन कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी इन चुनावों के नतीजे मोदी और ममता से किसी भी सूरत में कम अहम नहीं हैं। क्योंकि कांग्रेस में उनकी ताजपोशी का बहुत कुछ दारोमदार इन पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों के नतीजों से तय होगा।
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विस्तार
इन चुनावों से देश की राजनीति के भविष्य से जुड़े पांच यक्ष प्रश्नों के जवाब निकल सकते हैं। पहला सवाल कि केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों और उनके खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन का भविष्य क्या होगा। दूसरा इनसे पता चलेगा कि भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा अपनी संगठन क्षमता और रणनीति में कितने खरे उतरे। तीसरा यह कि कांग्रेस में क्या राहुल गांधी दोबारा अध्यक्ष बनेंगे या जी-23 नेता समूह की पसंद का कोई पार्टी की कमान संभालेगा। पांचवां यह कि नरेंद्र मोदी के मुकाबले क्या ममता बनर्जी विपक्ष की साझा नेता के तौर पर राष्ट्रीय राजनीति में उभरकर आएंगी और छठा यह कि क्या धुर दक्षिण की राजनीति में भाजपा के कमल को जगह मिल सकेगी या नहीं। कुल मिलाकर प.बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुद्दुचेरी के चुनावों के गर्भ में देश के पांच राजनीतिक भविष्य के यक्ष प्रश्नों के उत्तर अंकुरित हो रहे हैं।
प.बंगाल विधानसभा चुनाव
बात पहले प.बंगाल विधानसभा चुनावों की जहां 2016 के बाद भाजपा दूसरी बार अपनी हवा बनाकर ममता बनर्जी के किले को ढहाने की कोशिश कर रही है। 2019 के लोकसभा चुनावों में मिली अप्रत्याशित सफलता ने भाजपा नेताओँ और कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद कर रखे हैं। उन्हें लगता है कि पूर्वी भारत के इस सबसे अहम और बड़े राज्य में काबिज होने का यह सबसे माकूल मौका है। इसलिए भाजपा अभी नहीं तो कभी नहीं की आक्रामक मुद्रा में चुनाव मैदान में है। उधर भाजपा के हमलों और निशानेबाजी से असहज ममता ने भी अपनी किलेबंदी पूरी कर ली है और वह देश ही नहीं आंकड़ों के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी सियासी पार्टी और देश की सत्ता पर काबिज ताकतवर राजनीतिक ताकत भाजपा से दो दो हाथ करने निकल पड़ी हैं। यूं तो कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन भी चुनाव मैदान में है,लेकिन मीडिया से लेकर चुनाव सर्वेक्षण तक तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला मान रहे हैं।
प.बंगाल जो कभी कांग्रेस का और उसके बाद वाम मोर्चे का अभेद्य किला था, 2011 में उसे ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने जीत लिया। जबकि भाजपा जिसके पूर्ववर्ती जनसंघ के संस्थापक डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी प.बंगाल के ही थे,इसके बावजूद बंगाल की खाड़ी के तट पर न तो जनसंघ का दीपक ही कभी जला और न ही भाजपा का कमल ढंग से खिला। केंद्र में जब अटल बिहाली वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा नीत एनडीए की सरकार थी, तब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से बगावत करके तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और उन्होंने वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ अपना संघर्ष तेज किया। दिलचस्प है कि तब भाजपा और तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने वाम मोर्चा के खिलाफ ममता को न सिर्फ पूरा समर्थन दिया बल्कि वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए में तृणमूल कांग्रेस एक महत्वपूर्ण घटक दल था और खुद ममता बनर्जी केंद्र सरकार में रेल मंत्री बनीं।
