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Hindi News ›   India News ›   Assembly Elections 2018: BSP supremo Mayawati will play major role in Madhya Pradesh Election

दिलचस्प होने जा रही है मध्य प्रदेश की सियासी जंग, मायावती का दांव भाजपा के लिए बनेगा संजीवनी!   

Wed, 10 Oct 2018 11:36 AM IST
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 10 Oct 2018 11:36 AM IST
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Assembly Elections 2018: BSP supremo Mayawati will play major role in Madhya Pradesh Election
MadhyaPradesh election

इस साल के अंत तक पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में सबसे दिलचस्प मुकाबला मध्य प्रदेश में होने जा रहा है। यहां 15 साल से सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला कांग्रेस से है जो इस बार वापसी के लिए पूरा जोर लगा रही है। कांग्रेस ने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की जोडी़ को मैदान में उतारा है। ये दोनों नेता जबरदस्त मेहनत में जुटे हुए हैं। भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान के बावजूद कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां हैं।

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मायावती ने खड़ी की कांग्रेस के लिए मुसीबत   


कांग्रेस के लिए पहली बड़ी मुश्किल बसपा सुप्रीमो मायावती ने खड़ी कर दी है। मायावती ने राज्य में अकेले ही चुनाव लड़ने का ऐलान कर कांग्रेस को हक्काबक्का कर दिया। मायावती ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह को निशाने पर लेते हुए कहा कि कांग्रेस-बसपा के बीच गठबंधन नहीं होने के लिए वही जिम्मेदार हैं। मायावती के इस दांव से फिलहाल कांग्रेस चित नजर आ रही है।  
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राज्य में चुनाव के लिए कुछ ही वक्त बचा है। कांग्रेस-भाजपा की ओर से ताबड़तोड़ रैलियों और जनसभाओं का दौर जारी है। कांग्रेस की ओर से खुद राहुल गांधी ने कमान थाम ली है और उनकी रैलियों का सिलसिला जोर पकड़ता जा रहा है। भाजपा पर राहुल और कांग्रेस के तीखे हमले हो रहे हैं और सीएम शिवराज बचाव की मुद्रा में दिख रहे हैं। मायावती के दांव ने जबरदस्त ट्विस्ट पैदा कर दिया है जिससे मुकाबला और उलझ गया है। 
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भाजपा पर कई मुद्दे पड़ रहे भारी

फिलहाल भाजपा प्रतिकूल हालात का सामना कर रही है। कई मुद्दे उस पर भारी पड़ते दिख रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा है एससी-एसटी एक्ट का मुद्दा। इसे लेकर भाजपा के कोर वोटर में ही उसके प्रति नाराजगी देखी जा रही है। जगह-जगह धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और सीएम शिवराज को आलोचना झेलनी पड़ रही है। इसके अलावा किसानों की नाराजगी और एंटी इंकंबेंसी फैक्टर भी भाजपा की राह मुश्किल करता नजर आ रहा है। सपाक्स का चुनावी मैदान में उतरने का फैसला भी भाजपा के लिए बड़ा सिरदर्द साबित होने जा रहा है। पूर्व आईएएस अधिकारियों का ये संगठन भाजपा सरकार से बेहद नाराज है और कई पूर्व अधिकारी चुनावी मैदान में ताल ठोकने जा रहे हैं। 

भाजपा के लिए राहत की खबर

हालांकि मायावती का रुख भाजपा के लिए राहत भरी खबर है। राज्य में बसपा का प्रभाव कई इलाकों में है। पिछले कुछ चुनावों में इस पार्टी ने 6 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल किए हैं जो इसे राज्य की तीसरी बड़ी पार्टी बनाता है। कुछ समय पहले तक कांग्रेस और बसपा के बीच गठजोड़ के कयास लग रहे थे लेकिन मायावती ने ऐन वक्त पर कांग्रेस को झटका देकर उसकी रणनीति को बिगाड़ दिया है। 
 
लेकिन क्या इससे भाजपा को  इतना फायदा होगा कि वह लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी कर सके। इसके लिए हमें राज्य में वोटों का समीकरण समझना होगा। मध्य प्रदेश में दलित कुल आबादी का करीब 15 फीसदी है। दलितों की संख्या यहां 7 करोड़ 50 लाख है। दलितों के वोट का बड़ा हिस्सा बसपा के खाते में जाता है और इसी वजह से मायावती यहां तीसरी ताकत बनी हुई हैं। अगर यहां एससी-एसटी एक्ट का मुद्दा असर दिखाता है तो जितना नुकसान भाजपा को होगा उतना ही फायदा बसपा और कांग्रेस को होगा। लेकिन अगर ऐन वक्त पर भाजपा से नाराज वोटर उसके ही पक्ष में वोट करता है तो उसकी वापसी तय है। 



 

बसपा ने उतारे थे 227 उम्मीदवार

मध्य प्रदेश के 2013 के चुनाव में बसपा ने 230 सीट में से 227 पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। हालांकि उसे महज चार सीटों पर ही जीत मिली लेकिन उसका वोट शेयर 6.29 फीसदी रहा था। इसे काफी अहम वोट शेयर माना जा सकता है। 2008 में बसपा को 8.97 फीसदी वोट और 7 सीटें मिली थीं। जबकि 2003 में उसे 7.26 फीसदी वोट के साथ दो सीटें मिली थीं। यानि उसका वोट शेयर लगातार कम हो रहा है, लेकिन प्रभाव बना हुआ है। साल 2013 में कांग्रेस को 36.38 फीसदी वोट मिले थे और उसने 58 सीटें जीती थीं जबकि भाजपा ने 44.88 वोट शेयर के साथ 165 सीटों पर जीत दर्ज कर बहुमत के साथ सरकार बनाई थी।  

बसपा की सीटें और विधायक

दिम्बनी (मुरैना)- बलबीर सिंह डंडौतिया
अम्बाह (मुरैना)- सत्यप्रकाश सुखवार
रैगांव (सतना)- उषा चौधरी
मनगंवा (रीवा)- शीला त्यागी

अगर मायावती का वोट कांग्रेस को ट्रांसफर हो जाता तो उसे जबरदस्त फायदा होता। लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। मायावती का रुख भाजपा के लिए सुकून भरा साबित होने जा रहा है। 2013 में कांग्रेस-भाजपा के बीच वोटों का अंतर 8 फीसदी का रहा था। भाजपा सत्ताविरोधी रुझान का सामना कर रही है। ऐसे में अगर बसपा का वोट कांग्रेस को ट्रांसफर हो जाता तो तस्वीर बदल सकती थी। बहरहाल, चुनावी बिसात में कौन कौन सी बाजी खेली जानी है ये  देखना अभी बाकी है। चुनाव तारीख आते-आते कई बाजियां सजेंगी और कई बिगड़ेंगी। कौन किस पर भारी पड़ता है, ये देखना वाकई बेहद दिलचस्प होगा। 
 
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