{"_id":"5bc1a245bdec2269ae7726b9","slug":"assembly-elections-2018-chuvani-shayari-and-poems","type":"story","status":"publish","title_hn":"सुना है एक बार फिर चुनाव का मौसम लहलहा रहा है...","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
सुना है एक बार फिर चुनाव का मौसम लहलहा रहा है...
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sat, 13 Oct 2018 01:14 PM IST
विज्ञापन
चुनावी शायरी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चुनावी माहौल गर्म है, बयानबाजियों का दौर भी तेज हो चला है, नेताओं की रैली जोर पकड़ चुकी है। जनता की अदालत में अब नेताओं की अग्निपरीक्षा का वक्त आ गया है। ऐसे चुनावी माहौल में नेताओं पर यह चुनावी शायरी सटीक बैठती है।
सुना है एक बार फिर
चुनाव का मौसम लहलहा रहा है
निकल पड़े हैं सब दल बल सहित
अपने अपने हथियारों के साथ
शब्दबाणों का करके भयंकर वार
करना चाहते हैं पूरी सेना को धराशायी
भूलकर इस सत्य को
चुनाव है भाई
यहां साम दाम दंड भेद की नीतियां अपनाकर ही
जीती जा सकती है लड़ाई
जी हां
न केवल तोड़े जाएंगे दूसरे दलों के शीर्ष नेता
बल्कि जरूरी है आज के समय में
मीडिया पर भी शिकंजा
जिसकी जितनी चादर होगी
उतने पांव पसारेगा
मगर जिसका होगा शासन
वो ही कमान संभालेगा
करेगा मनमाने जोड़ तोड़
विरोधियों को करने को ख़ारिज
जरूरी है आज
अपनी जय जयकार स्वयं करनी
और सबसे करवानी
बस यही है सुशासन
यही है अच्छे दिन की चाशनी
जिसमे जनता को एक बार फिर ठगने का मौका हाथ लगा है
फिर क्या फर्क पड़ता है
बात पांच साल की है
भूल जाती है जनता
याद रहता है उसे सिर्फ
अंतिम समय किया काम
चुनावी मौसम की बरसातों में भीगने को
कुछ ख़ास मुखौटों की जरूरत होती है
जो बदले जा सकें हर घात प्रतिघात पर
जहां बदला जा सके ईमान भी बेईमान भी
और चल जाए खोटा सिक्का भी टंच सोने के भाव
बस यही है अंतिम मौका
करो शब्दों से प्रहार
करो भीतरघात
येन केन प्रकारेण जरूरी है आज
बस चुनाव जीतना और कुर्सी हथियाना
भरोसा शब्द टूटने के लिए ही बना है सभी जानते हैं
(वंदना गुप्ता)
विज्ञापन
सुना है एक बार फिर
चुनाव का मौसम लहलहा रहा है
निकल पड़े हैं सब दल बल सहित
अपने अपने हथियारों के साथ
शब्दबाणों का करके भयंकर वार
करना चाहते हैं पूरी सेना को धराशायी
भूलकर इस सत्य को
चुनाव है भाई
यहां साम दाम दंड भेद की नीतियां अपनाकर ही
जीती जा सकती है लड़ाई
जी हां
न केवल तोड़े जाएंगे दूसरे दलों के शीर्ष नेता
बल्कि जरूरी है आज के समय में
मीडिया पर भी शिकंजा
जिसकी जितनी चादर होगी
उतने पांव पसारेगा
मगर जिसका होगा शासन
वो ही कमान संभालेगा
करेगा मनमाने जोड़ तोड़
विरोधियों को करने को ख़ारिज
जरूरी है आज
अपनी जय जयकार स्वयं करनी
और सबसे करवानी
बस यही है सुशासन
यही है अच्छे दिन की चाशनी
जिसमे जनता को एक बार फिर ठगने का मौका हाथ लगा है
फिर क्या फर्क पड़ता है
बात पांच साल की है
भूल जाती है जनता
याद रहता है उसे सिर्फ
अंतिम समय किया काम
चुनावी मौसम की बरसातों में भीगने को
कुछ ख़ास मुखौटों की जरूरत होती है
जो बदले जा सकें हर घात प्रतिघात पर
जहां बदला जा सके ईमान भी बेईमान भी
और चल जाए खोटा सिक्का भी टंच सोने के भाव
बस यही है अंतिम मौका
करो शब्दों से प्रहार
करो भीतरघात
येन केन प्रकारेण जरूरी है आज
बस चुनाव जीतना और कुर्सी हथियाना
भरोसा शब्द टूटने के लिए ही बना है सभी जानते हैं
(वंदना गुप्ता)