ममता जब नंदीग्राम और सिंगूर में किसानों की जमीन बचाने का संघर्ष कर रही थीं तब उन्हें अपनी मूल पार्टी कांग्रेस का नहीं उस भाजपा का समर्थन और साथ प्राप्त था जो आज उन्हें उखाड़ फेंकने पर आमादा है। बल्कि ममता के प्रति भाजपा की यह ममता तब तक बनी रही जब तक कि 2011 में प.बंगाल से वाम मोर्चे का लाल तंबू पूरी तरह उखड़ नहीं गया। ममता बंगाल में वाम मोर्चे के खिलाफ सड़कों खेतों और मेड़ों पर आंदोलन कर रही थीं। प्रदर्शन और आमरण अनशन तक कर रही थीं और भाजपा दिल्ली से उनके समर्थन में अपने सांसदों के प्रतिनिधि मंडलों की कुमुक भेज रही थी और संसद में ममता के समर्थन में आवाज बुलंद कर रही थी। यह सिलसिला 2004 के बाद यूपीए की पहली सरकार बनने तक भी चला क्योंकि तब वाम दल यूपीए सरकार को अपने समर्थन से चलवा रहे थे। लेकिन 2008 में परमाणु समझौते के विरोध में वाम मोर्चे ने यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस लिया तो ममता और कांग्रेस के बीच दोस्ती के तार जुड़ गए और 2009 में यूपीए दो की सरकार में तृणमूल कांग्रेस सरकार में शामिल हो गई। 2011 में जब प.बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस मिलकर लड़े तो ममता ने वाम किले को पूरी तरह ढहा दिया।
उधर, भाजपा भी उन ममता बनर्जी के खिलाफ ताल ठोंक रही है जिनके सहारे उसने कभी प.बंगाल के वाम मोर्चे के किले में प्रवेश पाया था। जनसंघ के जमाने से बिहार से आगे न बढ़ पाने वाली भाजपा ने अटल-आडवाणी के जमाने में तृणमूल कांग्रेस से दोस्ती की और बंगाल में अपने लिए खिड़की खोली। वाजपेयी सरकार में ममता और तृणमूल के दूसरे कद्दावर नेता अजीत पांजा मंत्री बने। तपन सिकदर जैसे भाजपा के नेता भी लोकसभा में चुनकर आए। तृणमूल अगर वाम किले की दीवारें गिरा रही थी, तो उसके मलबे को हटाने का काम करके भाजपा ने भी अपने लिए प.बंगाल में जगह बनानी तभी शुरू कर दी थी। 2014 के लोकसभा चुनावों से ही भाजपा ने प.बंगाल को अपनी प्राथमिकता सूची में खासा ऊपर रख लिया था। इसलिए तब भाजपा के खेवनहार बनकर उभरे नरेंद्र मोदी ने यह जानते हुए भी कि बंगाल की धरती में अभी भाजपा के कमल का खिलना मुमकिन नहीं है, लेकिन अपने सघन प्रचार अभियान से कमल का बीज जरूर बो दिया था। 2014 में मोदी और भाजपा को मिली देशव्यापी सफलता के बाद प.बंगाल भाजपा की प्राथमिकताओं में पहले नंबर पर आ गया।
मध्य प्रदेश के हरफनमौला नेता कैलाश विजयवर्गीय को प.बंगाल स्थानांतरित कर दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सभी अनुषांगिक संगठनों ने प.बंगाल में अपने जमीनी काम शुरू कर दिए और 2016 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने खुद को ममता और तृणमूल के विकल्प के तौर पर पेश कर दिया। तब कांग्रेस और वाम दल मिल कर लड़े और भाजपा ने अभी की ही तरह आक्रामक सघन चुनाव अभियान से यह भ्रम पैदा किया कि अब प.बंगाल में ममता युग समाप्त हो रहा है। लेकिन 2016 में तृणमूल ने अकेले चुनाव लड़कर 211 सीटें जीतीं और भाजपा महज तीन सीटों पर ही सिमट गई। पर उसे संतोष था कि उसका मत प्रतिशत बढ़ा है और पार्टी ने दूने उत्साह से लोकसभा की तैयारी शुरू कर दी। इसका नतीजा 2019 के लोकसभा चुनावों में राज्य की 42 सीटों में से 18 पर जीत के रूप में सामने आया। इन नतीजों ने भाजपा को विधानसभा चुनावों में ममता के मुकाबले लाकर खड़ा कर दिया है।
लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने ममता बनर्जी के खिलाफ सियासी जंग छेड़ी
लोकसभा चुनाव के बाद से ही भाजपा ने प.बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ सियासी जंग छेड़ दी। इसके लिए साम, दाम, दंड, भेद सारे उपाय अपनाए गए। एक तरफ तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के खिलाफ अराजकता, मुस्लिम तुष्टीकरण, हफ्ता वसूली और केंद्र की विकास योजनाओं को रोकने के आरोप लगाते हुए भाजपा नेताओं ने पूरे राज्य में सघन प्रचार अभियान छेड़ा। हिंदू ध्रुवीकरण का कार्ड खेलते हुए अयोध्या आंदोलन के नारे जय श्रीराम का उद्घोष न सिर्फ भाजपा की राजनीतिक सभाओं में बल्कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृति में आयोजित सरकारी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति तक में लगाए गए। भाजपा आईटी सेल ने ममता को पूरी तरह हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त बताने में कोई कसर नही छोड़ी। इसके साथ ही तृणमूल कांग्रेस के सांसदों, विधायकों और जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक के पदाधिकारियों का पाला बदल करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। तृणमूल कांग्रेस के कई विधायक और अन्य नेताओं ने चुनाव आते आते बड़ी संख्या में ममता का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। यहां तक कि कभी तृणमूल कांग्रेस के मजबूत स्तंभ माने जाने वाले शुभेंदु अधिकारी और दिनेश त्रिवेदी जैसे नेताओं ने भी पाला बदल किया। शुभेंदु अब नंदीग्राम से ममता के मुकाबले भाजपा के उम्मीदवार हैं।
उधर, ममता ने भी लोकसभा चुनावों से सबक लेते हुए अपनी रणनीति में बदलाव किया। उन्होंने सबसे पहले देश में चुनाव प्रचार अभियान और रणनीति के ब्रांड बन चुके प्रशांत किशोर की सेवाएं लीं। साथ ही ममता ने एक तरफ अपने मुस्लिम जनाधार को एकजुट रखने के सारे इंतजाम किए और दूसरी तरफ उन्होंने भाजपा के जय श्रीराम का जवाब जय सियाराम और जय दुर्गा से दिया। सभाओं में चंडी पाठ और खुद को ब्राह्मण और हिंदू बताते हुए उन्होंने भाजपा के हिंदू ध्रुवीकरण के कार्ड को भोथरा करने की हर मुमकिन कोशिश की है।अपने पुराने चुनाव क्षेत्र भवानीपुर की जगह नंदीग्राम से लड़ने की घोषणा शुभेंदु अधिकारी से पहले करके उन्होंने अपनी चुनावी और राजनीतिक आक्रामकता दिखाई। ममता के इस फैसले ने विरोधियों की जुबान बंद करने के साथ साथ उनके समर्थकों और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा दिया है, जो कई पार्टी नेताओं के दल बदल के कारण कुछ कमजोर होता नजर आ रहा था।
रही सही कसर उस कार दुर्घटना ने पूरी कर दी जिसमें ममता बनर्जी का पांव टूट गया और उन्हें अस्पताल जाना पड़ा। लेकिन पांव पर पलस्तर चढ़वाकर वह व्हील चेयर पर बैठकर जिस अंदाज में चुनाव प्रचार में फिर जुट गईं उसने एक तरफ तो उनके जीवट को दिखाया तो दूसरी तरफ बंगाल की जनता के बीच सहानुभूति का कार्ड भी चल दिया है। इस घटना में जिस तरह भाजपा के नेताओं ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी उसने भी ममता के प्रति एक सहानुभूति लहर पैदा की है। भाजपा के हिंदू ध्रुवीकरण के जवाब में ममता ने बंगाली अस्मिता का दांव चलते हुए खुद को बंगाल की बेटी बताया है। अब एक तरफ भाजपा का झंडा स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और उत्तर प्रदेश के भगवा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उठाए हुए हैं तो मुकाबले में दूसरी तरफ अकेली ममता बनर्जी उसी अंदाज में मैदान में हैं जैसे कभी कांग्रेस की पूरी फौज के खिलाफ गुजरात में अकेले नरेंद्र मोदी मोर्चा लेते थे। मोदी भी तब गुजराती अस्मिता का दांव बेहद खूबसूरती से चलते थे।
जहां ममता के सामने न सिर्फ अपनी सरकार बचाने की चुनौती है, बल्कि अपने विधायकों की इतनी संख्या लाने की भी चुनौती है कि अगर ममता सरकार बना लेती हैं तो भाजपा तोड़फोड़ करके उनकी सरकार को अस्थिर न कर सके और 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए अगले कुछ वर्षों में बनने वाले किसी भी विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने का अवसर भी उनके सामने बना रहे। वहीं भाजपा के सामने हर हाल में ममता का किला दरकाने और अगर बहुमत न मिले तो कम से कम इतनी सीटें लाने की चुनौती है कि वो पहले मजबूत विपक्ष बनकर ममता की सरकार को परेशान करे और सही समय आने पार कर्नाटक, मध्य प्रदेश की तर्ज पर पाला बदल करवाकर सरकार गिरा सके। इस लड़ाई में एक तीसरा पक्ष वामपंथी दलों और कांग्रेस का गठबंधन भी है। 2016 के चुनाव में इस गठबंधन ने करीब 70 सीटें जीती थीं और इनको मिले मतों की वजह से ही भाजपा पूरी आक्रामकता से चुनाव लड़ने के बावजूद महज तीन सीटों पर सिमट गई थी। इस बार ममता की सफलता या विफलता का काफी कुछ दारोमदार इस मोर्चे को मिलने वाले मतों और सीटों से भी तय होगा।
अगर वाम-कांग्रेस मोर्चा पिछली बार की अपनी सीटों और मतों का प्रतिशत फिर पा लेता है तो निश्चित रूप से ममता बनर्जी को बड़ी राहत होगी और उनके अच्छे बहुमत का रास्ता साफ होगा। लेकिन अगर वाम-कांग्रेस मोर्चा के वोट लोकसभा चुनावों की तरह भाजपा की तरफ चले गए तो भाजपा की सीटों निश्चित रूप से खासा इजाफा हो सकता है और तब लड़ाई कांटे की हो जाएगी। अगर ममता 2016 या उससे कुछ कम सीटें भी पाकर तीसरी बार सरकार बनाती हैं तो निश्चित रूप से यह भाजपा के लिए बड़ा झटका होगा। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कमी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की रणनीति की कमजोरी के तौर पर देखा जाएगा और केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्षी गोलबंदी तेज होगी। ऐसी हालत में दिल्ली में लंबे समय से चल रहे किसान आंदोलन को भी बल मिलेगा और सरकार पर उनकी मांगों को मानने का दबाव भी बढ़ेगा। किसान नेता इसे अपनी सफलता के रूप में प्रचारित करेंगे क्योंकि उन्होंने प.बंगाल आकर भाजपा को वोट न देने का प्रचार अभियान चलाया है। लेकिन अगर भाजपा कामयाब हुई तो ममता की भावी राजनीति कमजोर होगी,उनकी मुश्किलें बढ़ेगी और विपक्ष का मनोबल टूटेगा। साथ ही किसान आंदोलन कमजोर होगा और केंद्र सरकार की ताकत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की सफलता माना जाएगा।
असम में मुकाबला भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए और कांग्रेस नेतृत्व वाले महाजोट के बीच
अब बात असम की। असम में मुकाबला भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए और कांग्रेस नेतृत्व वाले महाजोट के बीच है। 2016 में कांग्रेस के 15 साल के शासन को समाप्त करके भाजपा गठबंधन की सरकार बनी थी। तब भाजपा ने अकेले अपने दम पर 60 सीटें जीती थीं जो बहुमत से तीन कम थीं, लेकिन सहयोगी दलों को मिलाकर उसके गठबंधन की संख्या 80 से ज्यादा थी और उसकी सरकार बनी। उस चुनाव में पूरे असम में घूम कर मैने यह महसूस किया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को लेकर कोई नाराजगी नहीं थी लेकिन उनकी उम्र और लंबे शासन के बाद लोगों में बदलाव की इच्छा बलवती थी और जनता भाजपा को एक मौका देना चाहती थी। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 के लोकसभा चुनावों की अपनी लोकप्रियता की लहरों पर सवार थे और उन्होंने भाजपा के लिए असम की जनता से एक मौका मांगा था।
इस चुनाव में कांग्रेस अपना घर संभाल नहीं पाई थी। उसके सबसे बड़े हरफनमौला नेता हेमंतो विश्वसर्मा ने पाला बदल कर भाजपा को ताकत दे दी थी, क्योंकि हेमंतो कांग्रेस के चुनाव बाद मुख्यमंत्री बनाए जाने की गारंटी मांग रहे थे, जो उन्हें नहीं मिली और वह भाजपा में चले गए। इसके अलावा उनके खिलाफ शारदा घोटाले की जांच भी उनके भाजपा की शरण में जाने का एक बड़ा कारण थी। हेमंतो को असम ही नहीं पूर्वोत्तर का बड़ा सियासी खिलाड़ी माना जाता है। इसका फायदा भाजपा को मिला और भाजपा ने असम गण परिषद, ताकतवर बोडो नेता हग्रामा के संगठन के साथ बेहद मजबूत गठबंधन करके अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी। जबकि कांग्रेस अकेले चुनाव मैदान में थी। यहां तक कि उसका बदरुद्दीन अजमल के एयूडीएफ के साथ भी गठजोड़ नहीं हो सका था। नतीजा कांग्रेस की हार और भाजपा की जीत के रूप में सामने आया। हालांकि हेमंतो विश्वसर्मा तब भी मुख्यमंत्री नहीं बन सके,क्योंकि भाजपा ने अपने भरोसेमंद सर्वानंद सोनोवाल को चुनाव के दौरान ही मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया था।
इस बार चुनाव की परिस्थिति अलग है। पांच साल भाजपा का राज असम की जनता देख चुकी है। हालांकि व्यक्तिगत रूप से मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल की छवि एक काम करने वाले शरीफ नेता की है और उनके खिलाफ किसी तरह की नाराजगी दिखाई नहीं देती है। लेकिन केंद्र सरकार का नागरिकता कानून (सीएए) असम में एक बड़ा मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यहां लागू नागरिकता रजिस्टर से जिस तरह सामाजिक असंतोष और अव्यवस्था फैली और सीएए के विरोध में पूरा असम एकजुट हो गया,उससे भाजपा के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। जहां कांग्रेस घोषणा कर रही है कि अगर उसकी सरकार बनी तो सीएए असम में लागू नहीं होगा, वहीं भाजपा इस मुद्दे से बच रही है। जबकि पड़ोस के प.बंगाल में भाजपा सीएए लागू करने की बात कर रही है। इसके अलावा चाय बागानों के मजदूरों की दिहाड़ी में वृद्धि न होना और उनकी मूलभूत सुविधाओं का भी बड़ा मुद्दा है। पांच साल पहले भाजपा ने चाय बागानों के मजदूरों से जो वादे किए थे,उनके पूरा न होने से उनमें असंतोष है। इसे थामना भाजपा की एक बड़ी चुनौती है।
इस बार भाजपा का गठबंधन पिछली बार जैसा मजबूत नहीं दिख रहा है। हग्रामा के नेतृत्व वाला बोडो गुट उससे बाहर है और कांग्रेस के महाजोट में शामिल है। साथ ही बदरुद्दीन अजमल के एयूडीएफ के साथ भी कांग्रेस का गठबंधन है।इससे पिछली बार की तरह भाजपा विरोधी वोटों का विभाजन नहीं होने से भी महाजोट को ताकत मिल रही है। हालांकि अगप अभी भी भाजपा के साथ है, लेकिन सीएए विरोधी आंदोलन के नेता जेल में बंद अखिल गोगोई का संगठन अजप के चुनाव मैदान में आने से मूल असमिया वोटों के विभाजन का खतरा बढ़ गया है जिससे अगप के सामने भी संकट है। कई सीटों पर गोगोई मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं। इसके अलावा भाजपा के भीतर हेमंतो और सोनोवाल समर्थकों में भी खींचतान की खबरे हैं क्योंकि हेमंतो इस बार मुख्यमंत्री की कुर्सी हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं, जबकि सोनोवाल चुनाव में भाजपा के नेता हैं। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट तरुण गोगोई या हितेश्वर सैकिया जैसा कोई बड़ा नेता न होने का है। तरुण गोगोई की मृत्यु के बाद उनकी विरासत उनके बेटे गौरव गोगोई संभाल रहे हैं और संतोष मोहन देव की बेटी सुष्मिता देव भी पूरा जोर लगा रही हैं। लेकिन चुनाव से पहले सुष्मिता के असंतोष की खबरें भी आईं थीं। इसके बावजूद इस बार बदली परिस्थितियों में भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए और कांग्रेस नेतृत्व वाले महाजोट के बीच कांटे के मुकाबले की खबरें असम से आ रही हैं। भाजपा के चुनाव प्रचार का दारोमदार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के मजबूत कंधों पर है, जबकि कांग्रेस के लिए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी असम में धुआंधार प्रचार कर रहे हैं।असम के नतीजे कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति पर भी असर डालेंगे।
दक्षिण में भाजपा और कांग्रेस सहयोगियोंं के भरोसे
दक्षिण में तमिलनाडु में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अपने अपने गठबंधन में सहयोगी की भूमिका में हैं। इसलिए वहां के नतीजे इन दोनों दलों की राजनीति पर बहुत ज्यादा असर नहीं डालेंगे लेकिन फिर भी उनकी सीटों की संख्या कांग्रेस भाजपा के केंद्रीय नेताओं की लोकप्रियता का पैमाना जरूर बनेगी। जबकि केरल में भाजपा महज अपनी उपस्थिति बढ़ाने की लड़ाई लड़ रही है और मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ वाम मोर्चा गठबंधन और विपक्षी कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ के बीच है। केरल में हर बार सत्ता बदलने की परंपरा रही है, लेकिन इस बार मुख्यमंत्री पिनारी विजयन के नेतृत्व मे वाम मोर्चा दोबारा सत्ता वापसी के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा है। कांग्रेस के लिए केरल जीतना असम से भी ज्यादा अहम इसलिए है क्योंकि पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी अब केरल के वायनाड से सांसद हैं और वह लगातार केरल का दौरा करके पार्टी के लिए प्रचार कर रहे हैं। इसलिए असम और केरल के चुनाव नतीजे यह तय करेंगे कि कांग्रेस में राहुल गांधी दूसरी बार निर्बाध अध्यक्ष बनेंगे या फिर जी-23 के नाम से मशहूर असंतुष्ट कांग्रेसी नेताओं के गुट की चलेगी।
अगर कांग्रेस असम और केरल में जीत जाती है तो सफलता का पूरा श्रेय राहुल गांधी को जाएगा और उनकी ताजपोशी आसानी से हो जाएगी। अगर असम में पार्टी सत्ता नहीं पाती है लेकिन उसकी सीटें बढ़ जाती हैं और केरल जीत जाती है तो भी राहुल गांधी के लिए राहत होगी। लेकिन अगर केरल में पार्टी फिसली तो राहुल गांधी के नेतृत्व को चुनौती मिलेगी और तब उनका आसानी से पार्टी अध्यक्ष बनना मुश्किल हो जाएगा। अगर प.बंगाल में ममता बनर्जी तीसरी बार जीतती हैं और असम व केरल में कांग्रेस हारती है तो विपक्ष की कमान भी कांग्रेस के हाथ से खिसक कर ममता बनर्जी के नेतृत्व में तीसरे मोर्चे के पास आ सकती है। लेकिन अगर असम और केरल में कांग्रेस जीतती है और प.बंगाल में ममता जीतती हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर ममता का महत्व तो बढ़ेगा लेकिन विपक्षी मोर्चे की कमान कांग्रेस के ही पास रहेगी। अगर भाजपा प.बंगाल में ज्यादा कामयाब नहीं होती है और असम भी उसके हाथ से निकल जाता है तो निश्चित रूप से इसका असर केंद्र सरकार और भाजपा की राजनीतिक सेहत पर पड़ेगा और विपक्ष के साथ साथ आंदोलनकारी किसान भी भारी पड़ने लगेंगे। लेकिन अगर उलटा होता है तो भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी का दबदबा और बढ़ जाएगा। पुद्दुचेरी में भाजपा इस बार सरकार बनाने की लड़ाई लड़ रही है, जबकि वहां की राजनीति तमिलनाडु से प्रभावित होती है। अगर तमिलनाडु में डीएमके गठबंधन जीतता है तो पुद्दुचेरी में भी करीब करीब वैसी ही नतीजे हो सकते हैं और अगर एआईडीएमके गठबंधन तमिलनाडु में फिर सत्ता में आता है तो पुद्दुचेरी में भाजपा का कमल खिल सकता है। कुल मिलाकर दो मई को पांचों राज्यों के चुनाव नतीजों से ही पता चलेगा कि देश की सियासत का ऊंट किस करवट बैठेगा।